अतीत से आगे (कहानी संग्रह)

डॉ. हुसैनी बोहरा


अतीत से आगे (कहानी संग्रह)/प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा/बोधि प्रकाशन, जयपुर, राज./प्र.सं. २०१६/मूल्य १५० रु.
सूर्य! फिर उदय होगा (कविता संग्रह)/राजीव सिंह ‘वीरगुर्जर’/समन्वय प्रकाशन गाजियाबाद, दिल्ली/प्र.सं. २०१६/मूल्य २५० रु.
छोटे-छोटे अनुभवों का यथार्थ संसार-अतीत से आगे
कथा साहित्य जीवन के खण्ड अनुभवों की सशक्त अभिव्यक्ति का माध्यम है। कथा में जीवन घटनाक्रम को तरतीबवार अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है। कथाकार का जीवनगत अनुभव जितना व्यापक होता जाता है कथा का कथानक एवं वर्णन कौशल भी उसी अनुपात में व्यापकता एवं गहनता प्राप्त करता जाता है। प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा निरन्तर साहित्य सृजन में रत हैं। ‘अतीत से आगे’ आपका सद्यः प्रकाशित पहला कहानी संग्रह है, जिसमें कुल चौबीस कहानियां संकलित हैं। ये कहानियां जीवन के विविध आयामों को मुखरित करती प्रतीत होती हैं। लेखक ने अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं को अपनी कथाओं का कथ्य बनाया है। कहानियों को पढते हुए पाठक स्वयं जैसे उन कहानियों में जीता हुआ अनुभव करता है। कहानियों के प्रमुख शीर्षक इस प्रकार हैं-मां, बन्द दरवाजा, रूपा, एक और देवदास, चोर, तांगेवाला, वह कैसे मरा? आदि।
‘बन्द दरवाजा’ कहानी में दहेज समस्या को रेखांकित किया गया है। लक्ष्मी का अपना ससुराल लौटना व वहीं पर जीने मरने का प्रण हममें साहस का भाव भरता है। ‘मां’ कहानी संवेदना की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है जिसमें मां के प्रति पुत्र का आत्मीय स्नेह उभरकर आता है और यह भी कि परिवार के अनेक नाते रिश्तेदार स्वार्थ पूर्ति तक ही संबंध निर्वाह में विश्वास रखते हैं। त्योहार, तांगेवाला जैसी कहानियों द्वारा मध्यमवर्गीय जीवन की आर्थिक समस्याओं से दो चार कराने के साथ ही पात्रों की ईमानदारी के गुण को स्पष्ट किया गया है, ‘‘मुझे लगता है, जैसे वर्मा मेरी गरीबी पर व्यंग्य कर रहा हो। मैं उसे बीच में ही टोक देता हूं-‘‘आप अपनी बात कहिए वर्मा जी। इन फालतू बातों को छोडिए। मैं कल ही आपको मना कर चुका हूं कि मुझसे गलत काम नहीं होगा।’’ (त्योहार)
इसी तरह रमजान तांगेवाला का कथन भी हमारे मन को ओलोडित करता है, ‘‘खुदा तो केवल मेहनत का फल देता है नूरी। इस तरह पाई हुई दौलत, भले ही चोरी न हो, पर गुनाह तो है ही। हो सकता है कि हम लोगों की नजरों से अपने इस गुनाह को छुपा लें, लेकिन खुदा की नजरों से इसे कैसे छुपा सकेंगे।’’
उपर्युक्त कहानियों के दोनों कथन आज की भ्रष्टाचार की समस्या का एक श्रेष्ठ समाधान प्रस्तुत करते प्रतीत होते हैं। ‘वापसी’ कहानी में अभिजात्य वर्ग की स्वार्थ से पूर्ण मनोवृत्ति को पात्र हरीश के माध्यम से उद्घाटित किया गया है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि व्यक्ति की कथनी और करनी में कितना गहरा अन्तर होता है, जिसे जानकर गहरी वितृष्णा ही होती है। ‘कुत्ते’ कहानी मानवीय संवेदहीनता को प्रमाणित करती प्रतीत होती है। अंधे कल्लू के प्रति संवेदनहीनता अपने चरम तक पहुंच जाती है... रोटी खाने में उसे दिक्कत तब होती, जब आवारा कुत्ते उसके अंधेपन से लाभ उठाकर उसकी रोटियां छिनने की कोशिश करते हैं। कल्लू को न तो कुत्तों की स्थिति का ठीक तरह ज्ञान होता और न उनकी भावनाओं का।
‘रूपा’ कहानी में जीवन का यथार्थ दिखाया गया है कि आज भी शराब के लिए बच्चों को बालश्रम करने के लिए विवश होना पडता है। यह हमारे निम्नवर्गीय समाज की विडम्बना है। अपराधबोध कहानी में समाज में आ रहे बदलाव को मुखरित करने का प्रयास है। अविनाश के कथन इस दृष्टि से अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है-‘सुषमा, यह मत भूलो कि प्रत्येक बच्चे का भली प्रकार विकास करना हमारा केवल पारिवारिक ही नहीं राष्ट्रीय दायित्व भी है। पिंटू हमारा बच्चा नहीं होता तो भी इसे लाड प्यार का तो अधिकार तो था ही।’’
‘वह घर लौट पडी’, ‘वह चला गया’, एक और देवदास’ जैसी कहानियां मानवीय करुणा से युक्त प्रतीत होती है। सामाजिक व्यवस्था में एक युवा महिला ही त्रासदी का चित्रण ‘वह घर लौट पडी’ में व्यक्त हुई है तो एक और देवदास साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानी होते हुए भी जाति के आगे प्रेम को हराने का प्रयास दिखाया गया है, परन्तु मानव में प्रेम के प्रति जो सम्मान का भाव है वह प्रस्तुत कहानी में स्पष्ट है, लाहौर के लोगों को जब यह जानकारी मिली, तो वे सन्नाटे में आ गये। उन्होंने बूटा सिंह को पुनः सम्मान के साथ दफनाया और उस पर फूलों का और भी बडा अम्बार लगा दिया।’’
‘अतीत से आगे’ शीर्षक कहानी में युवा मन के प्रेम में विफल हो जाने और अवसादग्रस्त हो जाने की स्थिति पर करारा कटाक्ष किया गया है, ‘‘मैं जा रही हूं प्रदीप! लेकिन यह ध्यान रखना की हर लडकी रत्ना नहीं होती और रत्ना जैसी लडकिय के पीछे जीवन को नष्ट कर लेना कोई समझदारी नहीं है।’’
‘अकेला मन’, सिमटती दूरियां’, छुट्टी का मातम’, ‘बंद खिडकी’ जैसी कहानियों में वर्तमान जीवन के संबंधों को एवं स्वार्थवृत्ति को प्रत्यक्ष किया गया है।
लेखक के अनुभव संसार का स्तवक प्रस्तुत कहानी संग्रह है। लेखक ने सहज ढंग से आम भाषा शैली में कथानक के ताने बाने को बुना है। कहानियां पठनीय हैं। लेखक आगे भी अपने रचनाकर्म से समाज को दिशा देने का प्रयास करते रहेंगे इसी अभिलाषा के साथ, अस्तु। ?
