हिंदी का विरोध निराधार

दीनदयाल उवाच



.....राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का समय निकट आ रहा है। गरमी में श्रीनगर की ठंडक में बैठकर अपना प्रतिवेदन लिखने का उन्होंने निर्णय किया था, किंतु ऐसा लगता है कि उन्हें और अधिक ठंडक की आवश्यकता है। इसलिए शायद आयोग के सचिव को रूस जाकर वहाँ की भाषा नीति का अध्ययन करने का आदेश किया गया है। राष्ट्र जीवन के हर क्षेत्र में विदेशों की नकल की यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय स्वाभिमान को तो ठेस पहुँचाती ही है, साथ ही वह हमारे समुचित विकास एवं योग्य निर्णयों में भी बाधक है। रूस की भाषा नीति का भारत के साथ कोई सामंजस्य नहीं। प्रथम तो भारत के समान रूस एक देश नहीं- कि समान संस्कृति एवं परंपरा हो, दूसरे रूस ने अपने निर्णयों को तानाशाही शासन के द्वारा क्रियान्वित कराया है। भारत की स्थिति भिन्न है।
संविधान ने हिंदी को सार्वदेशिक कामकाज के लिए प्रशासनिक भाषा के रूप में स्वीकार किया है। उसे यह स्थान उसकी व्यापकता के कारण ही प्राप्त हुआ है। हिंदी साहित्य का जिन्हें ज्ञान नहीं अथवा जो उसकी महत्ता को मानने के लिए तैयार नहीं, ऐसे भारतीयों द्वारा भी उसे बहुत बल मिला और जब संविधान में भाषा संबंधी अनुच्छेद रखे गए, सब हिंदी के कट्टरपंथी लोगों को चाहे संतोष न हुआ हो, भारत की सभी भाषाओं के प्रतिनिधियों के एकमत से निर्णय लिए गए।
किंतु आज भाषा केवल मन के विचारों के व्यक्तीकरण का माध्यम ही नहीं, उनकी जननी भी है। भाषा विचारों को संस्थापित भी करती है। हम चाहे जितना प्रयत्न करें, भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति अंगे**ाी के माध्यम से नहीं कर सकते। फिर भारत में अंगे**ाी कितने लोग जानते हैं? क्या केवल कुछ पढे-लिखे लोगों की सुविधा-असुविधा का ध्यान करके भाषा की नीति निर्धारित की जाए? हम यदि प्रयत्न करें तो भी भारत का बहुजन समाज अंगे**ाी नहीं सीख सकता। क्या हम यह चाहते हैं कि हम सदैव ऐसी भाषा का ही प्रयोग करें, जो केवल चंद लोगों की बपौती है।
आज वास्तव में जो हिंदी का विरोध हो रहा है, वह उन बूढे तोतों के द्वारा हो रहा है, जो आज हिंदी सीख नहीं सकते। हमें उन्हें सिखाने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। यह ठीक है कि इन पुराने और वृद्ध लोगों के बिना हम काम नहीं चला सकते। हमारे युग का अनुभव उनके पास है और शासन ही नहीं, सभी क्षेत्रों में उनकी सेवाओं से हमें लाभ उठाना होगा। अतः हमें कोई ऐसा मार्ग अवश्य निकालना पडेगा, जिससे अपने इन बंधुओं को कोई कठिनाई न हो। उनसे हिंदी का आग्रह न करें, क्योंकि यह तो नई पीढी और पुरानी पीढी के बीच सदा चलने वाले संघर्ष का एक स्वरूप है, उसके पीछे किसी बहुत बडे सिद्धांत का सवाल नहीं।
प्रादेशिक भाषाओं को हिंदी समाप्त कर देगी, ऐसा भी कहा जाता है। किंतु यह सत्य नहीं। हिंदी में न तो इतना बल है और न प्रादेशिक भाषा में इतनी निर्बलता। फिर प्रदेश का संपूर्ण कामकाज वहीं की क्षेत्रीय भाषा में ही चलेगा। वास्तव में तो भाषाएँ एक-दूसरे से पुष्ट होते हुए विकास करेंगी। संस्कृत भी जो भारत की अनेक भाषाओं की जननी है तथा हमारे संपूर्ण साहित्य की प्रेरणास्त्रोत है, प्रांतीय भाषाओं को समाप्त नहीं कर सकी। फिर भला हिंदी यह *ाुर्रत कैसे कर सकेगी?
