संस्कृतनिष्ठ हिंदी ही एकमात्र रास्ता

दीनदयाल उवाच



......भारी किंकर्तव्यविमूढता व्याप्त है, और ऐसा प्रतीत होता है कि इस दृष्टि से प्रधानमंत्री सबसे अधिक किंकर्तव्यविमूढ व्यक्ति हैं। उनका मत है कि नए तकनीकी शब्द तैयार नहीं किए जाने चाहिए और न गढे जाने चाहिए, बल्कि उन्हें क्रमिक रूप से विकसित होना चाहिए। उन्होंने लोकसभा में अपने वक्तव्य में ऐसा ही कहा। ‘‘हिंदी शब्द तैयार करने और अनुवाद का ‘स्लाट मशीन’ जैसा काम बनावटी, हवाई, बेतुका, बेढंगा और हसी कराने का उपाय है। ऐसा उपाय अपनाकर आदमी अपने को एक लोहे के ढाँचे में जकड लेगा और कुछ श्लोक बोल देने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकेगा।’’ स्पष्ट ही उनका प्रहार संस्कृत भाषा और संस्कृत विद्वानों पर है। वे संस्कृत नहीं चाहते। यदि हम संस्कृत का परित्याग कर दें तो सभी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए नए पारिभाषिक शब्द तैयार करने का सामान्य आधार क्या होगा? आज अंगे**ाी के पारिभाषिक शब्द प्रचलित हैं यदि हम उन्हें ही चलाते रहें तो उनके ‘स्थान ग्रहण’ का प्रश्न ही नहीं उठता। उसका अर्थ केवल कुछ सर्वनामों और क्रियाओं को बदल देना होगा, जैसा कि मुगलों ने फारसी से उर्दू का विकास करते समय किया था। फारसीकृत हिंदी उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकेगी, और अंगे*जीकृत हिंदी भी नहीं कर सकेगी। अर्द्धशिक्षित नगरनिवासी उस भाषा में बातचीत कर सकते हैं, परंतु उनका सरकारी या साहित्यिक कार्यों के लिए प्रयोग नहीं हो सकता।
यह सच है कि अनेक विदेशी शब्द हमारी भाषाओं के पूर्णतः अंग बन गए हैं। उनके प्रयोग पर प्रतिबंध लगाना कोई नहीं चाहता। किंतु उनका उपयोग केवल सामान्य बातचीत में हल्की-फुल्की साहित्यिक रचनाओं में हो सकता है। विधि-विषयक पुस्तकों के लिए हमें वैज्ञानिक आधार पर निर्मित पारिभाषिक शब्दकोश चाहिए ही। हम ‘जज’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं, पर ‘जुडिशियरी’, ‘जुडिशियल’, ‘जजमेण्ट’, ‘जजशिप’, ‘जुडिकेयर’, ‘जुडिशस’, ‘ऐड्जज’, ‘ऐड्जुडिकेशन’, ‘प्रिजज’, ‘प्रिजुडिस’, ‘जस्टिस’, ‘जस्टिशिएबल’, ‘जस्टिशियरी’, ‘जस्टिफाई’, ‘जस्टिफिकेशन’, ‘जस्टिफिकेटरी’, ‘जस्टिफाएबिलिटी’, ‘जस्टिफिकेटिव’, ‘ज्यूरी’, ‘ज्यूरर’, ‘जुरिस्डिक्शन’ ‘ज्यूरिडिकल’, ‘ज्यूरिट’, ‘ज्यूरिस्प्रुडेंस’ आदि शब्दों का, जो एक ही शब्दमूल से निकले परस्पर संबंधित पारिभाषिक शब्द हैं, हम प्रयोग नहीं कर सकते। यदि आप सरकारी कामकाज, विधायी कार्य और प्रशासनिक कार्य के लिए हिंदी का प्रयोग करना चाहते हैं , तो आपको न्यायपलिका विषयक कार्यों में उपर्युक्त सारे शब्दों का व्यवहार करना पडेगा। ‘जज’ एक ऐसा शब्द हो सकता है, जिसे लोग सामन्यतः जानते हैं, किंतु यदि हम उक्त सारे शब्दों का हिंदी में व्यवहार