औधड जनकवि बाबा नागार्जुन के काव्यबिंब

मुकेश सैनी


हिंदी के प्रगतिवादी एवं प्रयोगधर्मी कवियों में बाबा नागार्जुन का नाम औघड जनकवि के रूप में विख्यात है। रवींद्र भ्रमर के शब्दों में, ‘‘कवि की हैसियत से नागार्जुन प्रगतिशील और एक हद तक प्रयोगशील भी हैं। उनकी अनेक कविताएं प्रगति और प्रयोग के मणिकांचन संयोग के कारण एक प्रकार के सहज भाव-सौंदर्य से दीप्त हो उठी है। आधुनिक हिंदी कविता में शिष्ट गंभीर हास्य तथा सूक्ष्म चुटीले व्यंग्य की दृष्टि से भी नागार्जुन की कुछ रचनाएं अपनी एक अलग पहचान रखती हैं।’’१ ‘‘यात्री’’ उपनाम एवं ‘‘बाबा’’ विशेषण से सुविख्यात कविवर नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। बिहार में अवध से दूर मिथिला जनपद के इस कवि का जन्म दरभंगा जिले के तरौनी गांव में सन् १९१० में हुआ। बाबा नागार्जुन निराला-काव्य के प्रेमी थे। ये जन-आंदोलनों को सतत सहयोग देने वाले जनकवि के रूप में जाने जाते थे और इनका काव्य मजदूरों एवं शोषितों की आवाज का काव्य था। अपने समकालीन कवियों में हिंदी में अपने ही ढंग की कविता लिखने वाले बाबा एकमात्र कवि थे। इनका जीवन घुमंतू ही रहा। हिंदी व मैथिली के साथ-साथ अन्य कई भाषाओं का ज्ञान भी बाबा को था।
बाबा का काव्य-संसार अद्भुत एवं विलक्षण था। कबीर और निराला की परंपरा में खरी-खरी कहने वाला यह कवि हिंदी काव्य-जगत में धु*वतारे की भांति केंद्र में रहा। बहुश्रुत एवं बहुपठित बाबा की काव्यानुभूतियां पाठक-हृदय को रसाप्लावित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखतीं। विविधवर्णी इंद्रधनुषी काव्योर्मियों से निमज्जित उनकी कविताएं बिंबों-प्रतीकों का भी सुंदर सृजन करती हैं। कविवर केदारनाथ सिंह बिंब को यथार्थ के एक ऐसे सार्थक टुकडे के रूप में देखते हैं, जो अपनी ध्वनि व संकेतों से भाषा को अधिक संवेदनशील एवं पारदर्शी बनाता है। वह अभिधा की अपेक्षा लक्षणा और व्यंजना पर आधारित होता है।
बिंब के बारे में कल्पना का बहुत महत्व है। स्वप्नवत् घटने वाली असंख्य घटनाओं की छवियां प्रतिभावत हमारे मानस में रहती हैं और बिंब इन्हीं का पर्याय कहलाता है, जो स्मृतिजन्य एवं स्व-रचित होता है। अनुभूतिजन्य बिंब दृष्टि, शब्द, गंध, रस, स्पर्श द्वारा उद्भूत होता है। कुछ क्रियाएं जैसे सूंघने, छूने, चखने, देखने, बोलने आदि से हमारी चित्तवृत्ति में अनुभव के स्तर पर जो अर्थछवियां घटित होती हैं, उन्हें ही बिंब कहा जाता है। कुछ बिंब स्व-रचित होते हैं, पर वे कोरी कल्पना नहीं होते। जैसे ‘‘पवनदूती’’ या ‘‘मेघदूत’’ को हम दूत-दूती अथवा मेघ व पवन के रूप में पहले से ही जानते हैं। यहां कवि की मौलिकता अवश्य प्रभावित करती है। बिंब-प्रतिमा यही है। इससे स्पष्ट है कि बिंब एक ऐसा शब्द-चित्र है, जो कल्पना द्वारा ऐन्द्रिक अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है, जिसका महत्वपूर्ण कार्य काव्य-भाषा को संक्षिप्त, केन्द्रित और संघटित करना है। बिंब शब्द की अपेक्षा अधिक संदर्भ-सापेक्ष होता है। बाबा का काव्य इस कसौटी को अर्थवान बनाता है। उनके काव्य में केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन की भांति बिंबों की कुछ झलक मात्र न होकर उसका संपूर्ण रूप विद्यमान है।