यह दुःख का विषय है कि भारत में हर एक प्रश्न राजनीतिक बन जाता है। आज भाषा की भी यह दशा है। यदि ऐसा न होता तो राजाजी, ‘‘हिंदी वाले मिलकर दक्षिण पर प्रभुत्व जमा लेंगे तथा दक्षिण के लोग आपस में बँटे रहेंगे।’’ ऐसा कभी नहीं कहते। आज वास्तविकता तो यह है कि भारत में हिंदीभाषियों को छोडकर सभी भाषा के आधार पर संगठित हैं।
यदि हिंदी का जैसा प्रचार पिछले दिनों में हुआ, वैसा ही जारी रहा और बढता गया तो फिर संपूर्ण देश के लोग समान रूप से हिंदी भाषी हो जाएँगे, अर्थात् उनकी मातृभाषा अलग रहेगी, किंतु सार्वदेशिक रूप में वे हिंदी का प्रयोग करेंगे। वास्तविकता तो यह है कि आज कुछ लोग अपनी मातृभाषा हिंदी बताते अवश्य हैं किंतु उनके घरों तथा सामान्य व्यवहार में जो भाषा बोली जाती है, वह हिंदी नहीं, मारवाडी, मालवी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगधी, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढी आदि-आदि अनेक बोलियाँ बोली जाती हैं। उनमें साहित्य भी है और बढ रहा है। वह दिन दूर नहीं कि जब वे अत्यंत प्रौढ साहित्य का सृजन कर सकेंगी। हिंदी चाहे तो भी इनके मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती। जैसे-जैसे हिंदी का प्रचार बढेगा, अन्य प्रदेशों में भी वहाँ भी भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य का सृजन होते हुए उनकी प्रगति होगी। हाँ, हिंदी को समझने वालों की संख्या बढ जाएगी तथा वह अंतरप्रांतीय व्यवहार का माध्यम बन जाएगी। सरकार के समस्त व्यापार ऐसे हते हैं कि उनमें साहस का अभाव होता है। उनका सदैव भय रहता है किसी भी नेतृत्व के विकास के निमित्त कोई सस्ता उपाय नहीं है। त्वरा कठोर परिश्रम का आह्वान करती है, गलत मार्ग अपनाने से उसकी पूर्ति नहीं हो सकती। हमको पूरा मूल्य चुकाना होगा। प्रदर्शन, नारेबाजी तथा जय-जयकार किसी व्यक्ति का दिमाग फिरा सकते हैं किंतु उसे जनता का सच्चा नेता नहीं बना सकते। मिट्टी के माधो बहुत दिन तक नहीं चल सकते। जुलूसों और सभाओं की आवश्यकता समय-समय पर हो सकती है, किंतु वे ही किसी दल के आधार-स्तंभ नहीं हो सकते। मैं चाहता हूँ कि यौवनपूर्ण इस उत्साह का प्रदर्शन कम ही किया जाए। इसके द्वारा हमें चुनाव में भी शायद ही कोई लाभ होता हो। नेतृत्व को थोपने की अपेक्षा विकसित होने दें।
निष्काम कर्म करें
इसलिए देश की भलाई और यहाँ तक कि दल की भलाई तथा जनतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि हम सामान्य से सामान्य व्यक्ति के पास पहुँचे और उसकी भलाई को अपने जीवन का तात्कालिक तथा चरम लक्ष्य बनाएँ। अज्ञानयुक्त होते हुए भी सामान्य व्यक्ति श्रेष्ठतम विद्वान से कहीं अधिक समझदार तथा श्रेष्ठतम वीर से कहीं अधिक साहसी होता है। उस पर किसी का भी बंधन नहीं होता। वह किसी भी हुतात्मा से अधिक बलिदान करने की क्षमता रखता है। यदि हमारी बातें उसे रुचिकर प्रतीत होती हैं तो हमें पूरी शक्ति के साथ बढते रहना चाहिए-फिर चाहे राष्ट्र का श्रेष्ठतम व्यक्ति हमारे कार्यों की आलोचना ही क्यों न करता हो।
हमारा उद्देश्य परिवर्तन के लिए परिवर्तन नहीं है। लेकिन हम रूढिगत परंपराओं को ज्यों का त्यों बनाए रखना नहीं चाहते। चुनाव-राजनीति की मजबूरियाँ हमें अनोखे लोगों का सहगामी बनाएँगी। प्रगतिशील तथा प्रतिक्रियावादी साथ-साथ हो लेंगे। किंतु हमको यह ध्यान रखना चाहिए कि हम प्रगति तथा सामान्य व्यक्ति की भलाई के लिए खडे हैं। न तो हम भूतकाल के किसी स्वर्णयुग के उपासक हैं और न खोए हुए के लिए मातम मना रहे हैं। हमें विश्व समस्याओं का नया हल प्रस्तुत करना है और हम जानते हैं कि भारतीय संस्कृति यह करने में समर्थ है। यद्यपि हम शास्त्रों और ऋषियों के कथन के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं तथापि हमें इस हल की खोज उनमें नहीं करनी। इसकी खोज हमें उस मनुष्य के स्वेद में करनी है, जो श्रम करता है कृषि करता है। यदि भारतीय जनसंघ प्रताडित किंतु संघर्षरत मानवता की रक्षा में आत्म और उदर संतुष्टि का अनुभव कर सका तो वह युग का अग्रदूत बन सकेगा। हमारी संस्था पुरातत्त्व विभाग नहीं है। हम तो नव भवनों का निर्माण करेंगे। हम इतिहासकार नहीं हैं, इतिहासकारों को लिखने दीजिए कि हमने क्या किया है। ईश्वर हमारी प्रगति में सहायक हो।