क्रांति का अग्रदूत विनोबा

दीनदयाल उवाच


भूमिदान यज्ञ स्वयं क्रांति का अग्रदूत है। समाज में समता का भाव नष्ट होकर जब-जब विषमता उत्पन्न हो जाती है तथा उसका संतुलन बिगड जाता है, तब-तब समाज की धारणा कठिन होने पर व्यक्ति की धारणा भी दुष्कर हो जाती है।
संपत्ति के ही नहीं, सभी प्रकार के अधिकारों के पुनर्वितरण तथा बदली हुई परिस्थिति के अनुसार जीवन के सभी मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए ही विनोबाजी का क्रांतिकारी मार्ग है। इसकी सफलता के विषय में संदेह का कोई कारण ही नहीं, क्योंकि विषमता में समता उत्पन्न करने का कार्य तो प्रकृति सदा ही करती रहती है।
भारत में क्रांति तो सुनिश्चित है। इस क्रांति को हम अहिंसक एवं भारतीय मार्ग से करके क्रांति से नवजीवन प्राप्त कर राष्ट्रीय परंपरा की रक्षा और उसको पुष्ट करना चाहते हैं अथवा क्रांति के दौरान ही अपना जीवन समाप्त कर दूसरों के मानसिक दास बनकर अपनी परम्पराओं को सदा के लिए समाप्त कर देना चाहते हैं? विनोबा की क्रांति जीवनदायिनी तथा राष्ट्रीय नवचैतन्य को स्फूर्त करने वाली है। यही है इस मार्ग की विशेषता।
आचार्य विनोबा का भूमिदान यज्ञ आंदोलन ज्यों-ज्यों गति पकडता जा रहा है तथा जनसमुदाय से उसे समर्थन प्राप्त होता जा रहा है, त्यों-त्यों उसके आलोचक की संख्या भी बढती जा रही है । अधिकांश आलोचना का कारण तो भूमिदान यज्ञ के संबंध में अज्ञान है। किंतु कुछ आलोचना निहित स्वार्थों की प्रेरणा से भी होती है। ऐसे लोग भी हैं, जो भूमिदान यज्ञ में कांगे*स की गंध पाकर, उसे कांगे*सियों की अन्य बहुत सी योजनाओं के समान दिखावटी एवं अंत में कांगे*सजनों अथवा कांगे*सदल की स्वार्थसिद्धि का एक साधन मात्र समझते हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जिनकी श्रद्धा भारतीय जीवन प्रणाली से हट गई है और इसलिए भारतीय आधार पर अथवा भारतीय परिभाषा का प्रयोग करने वाली प्रत्येक योजना उन्हें रूढिवादी एवं प्रतिगामी मालूम देती है। पश्चिम के आदर्श का अंधानुकरण करने वालों को यह योजना बहुत ही प्राचीन लगती है, सरकार की पंचवर्षीय योजना में अभिरुचि रखने वाले सरकारी अथवा गैर-सरकारी अधिकारी भी भूमिदान यज्ञ की अपनी कल्पनाओं और योजनाओं के लिए घातक समझते हैं। कुछ लोग इसे एक संत की सनक समझते हैं तो कुछ विनोबाजी को गांधीजी के स्थान पर बिठाने का एक योजनाबद्ध प्रयत्न। ऐसे भी लोग हैं, जो सोचते हैं कि यह आंदोलन कम्युनिज्म को रोकने के लिए किया गया है, किंतु उनका विश्वास है कि यह इसमें सफल नहीं हो सकेगा।
योजना की अव्यावहारिकता की शिकायत तो आप, मैं और वे पढे-लिखे लोग करते हैं, जो भूमि से कोसों दूर रहकर दो आने के अखबार के सहारे अपनी सर्वज्ञता के दावे को पुष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। कुछ इस योजना में भूमि के टुकडे-टुकडे हो जाने तथा लोगों को उद्योग-धंधे से विमुख करके कृषि के ऊपर भार बढाने के चिह्न देखते हैं। मानवात्मा की सद्प्रवृतियों में श्रद्धा न रखने वाले कुछ उदाहरणों को लेकर इस बात का ही ढिंढोरा पीटते रहते हैं कि दान में दी गई सम्पूर्ण *ामीन ऊसर, बंजर अथवा झगडे की है। सरकारी दबाव के कारण दिया गया दान शास्त्रीय व्याख्या की बाल की खाल निकालकर दान नहीं कहा जा सकता और इसलिए भूमिदान यज्ञ पूर्णतः निराधार है, ऐसा भी