भारतीय पथ का अन्वेषी महामनीषी दीनदयाल

डॉ इन्दुशेखर तत्पुरुष



दीनदयाल उपाध्याय उन गिने-चुने राष्ट्रनायकों में से हैं जिन्होंने स्वतन्त्र भारत की राजनीति में भारतीयता और उसके ‘मौलिक देसीपन’ की प्राणप्रतिष्ठा की। गांधीजी के दुःखद अवसान के बाद भारत के इस ‘मौलिक देसीपन’ की रक्षा करने वाला वैसा कोई दूसरा मार्गदर्शक न था। देश के राजनीतिक पटल पर आई इस रिक्तता को दीनदयाल उपाध्याय ने पूरा किया। अन्तर इतना अवश्य था कि गांधीजी का ध्येय भारत को अंग्रेज और अंग्रेजीयत के चंगुल से मुक्त कराना था वहीं, दीनदयाल जी के आने तक भारत तो स्वतन्त्र हो गया पर भारतीयता पहले के बनिस्पत और अधिक गुलाम हो गई। इसका कारण यह था कि किसी नवस्वतंत्र राष्ट्र की सर्वोच्च प्राथमिकता उसका पुनर्निर्माण करना होता है और उस समय यह मान लिया गया था कि विकास के सारे रास्ते ‘पश्चिमीपथ’ या ‘अंग्रेजीयत’ में से होकर ही आते-जाते हैं। नवनिर्माण और विकास का आधार अनिवार्यतः पश्चिम-परस्ती है। दीनदयाल जी ने इस बौद्धिक गुलामी का प्रखर प्रतिरोध करते हुए अपना सारा जीवन ‘विकास के भारतीयपथ’ की खोज में लगा दिया।
भारतीय राजनीति में दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के निर्माता के रूप में जाने जाते हैं। गुरु जी की प्रेरणा से एक सशक्त विपक्षी दल का ढांचा खडा करने में उन्होंने स्वयं को अर्पित कर दिया। प्रजातांत्रिक प्रणाली में यह कोई कम महत्वपूर्ण उपलब्धि नहीं है। एक सजग और समर्थ विपक्ष के बिना लोकतन्त्र पक्षाघात के रोगी की तरह अधूरा होता है और दीनदयाल जी ने इस जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा और नैतिकता के साथ निभाया। पर दीनदयाल जी का महत्व केवल इस कारण ही नहीं है। उनका महत्व उस देन से है जो उन्हें अप्रतिम और कालजयी बनाती है। उनकी यह देन है ‘एकात्म मानवदर्शन’ का प्रवर्तन।
हाल ही स्वतन्त्र हुए भारत का नेतृत्व देश के विकास के जितने भी विश्वसनीय रास्ते जानता था या उसने सुन रखे थे -विकासवाद, समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद, मानववाद- ये सारे विचार विदेषी मानसिकता और विदेषी परिस्थितियों की उपज थे। दीनदयाल जी ने इन सभी का अध्ययन- मनन किया और प्रश्न उठाया कि क्या हजारों वर्षों से चली आ रही हमारी भारतीय चिन्तन परम्परा में प्रगति का कोई मार्ग नहीं है? कोई विकास का मॉडल नहीं है? कोई पैमाना नहीं है? जीवन का सार्वभौम दर्शन नहीं है जो नये जमाने की नई चुनौतियों का मुकाबला कर सके? इन्हीं प्रश्नों की खोज में दीनदयाल जी ने जो मार्ग सुझाया उसका नाम था ‘एकात्म मानवदर्शन’ या ‘एकात्म मानववाद।’ यह एकात्म मानवदर्शन दीनदयाल जी की भारत ही नहीं वरन् सारे संसार को अनूठी देन है। हालंाकि दीनदयाल जी बारम्बार यह दोहराते हैं कि यह कोई उनके द्वारा खोजा गया नया दर्शन नहीं है यह तो सनातन भारतीय चिन्तन परम्परा का समीकृत एवं युगानुकूल प्रतिपादन मात्र है।
