भारतीय अर्थ -नीति :विकास की एक दशा

दीनदयाल उवाच


.....राजनीतिक प्रजातंत्र बिना अर्थिक प्रजातंत्र चल नहीं सकता। जो अर्थ की दृष्टि से स्वतंत्र है, वही राजनीतिक दृष्टि से अपना मत स्वतंत्रतापूर्वक अभिव्यक्त कर सकेगा। भीष्म पितामह जैसे व्यक्ति को भी आर्थिक परतंत्रता के कारण अपने राजनीतिक विचारों पर प्रतिबंध लगाना पडा। सभा में वे अन्याय का प्रतिकार नहीं कर पाए। उन्होंने स्वीकार किया कि पुरुष अर्थ का दास होता है (अर्थस्य पुरुषो दासः), अतः अर्थ की स्वतंत्रता आवश्यक है।
व्यक्ति के अधिकार
व्यक्ति के नाते जब हम आर्थिक स्वतंत्रता अथवा प्रजातंत्र का विचार करते हैं तो हमें उसके कुछ अधिकारों को मान्यता तथा उनके संरक्षण की गारंटी देनी होगी। (उत्पादन और उपभोग इन दोनों की स्वतंत्रता प्राप्त हो गई तो हम कह सकते हैं कि वह आर्थिक स्वतंत्रता का उपभोग कर रहा है।) इनमें भी उत्पादन की स्वतंत्रता प्रमुख है, क्योंकि उसके द्वारा ही व्यक्ति अपने उपभोग की पात्रता प्राप्त करता है। यदि वह सामूहिक उत्पादन में सहभागी न हो तो वह न तो राष्ट्र को अपना योगदान दे सकेगा और न उपभोग की क्षमता सिद्ध कर सकेगा। बच्चा और बूढा, रोगी और अपंग साधारणतः काम में नहीं लग सकता, फिर भी उन्हें उपभोग तो करना पडता है और कई बार तो उनका हिस्सा ‘नार्मल’ से अधिक ही होता है। अतः जहाँ हमें व्यक्ति को इस बात की आश्वस्ति देनी होगी कि वह हमेशा काम कर सकेगा, वहाँ हमें इसकी भी व्यवस्था करनी होगी कि जिन अवस्थाओं में वह काम नहीं कर सकता, उस समय भी उसे अपने उपभोग की स्वतंत्रता से वंचित न होना पडे।
प्रत्येक को काम
‘प्रत्येक को वोट’ जैसे राजनीतिक प्रजातंत्र का निकष है, वैसे ही ‘प्रत्येक को काम’ यह आर्थिक प्रजातंत्र का मापदंड है। काम का यह अधिकार बेगार या दास म*ादूरी (स्द्यड्ड1द्ग रुड्डड्ढश्ाह्वह्म्) से उसी प्रकार नहीं होता जिस प्रकार कम्युनिस्ट देशों को ‘वोट’ प्रजातंत्रीय अधिकार का उपभोग नहीं है। काम प्रथम तो जीविकोपार्जनीय हो तथा दूसरे व्यक्ति को उसे चुनने की स्वतंत्रता हो। यदि काम के बदले में राष्ट्रीय आय का न्यायोचित भाग नहीं मिलता तो उस काम की गिनती बेगार में होगी। इस दृष्टि से न्यूनतम वेतन, न्यायोचित वितरण तथा किसी-न-किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था आवश्यक हो जाती है।
मर्यादाएँ
उत्पादन और उपभोग की अमर्यादित स्वतंत्रताओं की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि एक व्यक्ति द्वारा उत्पादन की स्वतंत्रता दूसरे के मार्ग में बाधक होती है तो वह नहीं दी जा सकती। एक बडे कारखाने का मालिक यद्यपि स्वयं उत्पादन की स्वतंत्रता का उपभोग करता है। किंतु वह छोटे-छोटे उद्योगों को समाप्त कर उनकी स्वतंत्रता का अपहरण करता है। फिर कई बार उसके कारखाने में काम करने वाले मजदूरों की स्वतंत्रता भी बहुत ही सीमित हो जाती है। अतः नियमन आवश्यक है। हमें इस बात का भी विचार करना होगा कि एक की उत्पादन की स्वतंत्रता दूसरे की उपभोग की स्वतंत्रता को समाप्त न कर दे। खाद्य में मिलावट उत्पादन की स्वतंत्रता के नाम पर नहीं की जा सकती। यह जो शुद्ध खाद्य चाहता है, उसकी स्वतंत्रता के प्रतिकूल है। केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, आर्थिक क्षेत्र में भी विकेंद्रीकरण चाहिए। अतः विकेंद्रीकरण के साथ हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि राष्ट्र के उत्पादन में व्यक्ति अपना पूर्ण योगदान दे सके।
