चुनी हुई कहानियां

श्रीकृष्ण शर्मा


चुनी हुई कहानियाँ/सत्येन्द्र चतुर्वेदी/कहानी संग्रह/प्रका.२०१६/प्रका. अमन प्रकाशन कानपुर/मु. २२५/-
चुनी हुई कहानियां
आत्म चैतन्य दायिनी अनपायिनी वाणी के अधिपति, जीवन-जगत के सत्य के सतन अनुसन्धानी, सूर्योदयी संकल्पों के प्रचेता डॉ. सत्येन्द्र चतुर्वेदी मनीषी विद्वान, प्रखर चिंतक, आद्वितीय विचारक एव यशस्वी सम्पादक हैं। वार्घक्य की सीढियाँ आरोहरण करते हुए मनोयोगपूर्वक समकालीन समस्याओं पर आप निर्भीकता से अपना मन्तव्य सार्वजनिक रूप से प्रकट करते रहे हैं।
चुनी हुई कहानियाँ आपका प्रथम कहानी संग्रह है। ये कहानियाँ एक भावुक मन की, उदारचेता तथा संवेदनशील लेखक के आर्द्र मन की निश्छल बेवाक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो नितांत सहज सरल प्रायः एक आयामी और बिना किसी कवच के है उनका किसी वाद से कोई सम्बन्ध नहीं। केवल अपने इर्द-गिर्द आसपास, घटी घटनाएं जीए गए आत्मीय अन्तर क्षणों से पात्र, स्थितियाँ है वस्तुतः ये चतुर्वेदी जी के अन्तस की गूँज-अनुगूँज हैं। ये किसी वैचारिक सम्प्रदायों अथवा समूह से जुडी नहीं है। चतुर्वेदी जी की सामाजिक चेतना की अपनी ही विलक्षता अवधारणा है।
१९७१ के भारत पाक युद्ध में टिब्यून के प्रखर सम्वाददाता वाजपेयी बुरी तरह ध्वस्त हो गए, उनका अर्द्धांग युद्ध की भेंट चढ गया, उसे काटना ही पडा और कृत्रिम टांगों से, चमडे की बेल्ट के सहारे काम काज चल जाता। श्रीमती नीरू ने उनके लिए एक विशेष प्रकार की गाडी बनवाई थी जिसे ठेलकर वे वाजपेयी को गन्तव्य तक ले जाती। चूँकि वह स्वयं भी दिल्ली टाइम्स में कला रिर्पोटर थीं इसलिए उसे संगीत का शौक था वहां अच्छा सितारवादन कर राग यमन राग देश व मालकोस में सुर साधना का नाद श्रोताओं पर कर डालती। आज जबकि हर चीज बिकाऊ हो गई है यहाँ तक कि पति-पत्नी के रिश्ते तक ‘रिलेशनशिप’ का रूप ग्रहण कर चुके हैं, पति और वह भी शारीरिक दृष्टि से अक्षम हो, की तन, मन धन से सेवा सुश्रुषा करना एक दुर्लभ गुण ही माना जाएगा।
‘साँझ का सम्बल’ कहानी का नायक वाजपेयी तो खान-पीन-दवा के लिए अपनी पत्नी नीरू पर ठीक उसी तरह निर्भर हो गए जैसे कोई शिशु अपनी माँ पर होता है। पेंशन जरूर मिलती थी, पर वह तो ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुई। लम्बी छुट्टी लेने के कारण टाइम्स भी त्यागना पडा और अन्ततः पी.