समकालीन कविता मुक्त-छंद की कविता है, जबकि बिंब-विधान की दृष्टि से छंद-बद्ध अथवा मुक्त-छंद काव्य-परंपरा में कहीं अवरोध नजर नहीं आता। बाबा के काव्य में तो बिंबों को मुंह-बोलते देखा जा सकता है। उनकी ‘‘यह दंतुरित मुस्कान’’, ‘‘सिंदूर तिलकित भाल’’, ‘‘बहुत दिनों के बाद’’, ‘‘खुरदरे पैर’’, ‘‘बादल को घिरते देखा है’’, ‘‘हजार बाँहों वाली’’, ‘‘प्रेत का बयान’’, ‘‘आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी’’, ‘‘पीपल के पीले पत्ते’’ आदि अनेक प्रसिद्ध कविताओं में कवि-प्रतिभा और काव्य-प्रगाढता को सहज ही देखा जा सकता है। उनकी ‘‘यह दंतुरित मुस्कान’’ कविता की पंक्तियां देखिए-
‘‘परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषण
छू गया तुमसे कि झरने लग पडे शेफालिका के फूल’’२
यहां ‘‘परस पाकर’’ तथा ‘‘छू गया’’ शब्दों के सहारे जो बिंब हमारी स्मृति में कौंधता है, उसे ‘‘स्पर्श-बिंब’’ के रूप में महसूस किया जा सकता है। घुमक्कडी जीवन के आदी कवि नागार्जुन के मन में अपनी पत्नी के प्रति गहरी रागात्मकता थी। उनकी कविता ‘‘सिंदूर तिलकित भाल’’ में उसी रागात्मकता को तल-स्पर्शी रूप में अनुभूत किया जा सकता है-
‘‘घोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल।
याद आता तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल।’’३
उनका यह स्मृति-बिंब पाठक की चेतना को सहज ही झकझोरने लगता है। उनकी कविता ‘‘चंदू मैंने सपना देखा’’ में तो एक साथ ही स्वप्न, स्मृति एवं दृश्यबिंब की त्रिवेणी प्रवहमान हो उठी है-
‘‘चंदू मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा।’’४ यहां भभुआ से पटना लौट रहे बाबा के मन में चंदू से जुडी स्मृतियां जिस रूप में कौंधती हैं, वे पाठक के मन में भी घर करने लगती है। नादात्मक-बिंब (श्रव्य-बिंब) की दृष्टि से उनकी अनेक कविताएं उल्लेखनीय हैं। कुछ उदाहरण देखिए-
‘‘खड-खड-खड करने वाले
ओ पीपल के पीले पत्ते
अब न तुम्हारा रहा *ामाना’’५
‘‘धिन-धिन धा धमक-धमक
मेघ बजे
दामिनी यह गयी दमक
मेघ बजे
दादुर का कंठ खुला
मेघ बजे’’६
बाबा की अनेक कविताएं एक साथ कई-कई बिंबों को आत्मसात किए पाठक को आह्लादित करती हैं। उनकी ‘‘बहुत दिनों के बाद’’ कविता में तो जैसे ‘‘गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श’’ बिंब कतारबद्ध होकर चहल-कदमी करते दिखाई देते हैं-
‘‘बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी-भर देखी
पकी-सुनहली फसलों की मुस्कान...
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैं जी-भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान...’’७
यहां की पकी फसलों को भरपूर नजरों से देखने में जहां ‘‘चाक्षुष’’ (दृश्य) बिंब है, वहीं संध्या-समय घरों में किशोरियों द्वारा धान कूटने की क्रिया से उत्पन्न नादात्मक बिंब कवि के साथ-साथ पाठक के कानों में भी अमृत घोलने लगता है। इसी कविता की आगे की पंक्तियां देखिए-
‘‘बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी-भर सूंघे
मौलसिरी के ढेर-ढेर से ताजे-टटके फूल...
‘‘बहुत दिनों के बाद
अबकी मैं जी-भर छू पाया
अपनी गंवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल...
