अंतस की पीडा/डॉ. एम.डी. स्नेहिल

कमर मेवाडी


अंतस की पीडा/डॉ. एम.डी. स्नेहिल/काव्य संग्रह/आर्यवर्त्त संस्कृति संस्थान/दिल्ली/प्रका. २०१७/मूल्य २००/-
अंतस की पीडा को पढते हुए
‘‘अंतस की पीडा’’ डॉ. एम. डी.कनेरिया ‘स्नेहिल’ का आठवां कविता संग्रह है। इसके पूर्व उनके सात कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सद्य प्रकाशित कविता संग्रह में जिन्दगी, समाज और देश पर विभिन्न रंग बिखेरती कविताएं संग्रहीत हैं।
आज जबकि लोग अपनी बात मनवाने और दूसरों को हवा में उडाने के शुभ कार्य में संलग* है वहां एम.डी. कनेरिया ‘स्नेहिल’ अपनी कविता के माध्यम से देश की जनता में जागृति का शंख फूंकने में इधर के अनेक रचनाकारों की अग्रिम पंक्ति में खडे न*ार आते हैं। इक्कीसवी सदी का आदमी हिंसा, शबाब, शराब और अनैतिक आचरण का गुलाम बन कर गर्त की ओर अग्रसर है। कवि का मानना है कि ऐसे अराजक तत्वों का इंसानियत के रास्ते पर लौटना कठिन ही नहीं असंभव हो गया है।
उन्होंने अपने अंतस की पीडा को कविता के माध्यम से ‘दर्द किसे सुनाएं’ कविता में इस तरह व्यक्त किया है-
‘‘लोकतंत्र के
महा मन्दिर में
अब
शह-मात का
खेल चला है
देश बडा है या सत्ता
इसम भारी युद्ध छिडा है।’’
कवि गैर जिम्मेदार राजनेताओं के बडबोलेपन पर बेबाक कलम चलाते हुए दिलों को जोडो कविता म लिखता है-
‘‘बिखर रहे हैं परिवार
ताश के पत्तों से / बनाए
महल की तरह/ बात/
सबका साथ सबका विकास
की करते हैं/ पर
जुटा नहीं पा रहे साहस
अपने ही कुनबे को
साथ रखने का’’
इस कविता की अन्तिम पंक्तियों पर आप सबका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा-
‘‘जोडना है तो दिलों को जोडो
बोलना है तो
नाप-तोल कर बोलो’’
अपनी वाणी में पे*म रस घोलो,
तब मिलेगा साथ
जुडेंगे लोग। होगा विकास
लौटेगा विश्वास’’
धरती के स्वर्ग कश्मीर को अपने नापाक इरादों से लोगों ने नर्क में तब्दील कर दिया है। हर रोज बन्द, रेलियां और पत्थरबाजी से कश्मीर का पर्यटन लगभग नष्ट हो गया है। गरीब लोगों का जीना हराम हो गया है। लेकिन चन्द लोगों के कहर ने कश्मीर को कब्रिस्तान बना दिया है। ऐसे लोग जहां भी हैं उनकी मानसिकता पर अफसोस होता है कि खाते अपनों का और बजाते परायों का है। ‘आतंक कब तक?’ कविता में कवि प्रश्ा* करता है-
‘‘इधर-उधर भागते लोग
भयभीत चेहर
चारों ओर हाहाकार
धमाकों की आवा*ों
उठती हुई आग की लपटें
जलती हुई, गरीब की
झोपडियां और मकान....’’
रह-रह कर सुनाई पडती
लोगों की सिसकियाँ
अस्पष्ट आवाजें
यह कैसा विभत्स दृश्य
देख कर रोंगटे/ खडे हो जाते हैं
मौत का यह नंगा नाच......
क्या कर रहा है/सरकारी तंत्र
कहां पर है / हमारे सुरक्षा बल
आखिर कौन है इसका जिम्मेदार?
हमारे देश एक कृषि प्रधान देश है और अधिकांश लोग कृषि कार्यों से जुडे हैं जबकि देशी और देशी और विदेशी कम्पनियों का शिकंजा हमारे देश का किसान अपनी गर्दन पर महसूस करता है।
फिर प्रकृति का प्रकोप किसान को बर्बाद कर देता है ‘मौसम का कहर’ कविता में कवि ने अपने विचार यूं प्रकट किये हैं-
‘‘फसलें बर्बाद हुई किसान की
नेताओं को नया रोजगार मिल गया
कर रहे हैं हवाई सर्वे
फसलों की बर्बादी का
कनेरिया साहब की दृष्टि बडी व्यापक है उन्होंने गौरैया, माँ, कब मिटेगा यह भेद, कलम, हम सबकी हुंकार है हिन्दी, आरक्षण, समाज के ठेकेदार, वैचारिक क्रांति, समय, खुली सोच जैसे विभिन्न विषयों पर सशक्त कलम चलाई है।
चारों ओर आज जब भ्रष्टाचार और आतंकवाद ने अपने पैर पसार रखें हैं तथा आदमी मोहमाया और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के जहरीले जंगल में फंसता चला जा रहा है। वह व्यक्तिगत स्वार्थों की दौड में इतना अंधा हो गया है कि उसे सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत लाभ ही न*ार आता है। ऐसे दौर में कवि देशवासियों को जागरूक करते हुए लिखता है-
‘‘जिसको जननी जन्मभूमि से
मोह नहीं है प्यार नहीं है
उसको मानव कहलाने का
किंचित भी अधिकार नहीं है’’
साथ ही कवि हुक्मरानों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराना भी नहीं भूलता-
‘‘यह देश गंगा-जमुनी
संस्कृति का है
इस पर कोई
और रंग मत चढाइये
परस्पर विश्वास और एकता
धरोहर है देश की
जन जन के विश्वास को
उनसे जोडिये’’
एम.डी. कनेरिया ‘स्नेहिल’ के कविता संग्रह ‘अंतस की पीडा’ को पढते हुए लगता है कि वे प्रेम और शांति के पक्षधर होने के साथ-साथ आतंक, भ*ष्टाचार सामाजिक और राजनीतिक कुरूपताओं पर प्रहार करने वाले एक सशक्त कवि के साथ-साथ इन्सानियत के भी पैरोकार हैं। ?
चाँदपोल के अन्दर, कांकरोली-३१३३२४ (राज.)
मो. ९८२९१६१३४२