एफ. का पैसा भी काम में लेना पडा। ऐसी स्थिति में जब करण्ट लगने से नीरू की मृत्यु हो गई तो वाजपेयी जी नीरू के बिना एक सप्ताह भर भी नहीं जी पाए क्योंकि उनके ‘साँझ का सम्बल’ ही उनसे जो छिन गया था। सच तो यह है कि नीरू में ही उनके प्राण बसते थे। उसकी मृत्यु के बाद तो वे एक मांस का लोथडा की तरह ही रह गए थे। भारत पाक युद्ध १९७१ में उनका अर्द्धांग नहीं, जब अर्द्धांगिनी गई, तब ही गया। यूँ भी भारतीय संस्कृति में पत्नी पति को परमेश्वर मानती है। आत्मिक प्रेम भाव सेवक है। अहसास कहानी दाम्पत्य जीवन की सार्थकता को सिद्ध करते हुए उसके सैद्धान्तिक पक्ष को व्यवहार में क्रियान्वित भी किया गया है। यह आज के मुक्तविहारी युवक-युवतियों अथवा पत्नियों के लिए एक मिसाल है।
दाम्पत्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-पत्नी विवाह संस्कार के समय जिन सात वचनों का सप्तपदी का संकल्प लेते हैं हर परिस्थिति में उसका निर्ममता से पालन किया जाए।
वक्त, बेवक्त हर वक्त पति-पत्नी के और पत्नी पति के काम आए। ‘अहसास’ कहानी नायक श्रीधर अपने माता-पिता के परस्पर कडवाहट भरे व्यवहार से क्षुब्ध था, क्योंकि वह दिनरात की खिच-खिच और कडवाहट से परेशान था, इसलिए वह विवाह संस्था को निरर्थक समझता था। जबकि नायिका नन्दनी विवाह संस्थान को दो आत्माओं का मिलन मानती थी, इसीलिए उसने अपने सुख दुःख की परवाह किए बिना टेंकर से दुर्घटनाग्रस्त अपने पति श्रीधर की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। नन्दिनी श्रीधर का इतना ख्याल रखती कि वह एक क्षण भी उसे अकेला नहीं छोडती। यहाँ तक कि वह अपने भाई के विवाह तक में सम्मिलित नहीं होना चाहती।
यद्यपि श्रीधर और नन्दिनी का विवाह पे*म विवाह ही था जो एक निबन्ध प्रतियोगिता में पक्ष विपक्ष में वैचारिक विजेताओं के मध्य हुआ था। आज के समाज में जहां पैसे के पीछे भागने की होड लगी है आत्मीयता का ऐसा अहसास कहानी की सर्जनशीलता का परिचायक है। यह बहुत
अच्छा है।
‘यों पागल मनुआ पुकारे’
‘यों पागल मनुआ पुकारे’ एक ऐसे नायक की कहानी है जो भरी जवानी में ही अनाथ हो जाने से अपनी सूरत और सीरत पर भी ध्यान नहीं दे पाया पाया। गंजा सिर, खिचडी दाडी चुँधियाई आँखें। किन्तु ब्राह्मणत्व पर मनुआ को गौरव था चोटी और जनेऊ को तथा खाना बनाने के काम को वह अपनी पूँजी मानता था। चन्द घण्टों की बहुरिया की कहानी सुनाने में उसे सुकून मिलता, उसने कभी एक जगह लगकर काम नहीं किया। मन उचट जाता।
मनुआ ने मन्दिर के पुजारी से जिसकी निगाह उसके पैसों पर थी, शादी की बात चलाई। पुजारी शादी के बहाने उससे पैसे झटकते रहता। उस छलिया पण्डित ने दुलारी से मनुआ की शादी करवा दी पर लालची पुजारी फरेबी निकला। दुलारी को चक्कर में ले भागा। मनुआ अपनी किस्मत को कोसता रह गया, भले ही पुजारी जेल की सलाखों के पीछे पहुँच गया, मनुआ तो पत्नी के लिए तरसता ही रह गया।
‘पायल की पीर’