कुछ लोगों का मत है। एक जमींदार महाशय तो इस आंदोलन से इसीलिए असंतुष्ट थे कि इसमें केवल भूमि की समस्या का विचार किया गया है किंतु शहरों में रहने वाले तथा पटरियों पर सोने वालों की कोई चिंता नहीं की गई। उनका मत है कि प्रायः सभी संस्थाओं में शहरियों की बहुतायत होने के कारण वे उन योजनाओं को लेने के बजाय जिनमें शहर वाले अमीरों के हितों पर आघात होता हो, उनको लेते हैं, जो शहर वालों को अछूता छोडकर गाँववालों को हानि पहुँचाती हैं। गरज यह है कि भिन्न-भिन्न लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से योजना की आलोचना करते हैं तथा उसके पीछे उनका अज्ञान अथवा किसी-न-किसी प्रकार का निहित स्वार्थ छिपा हुआ है। आवश्यक है कि हम इस आंदोलन को सही दृष्टि से देखें।
भूमिदान यज्ञ को समझने के पूर्व हमको अपने मन से इस धारणा को निर्मूल कर देना चाहिए कि यह आंदोलन क्रांति को रोकने के लिए है। वस्तुस्थिति तो यह है कि यह स्वयं क्रांति का अग्रदूत है। समाज में समता का भाव नष्ट होकर जब-जब विषमता उत्पन्न हो जाती है तथा उसका संतुलन बिगड जाता है, तब समाज की धारणा भी दुष्कर हो जाती है। फलतः व्यक्ति या तो अपनी धारणा के लिए दूसरों का गला घोंटता है अथवा स्वयं तिल-तिल गलकर मृत्यु सम जीवन व्यतीत करता हुआ हैजे के रोगी के समान स्वयं को तो मारता ही है, आसपास के वातावरण को दूषित करके उनकी मृत्यु का भी कारण बनता है। गीता में ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत’ की पंक्ति में इंगित किया गया है। धर्म के बिना धारण कैसे संभव है। ऐसी परिस्थिति में धर्म की स्थापना करना ही ईश्वरीय कार्य है और उसका संपादन क्रांति के द्वारा ही होता है।
क्रांति हिंसक और अहिंसक दोनों ही मार्गों से हो सकती है। समाज का संतुलन करने में जिनकी अवस्था का परिवर्तन करना होता है, वे चाहे अमीर हों या गरीब, अधिकार संपन्न हों या अधिकारच्युत, उनका मानसिक स्तर जब तक नवीन स्तर के अनुरूप नहीं आता, तब तक क्रांति अहिंसक नहीं कहलाएगी। समाज के असंतुलन का ज्ञान होने पर हो सकता है कि अधिकार सम्पन्न अपने अधिकार को स्वतः ही छोड दे अथवा विभिन्न साधनों का उपयोग करके उससे उसके अधिकार छुडवाए भी जाएँ, दोनो ही हालातों में वह क्रांति अहिंसक ही कहलाएगी। दुर्योधन ने यद्यपि पांडवों को उनका राज्य नहीं लौटाया तथा उसके लिए महाभारत का युद्ध हुआ किंतु दुर्योधन यह बारंबार अनुभव करता रहा कि मैं राज्य न लौटाकर अनुचित ही कर रहा हूँ। उसने यही कहा ‘जानामि धर्म न च मे प्रवृत्ति, जानाम्यधर्म न च मे निवृत्ति। केनामि देवेन ह्रदि स्थितेन यथा नियुक्तिा,ऽस्मि तथा करोमि।’ कामुक प्रवृत्ति का मनुष्य किसी सुंदर स्त्री को देखकर अंतःपे*रणा से यदि अपने मन को वश में नहीं कर पाता तो उसे लोकलज्जा एवं कानून का भय इस दुष्कृत्य से रोकता है। साथ ही वह यह भी अनुभव करता है कि उसे इस दुष्कृत्य से रोकने वाला कानून उसे रुचिकर चाहे न हो, किंतु न्याय्य अवश्य है।
इसके विपरीत कानून, लोकलज्जा, युद्ध और आदेश आदि कोई बात जब अधिकार-सम्पन्न में यह भाव पैदा करती है कि उसके न्याय अधिकारों का अपहरण किया जा रहा है तथा दूसरी ओर अधिकारविहिन में नवीन अधिकारों की प्राप्ति से उत्पन्न होने वाले उत्तरदायित्व को उत्पन्न करने के स्थान पर स्वार्थ लोभ तथा दूसरों के प्रति घृणा पैदा करती हो तो कहना होगा कि यह मार्ग हिंसक है तथा इस प्रकार की क्रांति बाह्य संतुलन को ठीक करते हुए भी आत्मा के संतुलन को बिगाड देती है। जिसका परिणाम यह होता है कि इस क्रांति में ही उसके विनाश के बीज रहते हैं तथा वह स्थायी नहीं रह पाती।