करें, तो शायद ही किसी की समझ में आए। यह डॉ. रघुवीर२ का कोई दोष नहीं है कि उन्होंने ऐसे सभी परस्पर-संबंधित कार्यों के लिए एक ही संस्कृत मूल ‘धातु’ से शब्दों की रचना की है। कोई-कोई कुछ शब्दों से असहमत हो सकते हैं, किंतु जिस किसी व्यक्ति को शब्दकोश के कार्य की कुछ सही कल्पना है, वह इस आधार को गलत नहीं बता सकता। उनका उपहास उडाकर प्रधानमंत्री ने उस विषय के प्रति केवल अपनी अज्ञता ही प्रकट की है।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि शब्द गढे नहीं जाने चाहिए, बल्कि सामान्य जनता से क्रमिक रूप से विकसित होने चाहिए। यह सच है कि सामान्य जनता द्वारा सदा नए शब्द प्रचलन में लाए जाते हैं, और किसी भी अन्य सजीव भाषा की तरह हिंदी में भी उनका प्राचुर्य है। किंतु उनमें से अधिकांश उन उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सकते, जिनकी पूर्ति करना हिंदी को अभीष्ट है। क्या पंडित नेहरू ‘गवर्नर’ को ‘राज्यपाल’ के बदले ‘लाट साहेब’ और ‘प्रसिडेंट’ को ‘राष्ट्रपति’ के बदले ‘बडा लाट’ के नाम से संबोधित किया जाना पसंद करेंगे? ‘लोकसभा’ और ‘राज्यसभा’ जैसे शब्द, जो अत्यंत सुपरिचित हो गए हैं, क्रमिक रूप से नहीं विकसित हुए बल्कि पंडित नेहरू द्वारा उपहासित ‘स्लाट मशीन फॉर्मूले’ द्वारा गढे गए हैं। प्रारंभ में ये नाम नए और अपरिचित लगे, किंतु अब वे भली-भाँति सुपरिचित हो चुके हैं, मानो वे सदा से व्यवहार में चले आ रहे हों। ऐसे बीसियों शब्द हैं, जिनका पंडित नेहरू भी व्यवहार करते हैं और जो सामान्य जनता से नहीं बल्कि डॉ. रघुवीर एवं अन्य विद्वानों से ही प्राप्त
हुए हैं........।
हाल में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने भी जुडिशियल मजिस्ट्रेट के निर्णय में कठिन हिंदी के प्रयुक्त होने की शिकायत की है। इस कठिन हिंदी के उदाहरण के रूप में ‘अन्य पुरुषों के विरुद्ध आरोप हैं’ को उद्धृत किया गया था। इस हिंदी के स्थान पर अभी तक मजिस्ट्रेट लोग ‘दीगर अशखास के खिलाफ इल्*ााम है’ लिखतें हैं और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश उसे समझते रहे हैं। यदि पूरे देश में या केवल उत्तर प्रदेश में भी मत लिया जाए तो ‘कठिन हिंदी’ को समझने वालों की संख्या बहुत अधिक होना है, तो उसका फारसीकरण नहीं किया जा सकता। जो लोग अहिंदीभाषा जनता पर एक ऐसी भाषा लादने के पक्षपाती हैं, जो उनके लिए सर्वथा विदेशी है तथा जो लोग वर्णसंकर ‘हिंदुस्तानी’ के पक्षधर हैं, उन लोगों ने तथाकथित कट्टरपंथी हिंदी वालों की अपेक्षा हिंदी को अधिक हानि पहुँचाई है, क्योंकि अहिंदीभाषी लोगों को इस भाषा के एक-एक शब्द को सीखना पडेगा और वह भी उस स्थिति में, जबकि उनकी भाषा में उससे मिलते-जुलते शब्द नहीं हैं। किंतु प्रांजल संस्कृतनिष्ठ हिंदी के बारे में ऐसी बात नहीं है।