उच्चतम न्यायलय के निणर्य पर कुछ विचार

दीनदयाल उवाच


न्यायपालिका अथवा कार्यपालिका में से कौन श्रेष्ठ है, इस विषय पर विवाद करते रहना पागलपन है। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वोच्च हैं दोनों संविधान द्वारा शासित होते हैं और अपनी शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। संविधान में इस बात पर बल है कि संप्रभुता की है, न कि उसके द्वारा गठित किसी अंग की, जो कि उसके अधीन कार्य कर रहा हो। यदि संविधान और न्यायपालिका को हटा दिया तो पता नहीं शासक दल का छोटा सा हिस्सा क्या आतंक मचाएगा।
संप्रभुता धर्म में निहित है
भारतीय परंपरा में धर्म (कानून) में संप्रभुता है। एक संवैधानिक सरकार एक सीमा तक धर्मराज्य का प्रतिनिधित्व करती है। परंतु यदि संविधान को इसलिए बार-बार बदला जाता है, क्योंकि शासकों को इससे परेशानी अथवा शर्मिंदगी उठानी पडती है तो इसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। यह संशोधन और भी निंदनीय हो जाते हैं, क्योंकि इनमें से किसी से भी नागरिकों के अधिकारों अथवा विशेषाधिकारों में वृद्धि नहीं हुई। इन सबसे वैयक्तिक स्वतंत्रता सीमित हुई है। यहाँ तक कि इस मुद्दे पर भी यदि संविधान संशोधन होता है तो नागरिकों के मौलिक अधिकारों में और अधिक कटौती होगी। मतदाता अपने विधायकों में विश्वास व्यक्त करके उन्हें चुनते हैं और उन्हें कुछ दायित्व सौंपते हैं। उन दायित्वों के निर्वहन के लिए वांछित सत्ता और सम्मान से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता। परंतु मतदाताओं ने कोई अपने मृत्यु अधिकार-पत्र हस्ताक्षर करके नहीं दिए हैं, जिससे वह उनके मौलिक अधिकारों को रौंद डाले। उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विधानसभा की अवमानना प्रक्रिया की वैधता पर विचार नहीं किया है। उसने तो केवल विधायिका के उस भ्रम के विरुद्ध कि वह सर्वोच्च है, किसी नागरिक के मोहभंग होने के अधिकार को बनाए रखा है। अपनी वास्तविक स्थिति समझने की जगह वे संविधान में संशोधन करना चाहते हैं, ताकि एक भ्रामक धारणा पर खुशियाँ मना सकें। ऐसा कोई कदम संवैधानिक शासन की अवधारणा पर प्रहार होगा। संसद् की जो दशा है, उसमें प्रायः हर विषय पर पार्टी आदेश सांसदों को जारी किया जाता है। इसलिए वे शायद ही अपनी बात पर *ाोर दे पाते हैं। यह संसद् वाद-विवाद क्लब अथवा रबर स्टांप बनकर रह गई है।
यदि यह संविधान पारित किया जाता है, ताकि उच्चतम न्यायालय के निर्णय को निरस्त किया जाए तो यह नागरिक अधिकारों का गंभीर क्षरण होगा। विधायिका और न्यायपालिका के विवाद में नागरिक दाँव पर लगा है। उसका पक्ष सुने बिना निर्णय नहीं होना चाहिए।
विधायकों को नहीं भूलना चाहिए कि मूल अधिकारों पर किसी भी प्रकार का आघात उन पर उलटा पडेगा। विधायक भी एक नागरिक है और इस मामले में एक विधायक ने ही अपने अधिकार का प्रयोग किया था नागरिक है और इस मामले में एक विधायक ने ही अपने अधिकार का प्रयोग किया था। नागरिक के अधिकार विधायक के विशेषाधिकारों से कहीं अधिक स्थायी होते हैं। जो बात सैद्धांतिक रूप से गलत है, उसे स्वार्थवश नहीं करना चाहिए। यदि विधायक नागरिक के अधिकारों के विरुद्ध कार्य करता है तो वह अपना प्रातिनिधिक स्थान खो देता है। जो लोग संविधान की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले मतदाताओं से राय लेनी चाहिए। लोगों के निर्णय की ताकत ही उच्चतम न्यायालय की ताकत से बडी हो सकती है। यदि ऐसे महत्त्वपूर्ण मामले मे सरकार जनता से पूछे बिना संविधान संशोधन का निर्णय लेती है तो यह अधिकारों का भयंकर दुरुपयोग होगा।
जो लोग यह समझते है कि इससे विधायिका की शक्तियों का क्षरण हुआ है, वे गलती पर हैं। इससे केवल एक भ्रम टूटा है। विधायिका के पास कभी भी उतनी शक्तियों से अधिक शक्तियाँ नहीं थीं, जितनी उच्चतम न्यायालय ने तय की हैं। जो वास्तव में
जनता का हक है। अब उसका कोई भी प्रयास
खतरनाक होगा।
उच्चतम न्यायालय का निर्णय उन लोगों के लिए निराश करनेवाला होगा, जो गुलामों की तरह हमारी विधायिका को भी ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ की त*ार् पर चलाना चाहते हैं और इस पंरपरा को बनाए रखने पर गर्व करते हैं। हमारी विधायिका उच्चतम न्यायालय के अनुसार इंग्लैंड के ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ से भिन्न है। इस अवसर को वरदान मानना चाहिए कि इस रूप में ईश्वर ने हमें ब्रिटेन की संसदीय परंपराओं से मुक्त होने का अवसर दिया। हमें अपनी परंपराएँ विकसित करनी चाहिए। इसी से सही अर्थों में राष्ट्रीय प्रतिभा प्रतिबिंबित होगी। हमारी स्थितियाँ भिन्न तरह की परंपराओं, प्रक्रियाओं और प्रणालिय की माँग करती हैं। संसद् भारत की पंचायत बने।