आचार्य विनोबा का भूमिदान यज्ञ इस प्रकार की अहिंसक क्रांति है। इस क्रांति का काम केवल भूमि तक ही सीमित नहीं अपितु सर्वव्यापी है। भगवान् कृष्ण की क्रांति का प्रारंभ जैसे मथुरा जाने वाले दूध और मक्खन पर रोक लगाने से प्रारंभ हुआ था, वैसे ही इस युग की सर्वांगीण क्रांति का श्रीगणेश भूमिदान यज्ञ से हो रहा है। भारत में भूमि की समस्या प्रमुख होने से स्वाभाविक है कि पहले इसे ही हाथ में लिया जाए। विषमता के शेष कारण या तो इसके साथ ही दूर हो जाएँगे अथवा इसके बाद ही। एक सज्जन जो कई मकानों के मालिक हैं, ने मुझसे कहा कि यदि भूमिदान यज्ञ हो रहा है तो गृहदान यज्ञ क्यों नहीं करते? उनका मतलब था कि मकानदान यज्ञ की कल्पना ही जैसे असंभव है, वैसे भूमिदान यज्ञ की कल्पना भी हास्यापद होगी। मैंने कहा कि गृहदान यज्ञ भी अवश्य ही होगा, उसका सूत्रपात आपने ही कर दिया है। अवश्य ही थोडे दिन में आपको लगेगा कि आप जिस मकान को अपना कह रहे हैं, वह किरायेदार को दे दिया जाए, अथवा आफ आलीशान मकान के फालतू हिस्से में कोई गृहविहीन बस जाए तो कोई अन्याय नहीं। सर्वसाधारण की बात एक प्रकार की धारणा बनी कि फिर कानून भी बनाया जा सकता है।
संपत्ति के ही नहीं, सभी प्रकार के अधिकारों के पुनर्वितरण तथा बदली हुई परिस्थिति के अनुसार जीवन के सभी मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए श्री विनोबाजी का क्रांतिकारी मार्ग है। इसकी सफलता के विषय में संदेह का तो कोई कारण ही नहीं, क्योंकि विषमता में समता उत्पन्न करने का कार्य तो प्रकृति सदा ही करती रहती है। कुर्सी पर बैठकर यदि आप उसे एक ओर झुकाकर उसका संतुलन बिगाडें तो भूमि की आकर्षण शक्ति आपका संतुलन अवश्य ठीक करेगी, किंतु उसमें आप धराशायी होंगे तथा आपको चोट भी लगेगी। अच्छा हो कि आप अपना बल लगाकर ही उसे ठीक कर लें। भारत में क्रांति तो सुनिश्चित है। इस क्रांति को हम अहिंसक एवं भारतीय मार्ग से करके क्रांति से नवजीवन प्राप्त कर अपनी राष्ट्रीय परंपरा की रक्षा और उसको पुष्ट करना चाहते हैं अथवा क्रांति के दौरान अपना जीवन समाप्त कर दूसरों के मानसिक दास बनकर अपनी परंपराओं को सदा के लिए समाप्त कर देना चाहते हैं। विनोबा की क्रांति जीवनदायिनी तथा राष्ट्रीय नव चैतन्य को स्फूर्त करने वाली है। यही है इस मार्ग की विशेषता।
जहाँ तक भूमिदान यज्ञ का प्रश्न है, यह तो वामन का पहला पग है। अभी तो अगले पग बाकी हैं, जिनमें भूमिदान ही नहीं, संपत्ति के समविभाजन के लिए आध्यात्मिक, धार्मिक, वैज्ञानिक, सामाजिक एवं विकेंद्रित आर्थिक व्यवस्था संबंधी सभी साधनों का उपयोग करना पडेगा।
भूमिदान यज्ञ के इस क्रांतिकारी दृष्टिकोण को यदि हमने समझ लिया तो इस आंदोलन से निहित स्वार्थों की रक्षा अथवा इसके द्वारा व्यक्ति या दल के स्वार्थों की पूर्ति की इच्छा या इस पूर्ति की सभावना से भय का कोई कारण नहीं रहेगा। कारण, अहिंसक क्रांति किसी भी प्रकार के स्वार्थों को बद्धमूल नहीं होने देती। यह तो प्रकृति के नियम के समान बिना पक्षपात के नियम के सभी का भला करती है।