दीनदयाल जी के इस दाय को प्रायः ‘विदेशी विचार बनाम स्वदेशी विचार’ के द्वन्द्व के रूप में देखा जाता है - जो निश्चय ही है भी- परन्तु इसमें एक और द्वन्द्व निहित था जिसे प्रायः अलक्षित ही कर दिया जाता है। उनके द्वारा भी जो दीनदयाल जी का फोटो लगाकर माला-फूल चढाते हैं और उनके द्वारा भी जो दीनदयाल जी का घोर विरोध करते हैं। इस द्वन्द्व को वे तो अनदेखा करते ही हैं जो दीनदयाल जी के अकारण विरोधी हैं, किन्तु जो दीनदयाल जी के ध्वजवाहक हैं वे भी प्रायः इसे अनदेखा करते आये हैं। दीनदयाल जी को इन कु-पाठों से बचाने के लिए इसे ध्यान से देखने-परखने की आवश्यकता है। दीनदयाल जी के सामने एक ओर तो ‘‘विदेशियों के द्वारा- विदेशियों के लिए-विदेशियों की धरती पर’’ किए गये प्रयोगों की नकल को भारत में आयातित कर अंधाधुंध थोपे जाने की प्रवृत्ति बढती जा रही थी तो दूसरी ओर स्वदेशीय परम्परा के नाम पर कालातीत हुई रूढियों के विवेकहीन आरोपण की कामनाएं भी पंख पसार रही थीं। दीनदयाल उपाध्याय विवेकहीन अंधानुकरण के विरुद्ध थे। उनका ध्येय था ‘‘भारत के पारम्परिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखते हुए विकासमान विश्व के साथ चलते हुए आगे बढना।’’
यह कोई साधारण चुनौती नहीं थी। देश का तत्कालीन नेतृत्व भारत की राजनैतिक-सांस्कृतिक परम्परा की अवहेलना करने वाला सिद्ध हो रहा था । इसे चुनौती देने के कुछ प्रयत्न अवश्य किए जा रहे थे किन्तु वे प्रयत्न अपने अधिष्ठान, संस्थान और स्वरूप की दृष्टि से बौने साबित हो रहे थे। विराट और भव्य सत्ताधारी दल कांग्रेस के सम्मुख भारतीय विचार पर आधारित एक नया राजनीतिक दल खडा करते समय उस कालखण्ड में एक ओर रामराज्य परिषद् जैसा रूढिवादी दल था तो दूसरी ओर कट्टर हिन्दूवादी ‘हिन्दू महासभा’ जैसा दल भी था। स्वतंत्र पार्टी के रूप में भी एक दल था जिसमें पारम्परिक मान्यताओं के प्रतिनिधि तो थे किन्तु उनका नेतृवर्ग विकास के विदेशी मुहावरे में विश्वास रखता था। दीनदयाल जी की दृष्टि में ये सभी प्रयास अधूरे और खण्डित थे जो भारतीयता के ‘समग्र’ को प्रकट करने में असमर्थ थे। प्रखर संत स्वामी करपात्री का धर्मप्राण दल धर्म (पंथ ?) के रास्ते भारतीय गौरव का परचम लहराने को उत्सुक था किन्तु कालबाह्य रूढियों और सामाजिक कुरीतियों को त्यागने को तैयार नहीं था। करपात्री जी जिस तरह के भारत का स्वप्न देखते थे वह अपनी जडों को मजबूत करना नहीं वरन् जड को ही सम्पूर्ण वृक्ष मान लेना था, जिसमें विस्तृत शाखाओं, फूल- पत्तियों की कोई खास गिनती न थी। उसमें सर्वस्पर्शिता का अभाव था। दूसरी ओर स्वातन्त्र्य वीर सावरकर की हिन्दू महासभा थी। स्वतंत्र भारत में सावरकर की लोक प्रसिद्धि, उनका अनुभव और आयु की तुलना में दीनदयाल उपाध्याय की राजनीतिक कद-काठी बच्चे सरीखी थी। देश विभाजन की हिंसक घटनाओं से उपजे साम्प्रदायिक धु*वीकरण ने इस दल के लिए जमीन भी तैयार कर रखी थी। किन्तु हिन्दू महासभा अपनी प्रखर देशभक्ति के बावजूद द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मान्यता देती प्रतीत होती थी। कई मायनों में इनका राष्ट्रवाद भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जगह पश्चिमी राष्ट्रवाद से भी समानता रखता था। सावरकर जिस तरह के हिन्दुत्व के आधार पर भारत को गढना चाहते थे वह न दीनदयाल जी को अभिप्रेत था न उनके मार्गदर्शक श्री गोलवलकर गुरुजी को। उनकी दृष्टि में न करपात्री जी की रामराज्य परिषद सर्वस्पर्शी थी, न सावरकर की हिन्दू महासभा सर्वसमावेशी। एक वर्णीय अस्मिताओं से आगे नहीं बढता था तो दूसरा पांथिक अस्मिता को ही सम्पूर्ण राष्ट्र की अस्मिता का पर्याय समझ बैठा था।
