हिंदी यहाँ है

दीनदयाल उवाच


देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी २६ जनवरी, १९६५ से भारतीय राज्य की ‘मुख्य’ भाषा होगी। अगर संवैधानिक प्रावधानों का ध्यान रखा गया होता और जन भावनाओं का सम्मान किया गया होता, तो अलग से जोडा गया यह ‘मुख्य’ शब्द नहीं होता, केवल हिंदी ही राष्ट्र की राजभाषा होती। लेकिन सरकार सभी मामलों में विदेशी सहयोग में विश्वास रखती है, इसलिए २६ जनवरी, १९६५ के बाद भी अंग्र*ाी का इस्तेमाल एक सहयोगी भाषा के तौर पर होता रहेगा। राष्ट्रवादियों के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि इस दिन के बाद से अंग्रे*ाी सिर्फ एक ‘सहयोगी’ भाषा रह जाएगी। इस ‘सहयोगी’ भाषा का स्थान ‘मुख्य’ भाषा की तुलना में क्या होगा, यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है।
क्यों कुछ लोग हिंदी के विरोध में हैं
हिंदी के पक्ष और विपक्ष में दिए गए तर्कों में जाने की *ारूरत नहीं है। वे कई बार समय असमय दोहराए जा चुके हैं। जो लोग हिंदी के विरोध में हैं, उन सब को समझाना मुश्किल है। ऐसे लोग दो श्रेणियों में आते हैं। इसमें एक श्रेणी ऐसे लोगों की है, जो सिर्फ हिंदी के विरोधी नहीं बल्कि वे एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक देश के ही विरोधी हैं। वे भारत का एक और विभाजन चाहते हैं। इस कारण वे हिंदी को भारतीय लोगों की भारत पर ‘राजशाही’ का एक माध्यम मानते हैं। उनके अपने राजनीतिक उद्देश्य हैं। इन लोगों को तब तक नहीं समझाया जा सकता है, जब तक उन्हें उनके प्रयासों की निरर्थकता न समझा दी जाए। उन्हें दी गई छूट सिर्फ उनका मनोबल बढा देगी। उनकी तुष्टीकरण की भूख और यादा ही जाग्रत होगी। उनसे लडना और उन्हें पराजित करना आवश्यक है।
एक और वर्ग हिंदी विरोधियों का ऐसा भी है, जो पूर्ण रूप से राष्ट्रवादी है। इनमें से कुछ संस्कृत भाषा के हिमायती हैं। उनका पक्ष म*ाबूत है। लेकिन हिंदी के विरोध और उसके इस्तेमाल में देरी करके वे किसी भी तरह संस्कृत भाषा की मदद नहीं कर रहे। हालाँकि संस्कृत का पक्ष म*ाबूत है, लेकिन एक भाषा के तौर पर उसकी स्थिति अभी कम*ाोर है। जहाँ तक हिंदी का प्रश्न है, वे लोग जो कि हिंदी-विरोधी हैं, वे भी आज इसे सीखने का प्रयास कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि पिछले कई वर्षों में हिंदी ने अपना एक स्थान बना लिया है। आज इसकी स्थिति को न*ारंदा*ा नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में, अगर अंग्रे*ाी को फलने-फूलने और अपना वर्चस्व स्थापित करने दिया गया तो संस्कृत भाषाओं के अध्ययन में सबसे निचले पायदान पर पहुँच जाएगी। तीन भाषाओं के चुने जाने पर हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा चुनी जाएगी। यह स्वाभाविक तौर पर संस्कृत को बाहर कर देगी, जो कि स्थानीय भाषा के लिए भी घातक है। लेकिन आज लोग ऐसा ही कर रहे हैं।
अगर हिंदी आती है तो वर्तमान में अंग्रे*ाी पर *ाोर दिया जाता है, वह भी खत्म हो जाएगा। अगर एक भाषा के तौर पर अंग्रे*ाी पढाई भी जाएगी तो उसमें दक्षता एक अनिवार्य आवश्यकता नहीं रह जाएगी। उस दिन हम हिंदी और संस्कृत के अध्ययन को स्थानीय भाषाओं के साथ जोड पाएँगे।