‘पायल की पीर’ कहानी में नायिका पायल का आभूषण पायल के प्रति एक विचित्र प्रकार का मोह था। उसकी आभूषण मंजुषा में काठियावाडी, मारवाडी, कश्मीरी, कटक की पायलें थी जब वह भाई की शादी से मायके से वापस लौट रही थी तो ट्रेन में एक पेशेवर लुटेरे ने उसकी सोने की पायल पार कर ली। यह पायल ऐसी वैसी नहीं थी, खास तौर पर कलकत्ते से बेलबूटे वाली थी।
पायल को ज्योंही पता लगा, वह चिल्लाई मेरी पायल। मेरी पायल।। सोचा ऊपर बर्थ पर सोते पति कुछ करेगा, पर वह तो पहले से ही ‘पायल हठ’ की बीमारी से परिचित था। किन्तु पायल को लगा कि उसका पति अनभिज्ञता का नाटक कर रहा है। पायल को ‘पायल’ के खोने का जितना गम नहीं था जितना विश्वास भंग का दंश सह रहा था। अतिशय मोह कईबार अपनों को कटघरे में खडा करने से नहीं चूकता।
‘चन्दा’
‘चन्दा’ माँ-बाप विहिन एक ऐसी युवती अपने मौसा मासी के यहां केन्द्र गाँव में रह रही थी, गाँव के प्रौढ शिक्षा में पढने लगी। वह अत्यन्त जिज्ञासा-प्रेरित हो शिक्षक को प्रश्न पूछ पूछ अवाक कर डालती।
एक दशक के अन्तराल के बाद जब ये शिक्षक महोदय अकाल राहत अधिकारी की हैसियत से चन्दा के गाँव में आए तो सहसा उनके दृष्टिपटल पर चन्दा की स्मृति आई। शिविरार्थियों के बीच अकाल राहत अधिकारी की आँखें चन्दा को खोज रही थीं पर वह अब कहाँ? वह नहीं उसका एक पत्र गाँव के वृद्ध ने शिविर समापन पर लाकर दिया जो चन्दा के तालाब में डूबने से पूर्व उसने वृद्ध को सौंपा था। मौसी की रोज रोज की झिडकी और मन में विराज रहे उस शिक्षक की चाहत की ललक का दर्दनाक दस्तावेज था। पत्र का सम्बोधन ‘मेरे जनम जनम के प्रीतम।......’ गँवार छोकरी.....प्यार व्यार का जान......यही चाहती थी...हर समय तुम्हारे पास ही बनी रहूँ.....शायद तुम्हें मेरी चाहत की थाह नहीं होगी। और अन्त किया..... ‘‘मेरी विनती की लाज रखना। प्यार की बूँद बूँद को तरसती.....प्यासी चातकी....चन्दा।’’ ‘‘दिल के किसी कोने में एक छोटा सा स्थान दे देना’’ वाक्य शिक्षक-अधिकारी को विस्मय से भर गया। चन्दा की मौत के लिए शिक्षक-अधिकारी कतई जिम्मेदार नहीं पर जब जब वह आकाश में चाँद देखता है उसका सर नीचे झुक जाता है।
‘चाँद चन्दा देख’
कभी-कभी बचपन में अनजाने में खेल-ही-खेल की घटना भावी जिन्दगी को ही प्रभावित कर डालती है। अनुराधा के पति जब नागपुर आए तो उन्हें अपनी पुत्री डॉली के विद्यास्थली में भर्ती करवाने का परामर्श पडोसिन ने दिया तो डॉली को लेकर उसके पिता विद्यास्थली पहुँचे। डॉली उर्फ सच्ची-मुच्ची।
