टैक्स या लुट

दीनदयाल उवाच


रावण ने स्वर्ग के लिए एक सीढी बनाने की योजना बनाई थी। योजना सुंदर थी तथा उसके पीछे जनहित की भावना भी थी। सीढी के बनने पर हर आदमी के लिए यह संभव था कि वह आसानी से स्वर्ग तक पहुँच जाए। किंतु सवाल आया कि इस योजना को व्यवहार में कैसे लाया जाए? इतनी बडी सीढी के लिए रुपए की आवश्यकता थी और रुपया तो जनता से ही वसूल किया जा सकता था। फलतः जनता के ऊपर टैक्स लगाए गए। पर दो-चार टैक्सों से इतना रुपया नहीं आ सकता था कि इतनी बडी योजना सफल की जा सके। इसलिए नित्य नए टैक्सों का प्रस्ताव होने लगा। प्रजा करों के बोझ से कराहने लगी। किंतु कौन सुनता है उनकी करुणामय पुकार को, धुन तो थी कि स्वर्ग की सीढी तैयार हो जाए। यहाँ तक कि ब्राह्मणों से भी, जो उस समय कर से मुक्त थे, टैक्स लिया गया। बेचारे निर्धन ब्राह्मण! वे क्या देते? उनके पास धन-संपत्ति तो उनकी तपस्या, त्याग और भगवद्भक्ति ही थी। किंतु रावण ने कहा कि यह स्वर्ग की सीढी ऋषि-मुनियों के भी काम आएगी, अतः उन्हें भी कर देना पडेगा। अंततः उनके पास धन न होने पर उनसे रक्त का कर लिया गया। आज की तरह ब्लड बैंक्स उस समय थे या नहीं, यह तो निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, किंतु हाँ, रावण ने रक्त का कर लिया अवश्य था। संभव है, इतना अधिक कर लिया कि निर्धन ब्राह्मणों को भी अपना खून सुखा-सुखाकर टैक्स अदा करने के लिए काम करना पडा। राजा के द्वारा जब इस प्रकार मर्यादा का बाँध टूटा तो प्रजा के धैर्य का भी बाँध टूट गया। उसने विरोध करना प्रारंभ किया। पर जब राजा के दिमाग में कोई सनक सवार हो जाती है तो वह फिर किसी की नहीं सुनता। बल्कि अपने हितैषियों को भी शत्रु मान बैठता है। रावण ने भी विरोध का जवाब अत्याचार से दिया। ऋषि-मुनियों को अगुआ मानकर आश्रम ध्वंस किए जाने लगे। अनेक ऋषियों की हत्या हुई। उनकी हड्डियों के अंबार के अंबार जगह-जगह लोगों के मन में आतंक बिठाने के लिए लगा दिए गए। चारों ओर राक्षसी सेना अपने आसुरी बल से प्रजा को सताने लगी, नीति वाक्य है कि-
एक मर्ग के कारने, नृप को अत्याचार ।
सेवक वाके निशि-दिवस, मारे मुर्ग ह*ाार ।।
अतः रावण से अधिक अत्याचार उसके अनुयायियों ने शुरू कर दिए। संपूर्ण देश में भ्रष्टाचार और अत्याचार की धूम मच गई। पीडित जनता की इस कराह में से मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ, जिन्होंने रावण के राज्य को समाप्त कर राम राज्य की स्थापना की। रावण की स्वर्ग की सीढी की चाह मन-ही-मन में ही रह गई।
भारत की वर्तमान परिस्थितियों में जब उसे राजनीतिक स्वतन्त्रता मिल गई है, आर्थिक स्वतन्त्रता दिलाने का सवाल खडा होता है। यह आज का मुख्य राष्ट्रीय प्रश्न है।