दीनदयाल जी ने समग्रता का विचार रखा। उनके विचार को पुरातनपंथी या दक्षिणपंथी कहने वाले यह तथ्य जानबूझकर या अज्ञानतावश अनदेखा कर देते हैं कि परम्परा और आधुनिकता, भौतिकता और आध्यात्मिकता, राष्ट्रनिष्ठा और वैश्विक दृष्टि, व्यक्तिवाद और समाजवाद, हिन्दू और गैरहिन्दू आदि द्वन्द्वों का जैसा विवेकसम्मत संतुलन दीनदयाल जी के चिंतन में मिलता है वैसा समकालीन राजनीतिक विचारकों में दुर्लभ है। वे कहते है ‘‘अपने प्राचीन के प्रति गौरव का भाव लेकर वर्तमान का यथार्थवादी आकलन कर और भविष्य की महत्वाकांक्षा लेकर हम इस कार्य में जुट जाएं। हम भारत को न तो किसी पुराने समय की प्रतिच्छाया बनाना चाहते हैं और न रूस या अमरीका की अनुकृति।’’
25 सितंबर, 1965 को मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) में अपने सुप्रसिद्ध व्याख्यान में एकात्म मानववाद की प्रस्तावना रखते हुए उन्होंने कहा था- ‘ हमने अपनी प्राचीन संस्कृति का भी विचार किया है। किन्तु हम कोई पुरातत्ववेत्ता नहीं है। हम किसी पुरातत्व संग्रहालय के संरक्षक बनकर नहीं बैठना चाहते। हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण नहीं अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाना है। उसके आधार पर राष्ट्र की धारणा हो और हमारा समाज स्वस्थ एवं विकासोन्मुख जीवन व्यतीत कर सके, इसकी व्यवस्था करनी है। इस दृष्टि से हमें अनेक रूढियां खत्म करनी होंगी, बहुत से सुधार करने होंगे। जो हमारे मानव का विकास और राष्ट्र की एकात्मता की वृद्धि में पोषक हों, वह हम करेंगे और जो बाधक हो उसे हटायेंगे। ईश्वर ने जैसा शरीर दिया है, उसमें मीनमेख निकालकर अथवा आत्मग्लानि लेकर चलने की आवश्यकता नहीं है। पर शरीर में फोडा होने पर उसका ऑपरेशन तो आवश्यक है। सजीव और स्वस्थ अंगों को काटने की जरूरत नहीं है। आज यदि समाज में छुआछूत और भेदभाव घर कर गए हैं, जिसके कारण लोग मानव को मानव समझकर नहीं चलते और जो राष्ट्र की एकता के लिए घातक सिद्ध हो रहे हैं तो हम उनको खत्म करेंगे।’
आगे वे जिन वाक्यों से अपना यह ऐतिहासिक व्याख्यान पूरा करते हैं, वे दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद दर्शन के सत्व और संकल्पना को समझने की दृष्टि प्रदान करते हैं- ‘विश्व का ज्ञान और आज तक की अपनी संपूर्ण पंरपरा के आधार पर हम ऐसा भारत निर्माण करेंगे, जो हमारे पूर्वजों के भारत से अधिक गौरवशाली होगा तथा जिसमें जन्मा मानव अपने व्यक्तित्व का विकास करता हुआ सम्पूर्ण मानव ही नहीं, अपितु सृष्टि के साथ एकात्मता का साक्षात्कार कर ‘नर से नारायण’ बनने में समर्थ हो सकेगा। यह हमारी संस्कृति का शाश्वत, दैवी और प्रवहमान रूप है। चौराहे पर खडे विश्वमानव के लिए यही हमारा दिग्दर्शन है। भगवान् हमें शक्ति दे कि हम इस कार्य में सफल हों, यही प्रार्थना हैं।’