प्राचार्य कक्ष के बाहर बैठे बैठे जब डॉली के पिता की न*ार सूचना पट्ट पर पडी तो वे डॉ. सुश्री शालिनी भारद्वाज के हस्ताक्षर देख चौंक गए। उन्हें स्मरण हो आया कि यह शालिनी भारद्वाज तो वही शालू है जो बचपन में छुपन-छुपाई जैसे खेल खेलती थी। उन्हें यह भी पता चल गया कि उन्हीं दिनों कॉलोनी में हुई शादी के समय पता चला कि वर-वधू की माला पहनाने को शादी का होना माना जाता है। बारातियों की फें की मालाओं को उठा कर वे एक दूसरे को पहना देते हैं फिर खुशी से उछले पडते हैं, तालियाँ बजाते हैं। वो शालू से कह उठे कि अब हम दोनों ने एक दूसरे के गले में माला डाल दी न, अब हमारी भी शादी हो गई। तब डॉली के पिता का माथा घूम गया। बाल सुलभ चपलता को संकल्प ही उसने बना डाला। डॉली के पिता मर्मान्तक तक मथ गए। सँज्ञाहीन हो गए लगभग निश्चेतन। जैसे तैसे डॉली ने सम्हाला। डॉली बोली पापा पापा.......अब अपना नम्बर आने वाला है। हडबडाकर वे बोल उठे नहीं...... डॉली यहाँ नहीं...नहीं। वे असहज भयाक्रान्त हो गए।
‘सच्ची मुच्ची’ कहानी बाल सुलभ चपलता को संकल्प में बदलने की एक अविश्वसनीय घटना है। कहानी क्या सन्देश देना चाहती है यह समझ से परे है।
‘कावेरी’
‘कावेरी’ मासूम बच्ची, दुखियारी थी। कावेरी को उसके पिता ने उससे दुगनी उम्र के अधेड दूजवर के साथ तीन हजार रुपये में बेच दिया, यह शादी न थी। पति शराबी, जुआरी तो था साथ ही उसे छोटी छोटी बात पर जली कटी सुनाता। बेदर्दी से मारता पीटता पर वह मुँह से उफ तक नहीं कहती। उसे बस एक चीज से चिढ थी वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि उसका पति किसी दूसरी, तीसरी पत्नी को घर में ले आए। कहानी नायिका कावेरी।
कावेरी को जैसे ही भनक लगी कि उसका पति एक और औरत घर में ला रहा तो उससे यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने कुएँ में कूद कर आत्महत्या कर ली। यद्यपि कावेरी को कुछ दिन के लिए ही गीताबाई अपनी जगह रख कर छुट्टी पर गई थी पर उसके काम करने के तरीके से मालिक इतने अभिभूत हुए कि जब उन्हें कावेरी द्वारा आत्महत्या की सचना मिली तो वे विचलित हुए बिना नहीं रहे। यूँ देखा जाए तो आजकल अधिकांश कॉलोनियाँ बाइयों के कब्जे में है। जिस दिन वे काम पर नहीं आते फोन पर फोन खडकने लगते हैं, पूछताछ शुरू हो जाती है। बिहार, प.बंगाल से यहाँ आई अधिकांश बाइयाँ कावेरी की तरह ही दिन गुजार रही है। कहानीकार ने इस कावेरी पात्र का सर्जन कर उन समस्त बाइयों के दिल की बात का समाज को उजागर किया है, अच्छा होता उसका दुःखद अन्त न होता।
अब मेरा कोई इन्तजार नहीं करता
अब मेरा कोई इन्तजार नहीं करता कहानी में सुमित्रा की मृत्यु के बाद झा साहब सदैव उसकी सुधियों में ही खोए रहते। धीरे-धीरे उन्होंने कम्पनी बाग में सुबह टहलना बन्द कर दिया। सार्वजनिक पुस्तकालय में भी जाना बन्द कर दिया, हनुमान मन्दिर में दर्शन भी बहुत कम कर दिए। जब सुमित्रा जीवित भी तो एक बार उन्होंने कहा सुमित्रा ‘तू मौपे इतना लाड मत लडा, मोए बिगाड मत......सोच फिर मेरो कहा होएगा?’ वही हुआ पत्नी की यादों में डूबे रहते अकेलेपन से जूझते रहते। वक्त वक्त पर दवा-दारू कौन करे? कहते अब मेरे जीने का क्या मतलब? एलोपैथी इलाज नहीं कराते ताकि जल्दी ठीक हो जाएँ। जब तब झा साहब सुमित्रा के फोटो के सामने बैठ उसे अपलक निहारते मौनालाप