विकेंद्रीकरण
जैसे एक स्थान पर आर्थिक अथवा राजनीतिक सामर्थ्य का केंद्रीकरण प्रजातंत्र के विरुद्ध है, वैसे ही एक ही व्यक्ति या संस्था के पास राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक शक्ति का केंद्रीकरण लोकतंत्र के मार्ग में बाधक है। साधारणतया तो जब किसी भी एक क्षेत्र की शक्ति केंद्रित हो जाती है तो केंद्रस्थ व्यक्ति प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रीति से अन्य क्षेत्रों की शक्ति भी अपने हाथ में लेने का प्रयास करते हैं। इसमें से ही खिलाफत और कम्युनिस्टों की तानाशाही सरकारें पैदा हुईं। यद्यपि मनुष्य का जीवन एक है और उसकी विभिन्न प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं, फिर भी उन प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाल निकाय अलग-अलग रहने चाहिए। साधारणतया राज्य की विभिन्न इकाइयों को प्रशासन के क्षेत्र से हटकर अर्थ के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए। पूँजीवादी अर्थव्यवस्था पहले आर्थिक क्षेत्र पर आधिपत्य जमाकर फिर परोक्ष रूप से राज्य पर अधिकार करती है, तो समाजवाद राज्य को ही संपूर्ण उत्पादन के साधनों का स्वामी बना देता है। दोनों व्यवस्थाएँ व्यक्ति के प्रजातंत्रीय अधिकार एवं उसके स्वस्थ विकास के प्रतिकूल हैं। अतः हमें विकेंद्रीकरण के साथ-साथ शक्तियों के विभक्तीकरण का भी विचार करना पडेगा। केंद्रित व्यवस्थाएँ मानव को मानव न मानकर उससे एक टाइप के साथ व्यवहार करती है। उनमें मानव की विविधताओं और विशेषता के लिए कोई स्थान नहीं। फलतः वे उसे ऊँचा उठाने के स्थान पर एक मशीन का पुर्जा मात्र बना देती हैं। उसका अपना व्यक्तित्व मारा जाता है। अतः विकेंद्रीकरण हमारी संस्कृति के भी अनुकूल है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पूर्ण रोजगारी, न्यूनतम उपयोग की आश्वस्ति तथा विकेंद्रीकरण हमारे आर्थिक कार्यक्रम के आधारभूत आवश्यक लक्ष्य हो सकते हैं।
जहाँ शासन ही संपूर्ण अर्थोत्पादन का स्वामी है, वहाँ योजना बनाना और कार्यान्वित करना सरल है। जहाँ व्यक्तियों को आर्थिक क्षेत्र में खुली छूट है, वहाँ भी अधिक कठिनाई नहीं, किंतु जहाँ व्यक्तियों को आर्थिक क्षेत्र में खुली छूट है, वहाँ भी अधिक कठिनाई नहीं, किंतु जहाँ एक मिश्रित अर्थव्यवस्था है, वहाँ नियोजन एक दुष्कर कार्य है। उदाहरण के लिए, जहाँ केवल सैन्य संचालन का कार्य करना है, वह सरलता से किया जा सकता है। जहाँ सामान्य रूप से सडक पर यातायात की व्यवस्था करनी हो, वह भी ट्रैफिक पुलिस के नियंत्रण एवं संचार-नियमों के पालन से की जा सकती है, किंतु जब प्रधानमंत्री के आगमन पर एकाएक रास्ता रोक दिया जाता है तो भारी कठिनाई और क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। यदि प्रधानमंत्री की गाडी भी अन्य यातायात के साधनों के साथ ही ट्रैफिक के नियमों का पालन करती हुई जाए तो इस क्षोभ को टाला जा सकता है, किंतु साधारण प्रवृत्ति शासन की योजनाओं को प्राथमिकता देने की होती है।......