एकात्म मानववाद

दीनदयाल उवाच


......व्यक्ति के विकास और समाज के हित का संपादन करने के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की कल्पना की गई है। धर्म, अर्थ और काम एक दूसरे के पूरक और पोषक हैं। मनुष्य की प्रेरणा का स्रोत तथा उसके कार्यों का मापक किसी एक को ही मानकर चलना अधूरा होगा। यद्यपि अर्थ और काम के बिना धर्म अर्थहीन और बेकाम है, फिर भी बिना धर्म के अर्थ और काम की सिद्धि नहीं।
अनेकदा धर्म को मत या म*ाहब समझकर उसके गलत अर्थ लगाए जाते हैं, यह भूल अंग्रे*ाी के ‘ऋद्गद्यद्बद्दद्बश्ाठ्ठ शब्द का धर्म से अनुवाद करने के कारण हुई है। धर्म का वास्तविक अर्थ है-वे सनातन नियम, जिनके आधार पर किसी सत्ता की धारणा और जिनका पालन कर वह अभ्युदय और निः श्रेयस की प्राप्ति की प्राप्ति कर सके। किसी स्थिति विशेष या वस्तु विशेष का विचार करते समय सनातन शब्द सापेक्ष हो जाता है। अतः जहाँ धृति, क्षमा आदि धर्म के लक्षणों में कोई परिवर्तन नहीं होता, वहाँ देशकाल एवं स्थितियों के परिवर्तन के साथ अन्य धर्म बदल जाते हैं। फिर भी इस संक्रमणशील जगत में धर्म ही वह तत्त्व है, जो स्थायित्व लाता है। इसलिए धर्म को ही नियंता माना गया है एवं प्रभुता उसी में निहित है।
भारतीय राज्य का आदर्श धर्मराज्य रहा है। धर्मराज्य ञ्जद्धद्गश्ाष्ह्म्ड्डष्4 अथवा म*ाहबी राज्य नहीं। यह एक असांप्रदायिक राज्य है। सभी पंथों और उपासना पद्धतियों के प्रति सहिष्णुता एवं समादर का भाव भारतीय राज्य का आवश्यक गुण है। अपनी श्रद्धा और अंतःकरण की प्रवृत्ति के अनुसार प्रत्येक नागरिक को उपासना का अधिकार अक्षुण्ण है तथा राज्य के संचालन अथवा नीति निर्देशन में किसी भी व्यक्ति के साथ मत या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता। यही धर्म पर आधारित राज्य है।
धर्मराज्य किसी व्यक्ति को अथवा संस्था को सर्वसत्ता संपन्न नहीं मानता प्रत्येक व्यक्ति नियमों और कर्तव्यों से बँधा हुआ है। कार्यपालिका, विधायिका और जनता सबके अधिकार धर्माधीन ही हैं। अंग्रे*ाी की विधि के अनुसार शासन (ऋह्वद्यद्ग श्ाद्घ रुड्ड2) धर्मराज्य की कल्पना को व्यक्त करनेवाला निकटतम शब्द है। निरंकुश और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को रोकने तथा लोकतंत्र को स्वच्छंदता में विकृत होने से बचाने में धर्मराज्य ही समर्थ है। राज्यों की अन्य कल्पनाएँ अधिकारमूलक हैं, किंतु धर्मराज्य कर्तव्यभाव प्रधान है।
भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा लेकर चलनेवाले भी कुछ पक्ष हैं। किंतु वे भारतीय संस्कृति की समानता को उसकी गतिहीनता समझ बैठे हैं, और इसलिए बीते युग की पीढियों अथवा यथास्थिति का समर्थन करते हैं। संस्कृति के क्रांतिकारी तत्त्व की ओर उनकी दृष्टि नहीं जाती। वास्तव में समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियाँ जैसे छुआछूत, जातिभेद, दहेज प्रथा, मृत्युभोज, नारी अवमानना आदि तथा *ामींदारी, जागीरदारी आदि