चार दिवसीय व्याख्यानमाला में दिये गये भाषणों में से उनका यह महत्वपूर्ण अंश उनके राजनीतिक- सामाजिक-सांस्कृतिक एजेंडे को व्यक्त करता है। क्या करना चाहिए और क्या छोडना चाहिए, यह उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है। दीनदयाल जी का यह एकात्म मानववाद किसी देश, जाति, पंथ या वर्ग के लिये नहीं अपितु संपूर्ण मानवता के लिये है। यह मानव मात्र के लिये नहंी अपितु संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण के लिये है। उन्होंने भारतीय चिंतन को समेकित कर इसके आधारभूत तत्वों को एक सूत्र में बांधा है। एकात्म मानववाद की अवधारणा व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा इन चारों के समन्वय और परस्पर-पूरकता पर आधारित है। मनुष्य जीवन के स्थायी सुख और सर्वांगीण विकास का रास्ता इन चारों सोपानों से गुजरते हुए ही प्राप्त किया जा सकता है।
जगजाहिर है कि दीनदयाल उपाध्याय मूलतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे और उनका सम्पूर्ण जीवन एक प्रतिपक्षी राजनैतिक दल को गढने-संवारने में लग गया। आधुनिक भारत के अधिकांश बुद्धिजीवियों और अकादमिक विद्वानों के लिए ये बात उनसे दूरी बनाने रखने के लिए पर्याप्त थी। वैचारिक अस्पृश्यता और निर्लज्ज असहिष्णुता का यह दौर स्वतंत्र भारत के आरंभिक काल से ही देखा जा सकता है। राज्यपोषित बुद्धिजीवियों के इस व्यवहार ने अनेक असाधारण प्रतिभाओं की उपेक्षा की है। इस वैचारिक हिंसा -अगर अस्पृश्यता हिंसा है तो- के शिकार अनेक मनीषी हुए हैं। दीनदयाल जी भी उनमें से एक रहे । यह वैचारिक संकीर्णता आधुनिक भारत की ही देन है।
दीनदयाल जी न केवल एक कुशल संगठनकर्ता थे अपितु मौलिक चिन्तक, पत्रकार, स्तम्भ लेखक, अर्थनीतिज्ञ, साहित्यकार भी उच्चकोटि के थे। परन्तु इन सब गुणों से भी दुर्लभ गुण था उनका उज्ज्वल चरित्र और सादगीपूर्ण निष्कलंक जीवन। वे कोरे सिद्धांतकार ही नही थे वरन् धरातल पर कार्य करने वाले कर्मयोगी थे। अपने सिद्धांतों को उन्होंने अपने आचरण में भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ निभाया। जौनपुर लोकसभा उपचुनाव में वे जनसंघ के प्रत्याशी थे। वहां राजपूत और ब्राह्मण समुदाय के लोगों का वर्चस्व था। उनके राजपूत प्रतिस्पर्धी द्वारा जातिवाद का सहारा लिया जा रहा था। कार्यकर्ताओं ने जब उनसे ब्राह्मणवाद चलाने की बात रखी तो वे बहुत नाराज हुए और कहा कि ‘‘सिद्धान्त की बलि चढाकर जातिवाद के सहारे मिलने वाली विजय, सच पूछो तो, पराजय से भी बुरी है। ऐसी विजय हमें नहीं चाहिए।’’ अंततः दीनदयाल जी चुनाव हार गये। आज जब हम हमारे राजनैतिक परिदृश्य पर दृष्टिपात करते हैं तो विश्वास नहीं होता कि कोई नेता ऐसा भी कर सकता है। ऐसा दीनदयाल जी ही कर सकते थे। पर इससे भी बडी बात तब हुई जब संवाददाताओं ने उनसे प्रश्न किया- ‘‘देश में जब कांग्रेस-विरोधी वातावरण है, तो आप चुनाव कैसे हार गये?’’ तो दीनदयाल जी ने जो उत्तर दिया वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मिसाल के तौर पर याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने निर्लिप्त भाव में कहा कि- ‘‘स्पष्ट बात बताऊँ? मेरे विरुद्ध खडा कांग्रेस का प्रत्याशी एक सच्चा कार्यकर्ता है। उसने उस भाग में पर्याप्त काम किया है। अतः स्वाभाविकतः लोगों ने उसे अधिक मत दिये।’’ और किस धातु का बना था यह निश्छल, निर्विकार दीनदयाल की अपने प्रतिद्वंद्वी विजयी प्रत्याशी को जयमाला पहनाने पहुंच गया। यह देखकर ठगे से रह गये उनके समर्थक भी, विरोधी भी । दीनदयाल जी की ऐसी उज्ज्वल पराजय के आगे लाखों मतों से जीत कर फहराई गई विजय पताकाओं की चमक भी फीकी हैं।
दीनदयाल जी की महानता और देशनिष्ठा का एक उदाहरण पर्याप्त होगा। बात उन दिनों की है जब जनसंघ द्वारा सरकार की विदेश नीति और अर्थनीति का घोर विरोध किया जा रहा था और प्रधानमंत्री नेहरूजी अन्तर्राष्ट्रीय वार्ता हेतु विदेश यात्रा पर गये हुए थे। उस समय दीनदयाल उपाध्याय ने जो सार्वजनिक बयान दिया वह प्रजातंत्र के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। वे लिखते हैं ‘‘हमारी पं. नेहरू के साथ चाहे जितनी मत-भिन्नता हो और चाहे जितना हम उनकी नीति के विरोध में आंदोलन चला रहे हों, मैं अपने प्रधानमंत्री को, जिस समय वे विदेश यात्रा पर गए हैं, विश्वास दिलाता हूं कि भारतीय जनसंघ की सद्भावनाएं एवं पूर्ण समर्थन उस समय उनके साथ है, जबकि वे अपने देशहित तथा देश के सम्मान को बढाने के लिए विदेशी शक्तियों से वार्तालाप करेंगे।’’ (पांचजन्य, 9 जुलाई 1956) दीनदयाल जी की इस उदारता और ‘देश पहले- दल बाद में’ की भावना के आगे श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है।
दीनदयाल जी का राजस्थान से बहुत गहरा नाता रहा है। उनका जन्म जयपुर जिले के धानक्या गाँव में हुआ। दीनदयाल जी की प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के ही विभिन्न नगरों गंगापुर सिटी, कोटा, राजगढ, सीकर और पिलानी में हुई। उनका बचपन अत्यन्त दुखद परिस्थितियों में गुजरा किन्तु इन परिस्थितियों का सामना करते हुये भी इन्होंने अपनी सर्वश्रेष्ठता प्रमाणित की तथा दसवीं और इण्टरमीडिएट परीक्षाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर गोल्ड मैडल हासिल किए। जब वे ढाई वर्ष के थे तो उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। कुछ समय बाद उनकी माता, फिर उनके पालनकर्ता नाना और उसके बाद उनके परिवार का एकमात्र सदस्य उनका छोटा भाई शिबू , एक-एक कर सभी उनको छोडकर जाते रहे, पर बालक दीनदयाल ने हिम्मत नही हारी। दीनदयाल के बालमन पर कितने वज्राघात हुए होंगे! पर इन सभी संकटों को झेलते हुए वे टूटे नही, बिखरे नही, सिमटे नही, झुके नहीं अपितु अपने मामाओं के सहारे पलते-बढते निरंतर आगे बढते गए और इतना आगे बढे कि कोटि-कोटि जन के पथ प्रदर्शक बन गये।
