कभी हजारीबाग जेल में लौट आई होगी-अंबपाली

प्रभु दयाल


साहित्य ने मानव मन और आत्मा से सदैव एकरूपता कायम की है। इतिहास के कटु यथार्थ को अपनी कोमल कल्पनाओं में पीरोकर उसे सुन्दर और आदर्श रूप देने का प्रयास किया है। किसी रचनाकार की रचना को केवल कल्पना का प्रतिबिम्ब मानना। एक सच्चे कलाकार का निरादर करना है। हालंाकि बहुत पहले अरस्तू ने इस बात को साबित कर दिया था कि ईश्वर रचित इस प्रकृति की कमी को रचनाकार अपनी कल्पना के आधार पर पूरी कर, जगत को सच्चा आनन्द प्रदान करता है। रामविलास शर्मा जैसे अलोचक ने रचनाकार को प्रजापति के अनुरूप माना है। इसलिए हमें किसी रचनाकार की कृति का मूल उद्देश्य आत्मसात करना चाहिए। न की कल्पना के धरातल में गोता लगाकर उस साहित्य आनंद और मूल सन्देश से अपने आपको वंचित करना। मैं जिस रचनाकार और उसकी जिस कृति का जिक्र करने जा रहा हूँ उसकी कथा ऐतिहासिक जरूर है परन्तु उस रचनाकार ने इतिहास के अतीतकालीन पन्नों को अपनी पवित्र आत्मा से इस प्रकार से उद्घाटित किया है जैसे वो सभी घटनाएँ, दृश्य उसकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष घटे हो।
ऐसी चिरस्मरणीय रचनाकार रामवृक्ष बेनीपुरी है। जिन्होंने अपनी एक मात्र नाटक कृति अंबपाली रचकर उसे सदैव साहित्य में अमर कर दिया है। बौद्धिक युग के प्रसिद्ध नगर वैशाली की राजनर्तकी अंबपाली के जब-जब याद किया जाएगा। रामवृक्ष बेनीपुरी को भुलाया नहीं जा सकता है। किस प्रकार बेनीपुरी देशभक्ति की भावना में रंगकर राजबंदियों के साथ छोटे नागरपुर में घने जंगलों से घिरी हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में पहुँच जाते हैं। पारिवारिक सदस्यों से विलगता और जेल के वार्ड नं. १ में उदासी के दिनों में लेखक का मन किस प्रकार अंबपली पर लिखने को प्रेरित हो जाता है। जाने किस पूर्व जन्म के मेल के आत्मा में संजोय बैठे थे। विदेशी रचनाकारों ने तो इस रचना को पढने के बाद यहाँ तक कह दिया कि वृज्जिकाओं के आठ वंशों में शायद लेखक का भी वंश संबंधित रहा हो। मैंने इस रचना का अध्ययन कर इन विद्वानों की बातों का सार्थक पाया है। पढते हुए कहीं पर भी नहीं लगता की लेखक अंबपाली की ऐतिहासिक घटना का चित्रण कर रहा है। लेखक स्वयं उस परिवेश का भोक्ता सा न*ार आता है।
ये सत्य है कि साहित्य का संबंध आत्मा से होता है। सच्ची आत्मा किसी कथा को, किसी घटना को कब और कहाँ उकेर दे। इस बात से लेखक स्वयं अनभिज्ञ रहता है। मुझे याद है। धर्मवीर भारती ने अन्धायुग नाटक के पात्र अस्वथामा का चित्रण करते हुए लिखा था कि इस पात्र को लिखते हुए ‘मैं कभी छत पर टहलने लगता तो मुझे लगता इस पात्र की सभी संवेदना और घटनाएँ मुझमें एकाएक कैसे जागृत हो गई।’ ‘‘अन्धायुग कदापि न लिखा जाता, यदि उसका लिखना न लिखना मेरे वश की बात रह गयी होती। इस कृति का पूरा जटिल वितान जब मेरे अन्तर में उभरा तो मैं असमंजस में
पड गया।’’१
इसी प्रकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने अंबपाली नाटक की भूमिका में लिखते है- ‘‘अब भी वे दिन भूले नहीं हैं, जब हजारीबाग सेन्ट्रल जेल के वार्ड नं. १ के सामने सघन पतियों वाली एक आम्र विटपी के तने से उँगठकर, म अपनी अंबपाली की रचना किया करता था- सामने फूलों से लदे मोतियें और गुलाब के झाड थे, ऊपर आसमान पर बादलों की घुडदौड होती थी और इधर मेरी लेखनी कागज पर घुडदौड करती थी।’’२