करते रहते।
एक दिन तीव्र हृदयघात से नीम बेहोशी में वे आ गए और फिर भगवान को प्यारे हो गए। पता नहीं ऐसा कैसे हुआ कि पत्नी को जो चित्र टेबल पर रखा था वह गिरकर उनकी छाती पर आ टिका। बच्चू को लगा कि वेदना निहल दृश्य में झा साहब कह रहे हैं बच्चू कोई अब मेरा इन्तजार नहीं करता। ऐसी बेमकसद जिन्दगी जीने से क्या फायदा।
‘निरूपमा’
हेमन्त अपनी पत्नी निरूपमा और पुत्री पम्मी को न्यूयार्क, इंग्लैण्ड जैसे विश्व के बडे बडे शहरों में स्थित महंगे मॉल्स में ले जाते, खरीदारी कराते, कीमती से कीमती स्वर्ण आभूषण दिलवाते, सितारा होटलों में मध्याह्न भोज, रात्रि भोज करवाते। पैसा, ऐश्वर्य, समृद्धि, शान शौकत निरूपमा के लिए सर्वस्व नहीं। उसे धन लोलुप, आत्म केन्द्रित तथा ऐसे मुद्राराक्षस अवतार वाला हेमन्त नहीं घर परिवार बीबी बच्चों को चाहने वाला हेमन्त चाहिए। जो अब अतिथि बन रह गया।
जबकि हेमन्त विश्व भर के चुनिन्दा धनकुबेरों की बिरादरी में जोरों से धमाकेदार अपनी उपस्थिति का आकांक्षी था, जिसे स्वयं उसने श्रम, लगन एवं मनोयोग से प्राप्त किया था। इसलिए अब उसकी प्राथमिकता में परिवार, पत्नी, पुत्री नहीं रह गई थी, उनकी जगह मीटिंग, टेण्डर, प्रोजेक्ट, लंच तथा डिनर ने ले ली। जबकि निरूपमा तो संवेदनाओं की भावनाओं की भूखी प्यासी थी। उसकी जिन्दगी तो जैसे रूक गई, थम गई, अर्थहीन हो गई। इसीलिए उसने कहा ‘‘हे प्रभु! हमें तो हमारी वो गरीबी ही वापस लौटा दो।’’
‘सीताबाई का मन्दिर’
कहानी उस पतुरिया की कहानी है जो रूप से नाक, नक्श में खानदानी मालूम पडती थी। वह स्वयं तो कोठेवालियों के नरक से मुक्त हुई साथ ही उसने पीडित, वंचित दर्शित दीन, हीन, उपेक्षित कोठेवालियों की तन्मयता तत्परता से सेवा की। उसने पुष्कल धन राशि एकत्र कर कई जन कल्याणकारी योजनाएँ चलाई और क्रियान्वित भी। उसी से प्रेरित होकर एक सेवामुक्त ब्रिगेडियर ने स्त्री हितकारिणी सभा बनाई। जनकल्याण कार्यो के कारण वह गणिका से देवी बन गई। यहाँ तक कि उसका निवास ही मन्दिर बन गया। वहाँ शोहदेछाप और आदमजात को आने की इजा*ात नहीं थी। अधो अंग से ऊपर किसी को छूने कि इजा*ात न थी। नशेबाज और युवकों के लिए प्रवेश वर्जित था। सतीबाई सोमवार मंगलवार को निर्जला, निराहार व्रत करती दिन में पूजा पाठ करती रहती। कभी वह अपने आराध्य राधा कृष्ण को रिझाने के लिए नृत्य करती, वह प्रसाद बाँटती। भभूत लगाती, पूजा के फूल बांटती। इसीलिए वह जन जन की श्रद्धापात्र ‘सतीबाई’ के नाम से जानी गई।