दीनदयाल उपाध्याय पर केन्द्रित यह विशेषांक चार खंडों में विभक्त है। प्रथम खंड ‘‘सर्ग’’ के अन्तर्गत दीनदयाल जी द्वारा समय-समय पर विविध विषयों पर लिखे गये लेख शामिल हैं। दीनदयाल जी ने राजनीति, समाज, संस्कृति, धर्म, भाषा, शिक्षा, संविधान, अर्थनीति आदि विषयों पर प्रभूत मात्रा में लेखन किया है। यहां दीनदयाल जी के ऐसे लेख (चुनिंदा अंशों में) संकलित एवं संपादित किए गये हैं जो उनके चिन्तन और मान्यताओं के उन विविध पक्षों को उद्घाटित करते हैं जो प्रायः अप्रसिद्ध हैं, अचर्चित हैं। यह लेखन उनकी मौलिक प्रज्ञा, प्रखर मेधा और वैश्विक दृष्टि का दिग्दर्शन तो कराता ही है, यह दीनदयाल जी की हृदयस्पर्शी, रोचक और सरस भाषाशैली का भी प्रतिदर्श है।
यद्यपि दीनदयालजी साहित्यकार के रूप में कभी जाने नहीं गए किन्तु उनके उपन्यास, ललित लेख, निबंध, व्यंग्य, वैचारिक लेख आदि में हर जगह उनका भाषा प्रवाह देखने लायक है। कहीं प्रांजलता, कहीं ठेठ गंवई अंदाज, कहीं विनोदभाव, कहीं वक्रता, कहीं लालित्य, भाषा में इस तरह सहजता से उतरता आता है कि यदि पाठक एक बार जुड जाता है तो पूरा पढे बिना छोडना मुश्किल हो जाता है। देश की भाषा नीति और हिन्दी को लेकर दीनदयाल जी ने इतना लिखा है कि उस पर अलग से एक ग्रंथ तैयार हो सकता है। यह अलग बात है कि हिन्दी जगत में अब तक इसकी कोई चर्चा नहीं हुई। उनके भाषा विषयक कुछ महत्वपूर्ण लेख यहां शामिल किए गए हैं जो दीनदयाल जी के हिन्दी प्रेम और सभी भारतीय भाषाओं के प्रति आत्मीयता को प्रकट करते हैं। आर्थिक नीतियों और योजनाओं का विश्लेषण वे जिन ठोस तथ्यों और गहरी दृष्टि से करते हैं वह विशेषज्ञों को भी विस्मित करता है। इन लेखों के साथ ही अनेक भावप्रवण, बोधप्रद एवं विचारोत्तेजक लेख इस खण्ड में शामिल ह। एकात्म मानवदर्शन पर दीनदयाल जी द्वारा मुंबई (तत्कालीन बम्बई) में दिये गये चार भाषण अतिप्रसिद्ध हैं। वे भाषण एकात्म मानवदर्शन का एक तरह से घोषणा पत्र (मेनीफेस्टो) हैं। बहुचर्चित और सर्वसुलभ होने के कारण उन्हें यहां नहीं दिया गया है।
दूसरा खंड ‘‘प्रतिसर्ग’’ के अन्तर्गत दीनदयाल जी पर लिखे गये लेख हैं जो दो भागों में विभक्त हैं। पहला है ‘चिन्तन वीथी’, जिसमें दीनदयाल जी के विचारों पर विद्वान लेखकों के विमर्शात्मक लेख हैं तथा दूसरा है ‘सृजन वीथी’, जिसमें दीनदयाल जी के सर्जनात्मक साहित्य पर मनीषी साहित्यकारों के आलोचनात्मक-समीक्षात्मक लेख हैं। विशेषांक के तीसरे खंड ‘‘विसर्ग’’ में दीनदयाल जी के ‘व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ पर सुधी कवियों द्वारा लिखे गये कविता एवं गीत संकलित हैं। चौथा खंड ‘उपसर्ग’ है जिसमें पत्रिका के नियमित मासिक स्तम्भ पत्रसेतु एवं साहित्यिक परिदृश्य दिये गये हैं।
दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की इस दुर्लभ निधि से हम अपरिचित ही रह जाते यदि डॉ. महेशचन्द्र शर्मा द्वारा संपादित ‘‘दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाङ्मय’’ हमारे सामने नहीं होता। यह संपूर्ण वाङ्मय इस ‘दीनदयाल विशेषांक’ का महत्वपूर्ण सम्बल रहा है।
महामनीषी दीनदयाल उपाध्याय के जन्म-शताब्दी वर्ष पर मधुमती का यह विशेषांक उनकी स्मृति में अर्पित है। शुभं भूयात् !