अंग्रजी की दुष्टता

दीनदयाल उवाच


हमारे स्वातंत्र्य संग्राम के प्रारंभिक दिनों में ब्रिटिश समर्थक तत्त्वों को हमारा यह सामन्य उत्तर होता था कि ‘स्वराज्य’ (स्द्गद्यद्घ ह्म्ह्वद्यद्ग) की प्यास को ‘सुराज्य’ (त्रश्ाश्ास्र ह्म्ह्वद्यद्ग) नहीं बुझाया जा सकता। आज भी ‘स्वभाषा’ की आवश्यता की पूर्ति ‘सुभाषा’ से नहीं हो सकती।..... फ्रैंक एंथोनी का यह भी तर्क है कि संविधान में अंगे*जी को स्थान दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह अल्पसंख्यकों की अर्थात् एंग्लो इंडियनों (आंग्ल-भारतीयों) की भाषा है। यदि श्री एंथोनी अपने को राष्ट्रीय अनुभव करते हैं तो उन्हें अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के रूप में सोचना बंद कर देना चाहिए। सच्ची बात तो यह है कि संसदीय जनतंत्र में ऐसे विभाजन का सीमित प्रयोजन है। हम इसका इतना विस्तार यहाँ कर सकते हैं कि यह हमारे संपूर्ण जीवन को दूषित कर दे। यदि हम ऐसा करने लगे तो श्रेणीकरण के हमारे आधार में परिवर्तन होता जाएगा और अनेक अल्पसंख्यक समुदाय बनते जाएँगे, जिसका परिणाम यह होगा कि प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी अल्पसंख्यक समाज का सदस्य बन जाएगा। संप्रदाय आधारित अल्पसंख्यक, भाषाई अल्पसंख्यक, राजनीतिक अल्पसंख्यक, जातीय अल्पसंख्यक, धंधे पर आधारित अल्पसंख्यक आदि अनेक अल्पसंख्यक हो सकते हैं।..... यदि अंगे**ाी को आठवीं अनुसूची में संशोधन करके भारतीय भाषा के रूप में मान्य किया जा सकता है तो किसी दिन अंगे*जी को ही भारत और राज्यों की एकमात्र सरकारी भाषा बनाए रखने का तर्क भी इसी आधार पर प्रस्तुत किया जाने लगेगा। यह भी ध्यान में रखना होगा कि यद्यपि कुछ प्रचलित अंगे**ाी शब्दों को अपनाए रखा जा सकता है, तथापि अंगे**ाी हिंदी के विकास के आधार के रूप में अन्य भाषाओं की भाँति सहायक नहीं बन सकती। हिंदी की स्वाभाविक प्रतिभा में बाधा डाले बिना अंगे**ाी शब्दों को हिंदी के साथ मिश्रित नहीं किया जा सकता। हिंदी में ‘साइकिल’ शब्द का प्रयोग चलते रहने देना और बात है, किंतु हम ‘साइक्लिस्ट’, ‘एनसाइक्लिक’, ‘साइक्लोस्टाइल’ आदि का प्रयोग नहीं कर सकते। सच्ची बात यह है कि जब प्राविधिक (तकनीकी) और वैधानिक विषयों के लिए उपयुक्त शब्द ढूँढते हैं तो हमें संस्कृत का आश्रय लेना ही पडता है। हम अंगे**ाी पारिभाषिक शब्दों को नहीं अपना सकते, क्योंकि वे अकेले नहीं, अपने परे परिवार के साथ आते हैं.............।