सभी भारतीय भाषाएँ राष्ट्रीय भाषाएँ हैं। संस्कृत पूरे भारत की भाषा है। लेकिन हिंदी भाषा भारत की पहचान है, इस वजह से सभी सरकारी कामकाज के लिए उसी को आधिकारिक भाषा का सम्मान मिलना चाहिए। स्थानीय भाषाओं को राज्यों की भाषा के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन केंद्र के कई विभागों में दो भाषाओं की ही नीति होगी। डाक और संचार विभाग, राजस्व, रेलवे जैसे विभागों में केंद्र और राज्य दोनों की भाषाएँ इस्तेमाल होंगी। संस्कृत का इस्तेमाल उत्सवों, विशेष कार्यक्रमों के मौकों पर किया जा सकता है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्यों अंगे**ाी को फारसी की तरह जाना होगा
तीनों भाषाओं के संबंध, और उनके तालमेल के बारे में कोई संशय नहीं रहना चाहिए। इतिहास पहले ही भविष्य को तय कर चुका है, हमें बस उसे दोहराना है। अगर सरकार जनता की सुनती है तो उसे भी वही करना होगा, जो भाषा के संबंध में लोग करते हैं। लोगों के कारण ही आज संस्कृत एक मृत भाषा नहीं है, उन्होंने ही इसे जीवित रखा है, साथ ही अपने जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान भी दिया। यह जनता के ही प्रयासों का नती*ाा था कि हिंदी भारत देश की भाषा बन पाई। सरकारों ने अपनी तरफ से लोगों पर अंग्रे*ाी थोपने का पुर*ाोर प्रयास किया है। गौर करने लायक है कि पिछले १५० सालों के लगातार प्रयासों के बाद भी आज दो प्रतिशत लोग ही इसे सीख पाए हैं। अगर इसे बोलने और इस्तेमाल करनेवालों की गिनती देखेंगे तो वह और भी कम निकलेगी।
संविधान को अपनाए जाने के बाद से भारत की जनता ने राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान कम कर दिया, यादातर ची*ों सरकार के हाथ में छोड दी गईं। सरकारें कभी राष्ट्र नहीं बनाती, वे एक देश पर अच्छा या बुरा शासन कर सकती हैं। जब प्रश्न भाषा का आता है तो जनता की भागीदारी और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लोगों की बोली, उनकी आवा*ा ही भाषा बनती है और सरकारों को उसी का इस्तेमाल करना पडता है।
अगर सरकार भाषा तय कर पाती तो सदियों पहले ही फारसी पूरे देश की भाषा बन चुकी होती। सदियों तक दिल्ली दरबार में बैठे सत्ताधारियों ने फारसी भाषा में ही राज-काज चलाया, लेकिन जनता ने अपनी भाषा में काम करना जारी रखा। नतीजा यह हुआ कि मुगलों को भी आखिर लोगों की भाषा, खडी बोली ही अपनानी पडी। दरबार के प्रभाव के कारण यही खडी बोली उर्दू जैसी हिंदी में तब्दील हो गई। लेकिन इस उर्दू को भी जनता ने नहीं अपनाया। सूरदास और तुलसी जैसे लोककवि अवधि और ब्रजभाषा में ही अपना काव्य सृजन करते रहे।
हिंदी-राष्ट्र के प्रतिरोध की भाषा
यद्यपि भारत के साहित्य में उर्दू का योगदान कम नहीं है, मगर यह राष्ट्र के प्रतिरोध की भाषा कभी नहीं बन सकी। इस कार्य के लिए हमें लोगों की भाषा चाहिए थी और इस दिशा में हिंदी एक स्वाभाविक चुनाव था। मुझे यह जानकारी नहीं है कि देश की राजधानी दिल्ली में होने का और उसके आसपास के इलाकों में खडी बोली के इस्तेमाल होने का हिंदी के ऐतिहासिक महत्त्व और पूरे भारत की भाषा चुने जाने में क्या योगदान है? पिछले कई वर्षों के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये हमारी स्वाधीनता की पहचान है और किसी भी विदेशी शासन से हमें अलग सिद्ध करती है। यह स्वाभाविक ही था कि राष्ट्र निर्माण की सभी गतिविधियों में हिंदी हमारे सेनानियों के लिए एक
माध्यम बनी।
ऐसा नहीं है कि हिंदी ने फिरंगियों के खिलाफ जंग में ही हमारा साथ दिया था, मुगलों के खिलाफ लडते शिवाजी के दरबार में भी हिंदी कवियों को प्रश्रय मिलता था, जिसमें कवि भूषण१ का नाम प्रमुख है। छत्रसाल ने जब पेशवा बाजीराव प्रथम के पास मदद के लिए संदेश भेजा था तो हिंदी में ही लिखा था-
