चार गज़लें

सहज बानी



अब कोई आशियाना ना जले तो अच्छा है,
कोई *ांदगी किसी को ना खले तो अच्छा है।
नसीब मेरे ख्वाबों का तो खाक होना है,
फिर उससे कोई बुत ना बने तो अच्छा है।
कुछ तो कीमत अश्कों की अदा करना खुदा,
लावा की सूरत में शबनम ना ढले तो अच्छा है।
किसने इन आँखों पर पहरा लगाया है,
कि इनमें कोई ख्वाब ना पले तो अच्छा है।
आंधी अपनी चाल को थोडा थाम ले,
इन छप्परों का सब्र ना गले तो अच्छा है।
जिस इंसान ने खुदा को पत्थर बनाया है
खुदा को वो इंसान ना मिले तो अच्छा है।
इनके जहन में तो खौफे-नूर बैठा है,
ताउम्र ये तिरगी में ना रह ले तो अच्छा है।
झुककर जिए हैं फलक का दीदार ना हुआ,
आज ये कफन आँखें ना ढक ले तो अच्छा है। ?

वक्त के शोलों में एक नज्म जल गई,
आँखों में जो बर्फ थी, देखो पिघल गई।
बहारों के मौसम में आए क्यों नहीं,
अब आए तो देख लो, रुत बदल गई।
खुशियों की फितरत भी मछली सी लगती है,
हाथों में आई नहीं कि यूं फिसल गई।
आँसू देकर आरजू का कर्ज अदा किया,
चलो सिर से आज एक बला टल गई।
जिस्म का ये खोल तो अब भी सलामत है,
लगता हैं कि मौत, इसकी रूह निगल गई। ?

और कहो तुम्हारे दिल का हाल कैसा है,
लोग भी ये पूछते सवाल कैसा है।
चाँद को कोई चुराकर ले गया इक रो*ा
सितारों से पूछिए *ामाल कैसा है।
तन्हाई क्या है किसी ने पूछा था हमसे,
हाथों में ये भीगा हुआ रूमाल कैसा है।
वो दिल में शादाब थी अब दर्द से शादाब है,
दिल मेरा रंगीन रहा कमाल कैसा है।
तैर आया है समंदर इश्क का प्यारे
ले तन्हाई ओढ ले मलाल कैसा है।
कल तलक सब ठीक था फिर आज ऐसा क्या हुआ
जिस्म में से जां गई, बवाल कैसा है। ?

मि*ााज तेरे शहर के फीके लगते हैं,
जिसे देखो उसके तेवर तीखे लगते हैं।
कोई भी जज्बात दिखता नहीं यहाँ
ये बुत चलना-फिरना सीखे लगते हैं।
बेवक्त ही अक्सर बदल जाते हैं
सियासत में ये मौसम भी बिके लगते हैं।
कौन कहता हैं कि पानी घट रहा हैं यहाँ,
मुझे तो ये दीद हमेशा भीगे लगते हैं।
भेडिये आ*ााद हैं और पंछी कैद हैं,
ये फरमान किसी बुझदिल के लिखे लगते हैं।
*ारा से भी हिल गये तो मौत पक्की है,
ये सीने किसी खंजर पे टिके लगते हैं। ?
(केशोर नामा बी.एस.सी. तृतीय वर्ष में पढते
हैं। इनकी जन्मतिथि २२ मई, १९९७ है।)
किशोर नामा बी.एस.सी. तृतीय वर्ष में पढते हैं। इनकी जन्म तिथि २२ मई १९९७ है।
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