आशावादी स्वरों की अभिव्यक्ति
सूर्य ! फिर उदय होगा
कविताओं में जीवन सत्य का उद्घाटन जटिल कर्म होता है, किन्तु रचनाकार का रचनात्मक कौशल इसे अभिव्यक्त करने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। प्रस्तुत समीक्ष्य कृति ‘सूर्य! फिर उदय होगा’ राजीव सिंह ‘वीर गुर्जर’ का पहला कविता संग्रह है। वैसे आपकी कई कविताएं स्वतंत्र रूप से पत्र पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। सृजन की शैशवावस्था में आफ जीवनगत यथार्थ के अनके अनुभवों को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। संग्रह में कुल उनपचास कविताएं संकलित हैं। जिनमें जीवन के अलग अलग क्षेत्रों की झलक प्राप्त हो जाती है। शीर्षक कविता प्रथम कविता है जिसमें कवि ने आशा का स्वर मुखरित किया है,
क्या सूर्य/उसी/लामा देश में/पुनः चमकेगा/अपने पूरे शौय के साथ/अनगिनत संभावनाओं को/तलाशने में ही/समय के साथ-साथ/अस्त हो जायेगा?/निश्चित ही/नव निर्माण के साथ/सूर्य...!/फिर उदय होगा।
यही आशावादी स्वर जीवन को गतिशीलता प्रदान करता है।
कवि ने धूप, पूर्णिमा, चांदनी आदि के माध्यम से जीवनगत अनुभवों को व्यक्त करने का प्रयास किया है,
यह धूप/कोहरे और कुहासे को/गुम वस्तुओं को, मिटा
कर जायेगी।
शहरीकरण की अजनबीयत को कवि ने इस तरह उद्घाटित किया है, इस शहर में! प्रेम नहीं/रिश्ता नहीं/बस चेहरों की नुमाइश लगती है।
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यहां हर एक के/अपने दुखडे हैं/जिन्हें लेकर वे/अपनी-अपनी खोली में सिकुडे हैं/वे भी/बदले बदले से/नजर आते हैं।
वर्तमान में मनुष्य का वास्तविक चेहरा लुप्त हो गया है। उसे पहचान पाना अत्यंत जटिल कार्य है। कवि की ‘मुखौटे’ कविता ऐसा ही कुछ कहने का प्रयास करती दिखाई दे रही हैं, ये मुखौटे/असली चेहरों को ढककर/नकली चेहरे पा जाते हैं/असलियत को/छुपा जाते हैं।
यह आज के मानव का सच है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। कवि की कविताओं को पढने से साफ हो जाता है कि कवि ने यथार्थ को ही अपनी कविताओं का मूल विषय बनाया है। कवि ने बिना मुल्लमा चढाए, बिना विशेष आलंकरिक भाषा का प्रयोग किए बिना हमारे जीवन के अनेक अनछुए, अनानुभव किए भावों को, संवेदनाओं को हमारे सामने प्रत्यक्ष कर दिया है, जिसे जानते हुए भी हम अनजाने बने हुए हैं।
कवि के पास जीवनगत अनुभवों को पहचानने की शक्ति भी है और उसे अभिव्यक्त करने की ताब भी।
वर्तमान की मनुष्यहीनता की प्रवृत्ति को कवि ने इन शब्दों में प्रकट करने का प्रयास किया है-
कि कुछ लोग/जिंदा होकर मुर्दा हैं/और/कुछ मुर्दा होकर भी जिन्दगी को/प्रेरणा देते रहते हैं/ कहते हैं जिंदा रह या मुर्दा/खोना मत इंसानियत/रहना बनकर/इंसान ही।
प्रस्तुत कविता संकलन की कुछ कविता कथ्य की दृष्टि से सटीक एवं प्रभावी हैं तो कुछ अत्यंत सामान्य विषय की हैं। कवि ने अपनी रचनात्मकता को कविताओं के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया है। यह सराहनीय है। प्रस्तुत कविताएं समाज को दिशा देने में निश्चित रूप से सार्थक व समर्थ हगी। लेखक का लेखन निरन्तर परिपक्वता को प्राप्त करता रहे। ?
६, नाईवाडा चौक, बोहरवाडी, उदयपुर ३१३००१, (राज.)
मो. ९४१३७७१९५९