‘हे बाजीराव! मैं स्वयं ऐसी स्थिति में फँस गया हूँ, जिसमें कभी गजेंद्र फँस गए थे। रणभूमि में विजयश्री ओझल होती जा रही है, इसलिए मेरे सम्मान को बचाने और विपत्ति से उबारने के लिए आप
तुरंत पधारें।’
सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई हो सकती है, वह खुद को जनता सरकार बुलाना भी शुरू कर सकती है, लेकिन सरकारों के तरीके हमेशा एक से ही होते हैं। इसके आलावा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह सत्ता ब्रिटिश परंपराओं पर आधारित है, इसलिए जनता जो करती, यह वही नहीं करेगी। जो भी भाषा सरकारी सरपरस्ती में पनपेगी, वह कभी भी जनता की भाषा हो ही नहीं सकती। जनता की भावनाओं को दरशाने वाली एक जीवंत भाषा सरकारी प्रयासों से नहीं स्थापित हो सकती है। हमें इतिहास के ‘रीतिकाल’ की हिंदी को जनता के संघर्षों, उसकी अपेक्षाओं की भाषा ही रहने देना चाहिए। ये विदेशी शासन को उखाड फेंकने के लिए एकजुट होते लोगों की भाषा थी। आज फिर इसे सरकार को विदेशों की पैरोकार होने से रोकनेवाले जनतंत्र की भाषा बने रहने देना होगा। हिंदी का विकास एक ‘प्रतिरोध’ की भाषा के तौर पर ही हुआ है, इसका उत्थान तभी तक संभव है, जब तक यह प्रतिरोध की भाषा बनी रहे।
हम याचना नहीं करेंगे ः हम चुनौती देंगे
लोगों ने काफी आराम कर लिया है। सरकार से हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग हेतु मनुहार करते भी काफी समय निकल गया। अगर वे प्यार से नहीं मानते तो उन्हें उनके पदों से उखाड फेंककर भी अपनी मातृभाषा के लिए जगह बनानी होगी। ये हमारी मातृभाषा है और भारत की परंपरा है कि न तो हम अपने छोटे बच्चों को किसी और को पालने के लिए देते हैं, न ही अपने वृद्धों को किसी वृद्धाश्रम में भरती कर देते हैं। उनकी *ाम्मेदारी हम खुद ही उठाते हैं।
भाषा किसी शून्य में नहीं पनपती, न ही सरकारी फाइलों में इसका विकास संभव है। वे लोगों के साथ जीती है और लोग भी भाषा के *ारिये ही जीवनयापन करते हैं। इसलिए आनेवाली २६ जनवरी, १९६५ से हमें प्रण करना चाहिए कि हम केवल अपनी ही भाषा का इस्तेमाल करेंगे। हम सरकार के नक्शेकदम पर नहीं चलेंगे, बल्कि सरकार को जनता के बनाए रास्ते पर चलना होगा। अगर वह हमारे फैसले मानने से इनकार करती है, तो उसकी जडों को खोद दिया जाएगा। जनता के अलावा और कौन है, जो एक सरकार का भरण-पोषण कर सकता है? पिछले अठारह वर्षों से हमें एक झूठे सम्मोहन में बाँधा गया है, ये झूठ कहा गया है कि सरकारें जनता का पालन पोषण करती हैं। हमें अपनी भूल सुधारनी होगी।
अगर हम अपनी मातृभाषा के प्रति अपनी *ाम्मेदारी समझ लेंगे; तो सरकार के पास गिरवी रखी जनता की शक्ति हमें वापस मिल जाएगी। इससे हमारे न*ारिए में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा। हम जिस जडता की अवस्था में हैं, उससे हमें मुक्ति मिलेगी। सरकार की विफलताओं से हताश जनमानस में एक नई चेतना का संचार होगा। यह इतिहास की धारा को बदल देगा। इस गणतंत्र दिवस को सचमुच भारत के जन-गण का दिन बना दीजिए। सरकारें हो सकता है नाकाम हुई हों, मगर जनता असफल नहीं होगी।
हम संघर्ष करेंगे और हम जीतेंगे। हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ हमारे राष्ट्र की एकता की पहचान बनेंगी। ये ही देश के उत्थान और उसकी सफलता की
परिचायक बनेंगी।