उडीसा के इस नगर में यूँ तो भगवान् जगन्नाथ, वेंकटेश्वर, कालका देवी, संकटमोचन जैसे अनेक मन्दिर हैं। पर सतीबाई के मन्दिर की याद आज भी ताजा है जो समुन्द्री तूफान ‘मेहताब’ में बर्बाद हो गया, होने के लिए तो सारी बस्ती मटियामेट हो गई थी। बस मन्दिर की याद ही रहा गई। श्रद्धा काडामनु के प्रति एकानिक पे*म, समर्पण, त्याग अद्भुत था। जिसके स्पर्श से मनु के जीवन में एक लय पैदा हो गई अन्यथा मनु के न तो माँ-बाप थे न कोई स्व*ान/ चैरिटी मिशन ने उसे पाला था। गरीबों की निःशुल्क सेवा, निस्पृह सेवा उसका एकमव लक्ष्य था। रिलीफ कैम्प भी लगता। अभाव ग्रस्त मरी*ाों की अहर्निश सेवा करता पर उसे अपने स्वास्थ का खयाल ही न रहा, वह हैपीटाइटिस लिवर सिरोसिस ही नहीं अपितु किडनी भी खत्म कर चुका था- सिर्फ शय्याशायी ही रह गया। अपने पुत्र के आग्रह पर जो अमेरिका में अपने निःसंतान चाचा के पास था, चला गया। यद्यपि डॉ. मनु ने प्रस्थान पूर्व श्रद्धा को सूचित अवश्य कर दिया था पर राजनीतिक प्रभुता और ऐश्वर्य से मोहाविष्ट श्रद्धा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में आत्मविभोर थी और गृह मंत्री चौधरी साहब की अनुकम्पा से वह एम.एल.सी. जो बनने जा रही थी। श्रद्धा-अश्रद्धा कहानी में यही केन्द्र बिन्दु है।
श्रद्धा ने डॉ.मनु के मर्म में दी तलस्पर्शी निःसम्बल और श्रद्धाहीन विस्मृत तथा तिरस्कृत अतीत की कोई परवाह नहीं की। हाँ श्रद्धा को झकझोर अवश्य दिया पर कुटिल कठोर राजनीतिज्ञ श्रद्धा न विचलित हुई न भयाक्रान्त।
जो सुनीता महाविद्यालय में हिन्दी की प्रधानाध्यापिका थी और तब कामायनी पढाते समय ‘श्रद्धा का चरम नारीत्व पत्नीत्व का काम्य आदर्श सिद्ध करने में अघाती न थी, वह राजनीति की धरा पर पीयूष स्त्रोत सी बह निकली।’
‘परितृप्ति का जीवन दर्शन’
‘परितृप्ति का जीवन दर्शन’ शीर्षक रचना वस्तुतः एक प्रतिक्रिया, एक अनुरोध, एक उपालम्भ है, आग्रह भी हो सकता है, सुझाव तो है ही, निःसन्देह यह आत्मग्लानि से क्षुब्ध विचलित होने के लिए पर्याप्त है। इसे इस कहानी संकलन में श्ाृंखला बद्ध करना कहानी के साथ अत्याचार करना ही है।