अंबपाली के जीवन का इतना मार्मिक एवं संवेदनशील चित्रण अनायाश और चाहकर उकेरा नहीं जा सकता। वैशाली की उस राजनर्तकी को ही अपनी कथा या नाटक का माध्यम बनाने की क्या जरूरत थी। जबकि बहुत से विषय लेखक के सामने थे। किस प्रकार लेखक ने राजनर्तकी अंबपाली की ऐतिहासिक कथा को नाटक का रूप दिया है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड सकती है। अंबपाली बचपन में अपनी माँ को खोकर अपनी मौसी सुमना के आंचल में पल-बढ कर यौवन की धरातल पर पहुंच जाती है। अंबापाली अपनी सखी मधलिका के साथ जीवन के मधुर सपनों को संजोए हुए जीवन रथ पर सवार है। आनंदग्राम की प्राकृतिक परिवेश में अंबपाली अपनी मौसी के साथ रहकर सुखी जीवन व्यतीत करती है। तभी उसका जीवन दो धाराओं में बंटने लगता है। एक तरफ उसका ग्रामीण प्रेमी अरुणध्वज है, जिसके पवित्र और आदर्श प्रेम में अंबपाली खींची चली जाती है। दूसरी धारा का बहाव इतना भयंकर था कि एक दिन में उसका सारा जीवन बदल जाता है।
अंबपाली, मधूलिका और अरुणध्वज वृज्जिकाओं के फाल्गुनी उत्सव में शामिल होने के लिए वैशाली पहुँच जाते हैं। वहाँ राजनर्तकी पुष्पगंधा अपने चयन मण्डल के साथ आती है अपूर्व सुन्दरी अंबपाली सोमरस के नशे में नाचती हुई मगन है तभी, पुष्पगंधा नाचती हुई, अंबपाली के गले में पुष्पों की माला डालकर नई राजनर्तकी की घोषणा कर देती है। पुष्पगंधा का एक निर्णय अंबपाली के जीवन का स्वरूप बदल देता है। हालांकि उस जमाने में राज नृत्यांगना चुने जाना गौरव की बात थी। जिसे कुलीन वर्ग भी ललचाई निगाहों से देखता था परन्तु नियति की कौन टाल सकता था। किसी प्रकार अंबपाली क्षोम, पीडा और व्यथा की दुनियाँ में अपनों को छोड कर राजनर्तकी बनने को मजबूर होती है। वैशाली के लोग जिसे गौरव और शान समझते हैं, उसे अंबपाली कितना घृणित समझती है। लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी ने अंबपाली का अपनों से अलग होने की पीडा का बहुत मार्मिक एवं संवेदनशील चित्रण किया है।
लेखक स्वयं जेल में बन्द अपनों से बिछडकर व्यथा के सागर में डुबकियाँ ले रहा है। इस स्तर पर अंबपाली और लेखक की पीडा चरम स्तर पर है। अंबपाली राजभवन की नृत्यशाला में परिचारिकाओं के साथ होने वाली बातचीतों में अपनी मर्मवेदना को छिपाएँ हुए दीपशिखा-सी जलती रहती है। पुष्पगंधा और अंबपाली में होने वाली जीवन की सार्थकता के विचार विमर्श को लेखक ने बडी सहजता से पुष्पगंधा के मुख से कहलाया है- ‘‘*ान्दगी की सार्थकता मनमाना जीना या लम्बी आयु पाना नहीं है। जिन्दगी की सार्थकता है किसी बडे काम के लिए उत्सर्ग कर दिया जाना- फिर वह उत्सर्ग की हुई जिन्दगी एक दिन की हो या सौ बरस की...।’’३
सच है जो जीवन की लालसा मरते दम तक करते हैं वो उत्सर्ग के अधिकार नहीं होते। यौवन के रथ पर सवार अंबपाली भगवान बुद्ध के वैशाली आगमन पर उनसे भेंट करती है और उन्हें आतिथ्य सेवा के लिए आखिर राजी कर लेती है। लेखक ने अंबपाली के रूप सौन्दर्य और भगवान बुद्ध के बोधिसत्व की आपसी टकराहट का बडा मार्मिक चित्रण किया है। अंबपाली का हर प्रयास विफल रहता है और अंबपाली अपनी परिचारिका को कहती है-
‘‘अगर भगवान बुद्ध के पास अस्त्र नहीं है तो वे विजयी कैसे होते हैं? कैसे भरतखण्ड में उनका दिग्विजय का डंका बजता जा रहा है? और क्या बिना अस्त्र के ही अंबपाली ने वृज्जिसंघ पर विजय प्राप्त की है? हुआ यही कि न भगवान मुझे पराजित कर सके, न मैं उन्हें पराजित कर सकी।’’४