व्यवस्थाएँ भारतीय संस्कृति के और समाज के स्वास्थ्य की सूचक नहीं बल्कि रोग के लक्षण हैं। जातिगत भेदभाव तो सहिष्णुता की कमी, व्यावसायिक श्रम विभाजन की परिस्थितियों में परिवर्तन के बाद भी चलते रहने पर वे रूढियाँ बन जाती हैं। भारत के अनेक महापुरुष, जिनकी भारतीय परंपरा और संस्कृति के प्रति अनन्य निष्ठा थी, इन बुराइयों के विरुद्ध लडे। अनेक अनुपयुक्त आर्थिक और सामाजिक विधानों की हम जाँच करें तो पता चलेगा कि वह हमारी सांस्कृतिक चेतना के क्षीण होने के कारण युनानुकूल परिवर्तन की कमी से बनी हुई रूढियों और परकीयों के साथ संघर्ष की परिस्थिति से उत्पन्न समय विशेष की आवश्यकता की पूर्ति की माँग को पूरा करने के लिए अपनाए गए उपाय अथवा परकीयों द्वारा थोपी गई या उनका अनुकरण कर स्वीकार की गई व्यवस्थाएँ मात्र हैं। भारतीय संस्कृति के नाम पर उन्हें जीवित रखना अपने निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए मात्र हास्यास्पद प्रयत्न हैं। और एक बात, कि जितना भी प्राचीन है, वह सब हिंदू संस्कृति नहीं है। संस्कृति इतिहास से भिन्न है। हमारे जातीय जीवन में अनेक अच्छी बुरी बातें घटी हैं। जो अच्छा है, उसका पुरस्कार करना तथा शेष का परिष्कार अथवा तिरस्कार ही प्रकृति को संस्कृति बनाता है। फिर भी हिंदू जीवन की विसंगतियाँ हिंदू दर्शन अथवा संस्कृति की विसंगतियाँ नहीं हैं, यह अच्छी तरह से समझना चाहिए।
संस्कृति के रूपों और तत्त्वों में भेद करना आवश्यक है। संस्कृति के कतिपय उपकरण तो रूप मात्र हैं और कतिपय उसके आधारभूत तत्त्व है। ऐसा कभी-कभी प्रतीत होता है कि इस युग प्रवाह में हिंदू जीवनदर्शन और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के कुछ अंग अर्थहीन और अनावश्यक हो गए हैं। आज के बदले हुए संदर्भों में रूपों का मोह नहीं करना चाहिए। हमें अपनी दृष्टि तत्त्वों की ओर केंद्रित करनी चाहिए। अब जैसे जाति व्यवस्था है। यह तो रूप है। तत्त्व है एकात्मा के आधार पर समाज की व्यवस्था। ये रूप जब तक उपयोगी हैं अथवा हानिकारक नहीं है, हम इन्हें चलने दें परंतु तत्त्व की रक्षा महत्त्वपूर्ण है, हम उसकी रक्षा अवश्य करें।......
हमारी संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए, जो ‘यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे’ के न्याय के अनुसार समष्टि का जीव मान प्रतिनिधि एवं उसका उपकरण है। भौतिक उपकरण मानव के सुख के साधन हैं, साध्य नहीं। जिस व्यवस्था में भिन्न रुचि प्रवृत्तियों से युक्त मानव का विचार केवल एक औसत मानव से हो अथवा शरीर-मन-बुद्धि-आत्मा युक्त अनेक ऐषणाओं से प्रेरित पुरुषार्थ चतुष्ट्यशील संपूर्ण मानव के स्थान पर एकांगी मानव का ही विचार किया गया हो, वह अधूरी है। हमारा आधार एकात्म मानव है, जो अनेक एकात्म समष्टियों का एक साथ प्रतिनिधित्व करने की क्षमता रखता है। मानवतावाद या एकात्मवाद अथवा एकात्म मानवतावाद के आधार पर हमें संपूर्ण व्यवस्था का विकास करना होगा।......