‘अपनी पम्मी के लिए’ कहानी में एक शर्मीली प्रकृति की पंजाबी बाला पम्मी, जब नायक को ‘‘थैंक्स’’ देते हुए कहती है ‘‘आपकी बुक माधवी से ली थी’’। एक अंतराल के बाद नायक की दृष्टि उस उपन्यास में एक पृष्ठ पर पडती है तो वह चमत्कृत हो जाता है क्योंकि उसकी इस वाक्य पर पडी ः ‘‘अपनी रेखा के लिए मनोहर ने कितना त्याग किया’’ यहाँ इस वाक्य में रेखा के स्थान पर काट कर पम्मी लिखा गया था। नायक को लगा पम्मी के अन्तर में मेरे लिए इतनी ममता ऐसा स्निग्ध भाव पर जिसे प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट नहीं होने दिया प्रणय तरंगित अन्तर लिए नायक अपनी त्रासद भूमिका म अनुभव करने लगा। जीवन के संध्याकाल में कैशार्य अवस्था के ऐसे सपनों की मीमांसा, सफाई करने अथवा बचाव की कोई आवश्यकता नहीं अन्यथा पम्मी की क्वारी, अछूत साध की निर्मम हत्या का आरोप तो लग ही सकता है।
हारवर्ड प्रशिक्षित एक प्रतिष्ठित बैंक उच्चाधिकारी भुवन की दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर प्राध्यापक निवेदिता के जीवन में रुचिरस समाप्त हो गया, एक रिक्तता आ गई। उसकी जिन्दगी बेरंग, बेमानी, बदरंग, बेमजा हो गई पर जिन्दगी किसी के लिए किसी की चाहत में ठहराती नहीं। यद्यपि निवेदिता को बचपन से ही होली से परहेज था वह होली पर अपने कक्ष में बन्द होकर बैठ जाती। पडोसिन दरवाज पीटर थक जाती वह टस से मस नहीं होती पर इस होली पर भुवन की अनुपस्थिति में वह भुवन के प्रणय उपहार-अंशु की खुशियों को बरकरार रखना चाहती है और जब अंशु छोटी सी मुठ्ठी में रंग भरे उससे आग्रहपूर्वक पूछता है, ‘‘मम्मी आफ रंग लगा दूँ....रंग लगा दूँ....’’ नहीं...नहीं...वह मना नहीं कर सकती, नहीं वह नहीं करेगी। कहानीकार ने बेमन से ही सही, मम्मी को रंग लगवा ही दिया पता नहीं पाठक इससे क्या सन्देश ग्रहण कर पाएँगे।
‘पर तुमने क्यों कहा था?’ कहानी में निरूपमा अपने पति नरेश पंत को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी, उसने इसलिए पूजा, अर्चना, उपवास व्यय साध्य चिकित्सा का सहारा लिया पर सब कुछ व्यर्थ निरर्थक हो गया था। उसके ह्रदय में सुराख जो था। महाविद्यालय वार्षिकोत्सव पूर्व वे चल बसे।
चूंकि निरूपमा के मन प्राण आत्मा रोम रोम में नरेश की स्मृति बसी थी इसलिए उसने जो वचन नरेश को दिया उसे कैसे भुलाए ‘‘नरेश ने वचन लिया था कि अपने नरेश के लिए आत्मा की शान्ति के लिए उसी तरह रहती रहेगी जैसी वह उसे हमेशा देखना चाहता है। इस वचन की सम्पूर्ति में निरूपमा ने प्रतिगामी समाज की लांछना, भर्त्सना, निन्दा उलाहने की परवाह नहीं की और वाड्रोप से चंदेरी की साडी पहन, ऑटो ले महाविद्यालय के वार्षिकोत्सव में अपनी भूमिका निर्वहन हेतु चल पडी। समाज कितना ही प्रगतिशील क्यों न हो वह समाज की आचार संहिता का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करता। निरूपमा जैसा साहसी प्रगतिशील, पात्र समाज में व्याप्त अन्धविश्वास और रूढिवादी सोच में बदलाव होगा।