इस प्रश्न को हल करने के विभिन्न उद्योग विभिन्न प्रणालियों से तथा विभिन्न दिशाओं में किए जा रहे हैं। हमारे लिए यह प्रश्न इस रूप में आता है कि हम उसको भारतीय ढंग से किस प्रकार हल कर सकते हैं। हम जानते हैं कि भारतीय ढंग सदा से धर्म का (म*ाहब का नहीं) ढंग रहा है और धर्म के इस ढंग पर ही आर्थिक नवनिर्माण के नए नक्शे को तैयार करने की जरूरत है। भारतीय वाङ्मय में धर्म की जो व्याख्याएँ समय-समय पर दी गईं, उनमें से सबसे पुरातन होने के कारण वेदों की व्याख्या को हम लेते हैं, जिसमें उसके १२ लक्षण गिनाए गए हैं। इनमें धर्म का आद्य लक्षण सबसे महत्वपूर्ण है। (श्रमेण तपसा सृष्ठा....) और वह है ‘श्रम’। भारतीय ऋषियों ने जीवन में श्रम की अन्यतम महत्ता हो भलीभाँति जान लिया था और इसीलिए उन्होंने ‘श्रम’ को धर्म का पहला लक्षण बताया। श्रम की महत्ता का ज्ञान माक्र्स और एंजेल्स के जन्म तक रुका नहीं रहा, वह अति पुरातन काल में सहज अनुभूति से हमने मानवता को दे दिया था।
आधुनिक शब्दावली म इसी बात को यों कह सकते हैं कि श्रम करना मनुष्य का मूलभूत कर्तव्य है (ष्ठह्वह्ल4 ह्लश्ा 2श्ाह्म्द्म)। इसी प्रकार मनुष्य को श्रम करने का यह अधिकार देना राज्य का भी मूलभूत कर्तव्य हो जाता है। आज जब समाज व्यवस्था बिगडी हुई है और श्रम करने वाले मनुष्य को भी, पहले तो उसे श्रम करने का अवसर ही नहीं मिलता, अवसर मिले भी तो उसे भरपेट खाना नसीब नहीं होता तब राज्य की अपेक्षा में मनुष्य का यह श्रम करने का कर्तव्य कर्तव्य न रहकर अधिकार बन जाता है और इसी अधिकार की माँग, उसकी स्थापना तथा उसी पर आधारित व्यवस्था की रचना ही उसका मुख्य कर्तव्य अथवा परम धर्म बन जाता है।
अतः श्रम का अधिकार (ऋद्बद्दद्धह्ल ह्लश्ा 2श्ाह्म्द्म) मनुष्य का संवैधानिक अधिकार है। राज्य का यह पहला कर्तव्य है कि वह प्रत्येक नागरिक को उसकी योग्यता और क्षमता के अनुसार काम करने का अवसर दे। इन अवसरों में किसी प्रकार का भेदभाव, न जाति का, न रंगभेद और न लिंग का होने दें। राष्ट्र के आर्थिक पुननिर्माण की जो भी योजना बनाई जाए, उसका उद्देश्य सभी व्यक्तियों को काम दिलाना (स्नह्वद्यद्य द्गद्वश्चद्यश्ा4द्वद्गठ्ठह्ल) होना चाहिए। भारत की आर्थिक नवरचना के लिए जो पंचवर्षीय योजना बनाई गई है अथवा भविष्य में इस प्रकार की जितनी भी योजनाएँ बनाई जाने की संभावना है, उनका उद्देश्य सभी व्यक्तियों को काम दिलाना ही होना चाहिए। इसके बिना ये योजनाएँ न राष्ट्रीय कही जा सकती हैं और न भारतीय ही।
भारत में समाजवाद लाना है तो समाज के ३५ करोड भारतीयों की आत्मा को समझा जाए। पंडित नेहरू के समक्ष प्रश्नवाचक चिह्न उपस्थित हो गया कि कुंभ मेले में दस लाख लोग कैसे आए? जब यही समझ में नहीं आता तो समाजवाद कैसे आएगा? गाँधीजी ने समझा था, और उसी की देन है- सत्य, अहिंसा परंतु आज तो वह केवल लिखा हुआ ही दिखाई पडता है। कार्य रूप में परिणत होते हुए नहीं। जनसंघ इसे कार्य रूप में परिणत करना चाहता है।