जिसने भगवान बुद्ध का सानिध्य पाया हो, जिसमें बौद्ध धर्म में नारी के प्रवेश की वर्जिता को तोडा हो वो साधारण अंबपाली नहीं हो सकती। भगवान बुद्ध ने भी अंबपाली को चित्रित नारी कहा था। मगध का शासक अजातशत्रु अंबपाली के रूप सौन्दर्य को जानकर छल पूर्वक वैशाली पर आक्रमण कर देता है। अंबपाली कोमलता की देवी होकर भी युद्ध के लिए अपने आपको तैयार कर सभी वृज्जिकाओं को सम्बोधित करती है। वैशाली की पराजय के बाद जब अजातशत्रु अंबपाली से मिलने आता है तो अंबपाली कहती है-
‘‘बल सिर्फ तलवार और धनुष में नहीं है मगधपति, कुछ ऐसी ताकतें भी है जिनके सामने तलवारें मोम की तरह गल जाती है और धनुष तिनके की तरह टूट जाते हैं।’’५
आखिर अंबपाली अजातशत्रु को उसके पिता की तस्वीर दिखाती है जो कभी अंबपाली से प्रणय की भीख लेने आया था। तस्वीर देखने के बाद अजातशत्रु के रोष की उत्तेजना शान्त होकर विषाद और पराजय में बदल जाती है और वह अंबपाली को कहता है तुमने मुझे पराजित कर दिया। मैं आज ही वापसी जा रहा हूँ। वैशाली की पराजय के बाद अंबपाली भगवान बुद्ध के पास बौद्ध धर्म स्वीकार करने के लिए चली जाती है। भगवान बुद्ध ने उसकी समर्पण को देखकर कहना पडा।
‘‘भद्रे! श्रद्धा प्रतिमा को भी बोलने को लाचार करती है- उससे वरदान लेती है। तुम अपने पर विश्वास रखो, सभी साधन तुम्हें आप ही प्राप्त होंगे।’’६ इस प्रकार अंबपाली बौद्ध धर्म में नारी प्रवेश की वृजिता को तोडकर भिक्षुणी का परिधान धारण कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेती है। चार अंक का यह नाटक रंगमंच और तत्त्वों की दृष्टि से खरा-उतरता है इसी कारण भारतीय संगीत नाटक अकादेमी में सबसे पहले प्रदर्शित होने का गौरव प्रदान करता है। हजारीबाग की उस पावन भूमि का ही कारण होगा कि लेखक ने इस जेल में दो रचनाएँ लिखी माटी की मूरतें और अंबपाली नाटक दोनों अपने आप में अद्वितीय है। लेखक पर जरूर भगवान बुद्ध की कृपा दृष्टि और वैशालियों की श्रद्धा भावना, इस रचना के निर्माण में सहायक रही होगी। इन बातों को वो ही पाठक या श्रोता जान सकता है जिसने अंबपाली नाटक को गम्भीरता से पढा हो।
पाठक वर्ग और समाज से मेरा विशेष अनुरोध है कि एक रचनाकार अपने जीवन के तमाम स्वप्नों को रोंदकर, समाज और राष्ट्रहित के लिए अपने सुन्दर जीवन को न्यौछावर कर देता है और अपनी नेक दिल से समाज के सामने अपने अनुभवों को बयान करता है। जिससे हम बहुत कुछ जान सकते हैं। अपनी गरिमा और संस्कृति को बचाया जा सकता है परन्तु हम सभी उन रचनाओं और विचारों को पढते तक नहीं। आत्मसात करना तो दूसरी बात होगी। ऐसे महान् व्यक्तित्व को भुलाया नहीं जा सकता। वर्तमान में रचनाकारों से संसार भरा पडा है। प्रत्येक अपने आपको कला में प्रवीण समझता है। व्यक्ति अपनी विचारशीलता और अपने अनुभव को स्वार्थ के वशीभूत होकर थोपते रहते हैं। माया की तीव्र लालसा के आड में यश का पर्दा किए रहते हैं। सच्चा साधक समाज और राष्ट्र से अपने लिए कोई माँग न करके केवल देता है, जो करना था, वो कर देता है। उसे न करने का ज्ञान है और न ही उसे परिणाम की लालसा जीवित रखती है। ऐसे सच्चे साधकों को हमें भूलना नहीं है, उन्हें और उनके सात्त्विक विचार भावनाओं को जीवित रखना है। युवा वर्ग अन्धी दौड में अपनी गरिमा की दहलीज न लांघे, अपने सच्चे रचनाकारों को श्रद्धापूर्वक नमन करें। ?
संदर्भ-
१. धर्मवीर भारती ः अंधायुग, किताबघर प्रकाश, संस्करण
२००५, भूमिका से
२. मस्तराम कपूर ः रामवृक्ष बेनीपुरी संचयन, साहित्य
अकादमी, दिल्ली, २०००, पृष्ठ सं. ३६४
३. वही, पृष्ठ सं. ३८८
४. वही, पृष्ठ सं. ४०७
५. वही, पृष्ठ सं. ४४७
६. वही, पृष्ठ सं. ४६७
गांव-भगवानसर बास, पोस्ट-गोरखाना, तह. नोहर-३३५५२३
हनुमानगढ (राज.) मो. ८०५८०३५१७४