‘प्रतिशोध का शमन’ कहानी एक ऐसे आयकर आयुक्त की है जिसक पिता एवं भाई को दो दशक पूर्व झूठे इल्जाम में फँसा जेल की हवा खिलवाई। पिता बदनामी के सदमे को बर्दाश्त न कर पाए और भगवान को प्यारे हो गए। तब वह आठ-दस वर्ष की थी। उसने तभी बदला लेने का संकल्प लिया था।
आयकर आयुक्त वसुन्धरा वाल्मीकि एक लम्बे अर्से तक मोदी की पत्रावली पर निर्णय टालती रही पर आखिर कब तक टालती। वह मोदी के अहंकार और वैभव के साम्राज्य को चूर कर सकती। पर वह दुविधाग्रस्त हो गई पर मोदी की धर्मप्रशंसा पूजा-पाठ करने वाली धर्मपत्नी सरला, समव्यस्का बेटी सुमन की ओर जाती कि निरीह परिवार को क्यों दण्ड दिया जाए। उसने प्रतिशोधागि*वश पूर्वाग्रह एवं दुर्भाग्यवश निर्णय ने अपना स्वास्थ खराब होने का बहाना बना कर स्थानान्तरण करा लिया। एक उच्चाधिकारी को समयबद्ध कार्य करते हुए तत्परता, तन्मयता और तल्लीनता के साथ कर्त्तव्यपालन और दायित्व निर्वहन करना चाहिए, पलायन नहीं।
‘प्रत्यावर्तन’ कहानी एक ऐसी महिला की कहानी है जिसे उसके पति राकेश ने स्वयं पसन्द किया था पर न जाने ऐसा क्या हुआ कि राकेश का मन उससे हटकर कामिनी जो उसकी असिस्टेण्ट थी उस पर आ गया और मनमाने देह सम्बंध विवाह के पर्याय बन गए। कामिनी ने उसे अपहृत कर लिया वह कामिनी को लेकर अपने पैतृक घर में पत्नी से अलग रहने लगा।
राकेश की पत्नी को गहरा धक्का तब लगा जब एक दिन राकेश को उसने कैमिस्ट की दुकान पर देखा- अधफ बाल, उतरा चेहरा, झुकी कमर लिए राकेश कामिनी के साथ खडा था। तथापि वह राकेश की कल्याण कामना करती रही ‘प्रभु! मेरे राकेश को कोई कष्ट न देना चाहे मुझे दे देना।’ कामिनी तो फाँसा औरत थी उसके चक्कर में आ मजिस्ट्रेट मल्होत्रा अपनी जिन्दगी से हाथ धो बैठे। शायद इसीलिए एक लम्बे अन्तराल के बाद राकेश ने पत्नी को फोन पर पूछा ‘‘क्या मैं आ सकता हूँ?’’ वह इतना ही कह पायी ‘‘क्यों पूछते हो राकेश! तुम्हारा घर है।’’ भारतीय नारी तो सर्वस्व लुटा कर भी पति की मंगल कामना करती रहती है इसलिए ये होना ही था।
कहानियों में करंट, क्लीयर हांट, चेंज, बर्थ डे, कन्फर्म, फ्रेण्डस, कम्युनिटी बाथरूम, टारगेट, गैस्ट अपीअरेन्स, इम्पोर्टेड, ग्लैमर, ग्राउण्ड फ्लोर, फ्लेट, मेडसर्वेंट, टेक्नीकल, टेशन, नोस्टेलजिया, रनिंग कमेंट्री, कंडीशंड, स्ट्रिक्ट, हेयर कटिंग सैलून, पोइम, जैसे अंग्रेजी शब्दों से बचा जा सकता था, बचना ही चाहिए था।
‘रु’ की जगह रू का प्रयोग यथा रूपये, रूतवा, रूझान, रूंधे, निरूपमा को शोधन त्रुटि नहीं माना जा सकता, असावधानीवश ही हुआ है। पंचम वर्ग और अनुस्वार ‘सब चलता है’ की वजह से दृष्टि पथ से ओझल हो गए प्रतीत होते हैं। कहानियाँ रोचक बन पडी है साहित्य जगत में संग्रह का स्वागत अवश्य होगा। ?
अध्यक्ष शब्द संसार, गीतांजलि, २६ मंगल मार्ग, जयपुर-१५ (राज.)