‘‘बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी-भर तालमखाना खाया
गन्ने चूसे जी-भर
बहुत दिनों के बाद’’८
यहां सूंघने, स्पर्श करने एवं चूसने की क्रियाओं से एक साथ ही ‘‘घ्राण’’ (घ्रातव्य), ‘‘स्पर्श’’ (स्पर्श) एवं आस्वाद्य-बिंबों का सुन्दर निदर्शन हुआ है। इसी प्रकार बाबा की ‘‘घिन तो नहीं आती है?’’ कविता में स्पर्श्य, श्रव्य एवं घ्रातव्य बिंबों के माध्यम से सहज ही रसाभास होने लगता है। कुछ पंक्तियां देखिए-
‘‘छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूंछों की थिरकन
सच-सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है
जी तो नहीं कुढता है?’’९
आस्वाद्य-बिंब की दृष्टि से बाबा की ‘‘चना जोर गरम’’ कविता उल्लेखनीय है। इसमें समसामयिक स्थितियों पर भी सार्थक टिप्पणियां है। नागार्जुन समय की शिलाओं पर प्रहार करने वाले अद्भुत शिल्पी थे। शोषितों का शोषकों के प्रति विद्रोह उनकी अनेक कविताओं में प्रतिध्वनित होता है। ‘‘कब होगी इनकी दीवाली’’ नामक उनकी कविता में ‘‘कल्पित-बिंब’’ तथा ‘‘तात्कलिक-बिंब’’ अपने समय के यथार्थ को प्रकट करते हैं। कविता की पंक्तियां देखिए-
‘‘उसका मुक्तिपर्व कब होगा?
कब होगी उसकी दीवाली
चमकेगी उसके ललाट पर
कब ताजे कुंकुम की लाली? (कल्पित-बिंब)
‘‘बाबा, आप बडे भोले हो।
इनको दर्शन देने आए...
ये तो इस सेंट्रल कारा में
जान हमारी लेने आये।’’१० (तात्कालिक-बिंब)
बाबा की कविताओं में ‘‘गतिशील-बिंब’’ भी है, जो चाक्षुष एवं दृश्य-बिंब को गति प्रदान करता है। उनकी ‘‘खुरदरे पैर’’ कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
‘‘फटी बिवाइयों वाले खुरदरे पैर
दे रहे थे गीत
रबड-विहीन ठूंठ पैडलों को
चला रहे थे
एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चक्र
कर रहे थे मात त्रिविक्रम वामन के पुराने पैरों को
नाप रहे थे धरती का अनहद फासला’’११
‘‘घ्रातव्य-बिंब’’ की दृष्टि से बाबा की ‘‘मेरी भी आभा है इसमें’’ कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
‘‘भीनी-भीनी खुशबू वाले
रंग-बिरंगे
यह जो इतने फूल खिले हैं
कल इनको मेरे प्राणों ने नहलाया था
कल इनको मेरे सपनों ने नहलाया था’’१२
‘‘अकाल और उसके बाद’’ कविता में चूल्हा-चक्की के साधारणीकरण के साथ ही कुतिया, छिपकलियों एवं चूहों की अकालग्रस्त अवस्था तथा बाद में जमाना होने पर घर-भर में खुशी की उद्भावना ‘‘चाक्षुष’’ बिंब की मनोरम सृष्टि करती है-
‘‘कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त’’१३
बादलों में भी बाबा का मन बहुत रमा है। नन्हें बादलों को कुरंग-शावकों सदृश चौकडियां भरते देख बाबा कहने लगते हैं-
‘‘नभ में चौकडिया भरें भले, शिशु घन-कुरंग
खिलवाड देर तक करें भले, शिशु घन-कुरंग
लो, आपस में गुंथ गए खूब, शिशु घन-कुरंग
लो, घटा जाल में गए डूब, शिशु घन-कुरंग’’१४
पहाडों पर जिन्होंने बादलों को बनते हुए, उथल-पुथल होकर क्रीडाएं करते देखा है, उनकी स्मृति में यह दृश्य-बिंब सहज ही साकार हो उठता है। दूसरी और ‘‘बादल को घिरते देखा है’’ कविता में कालिदास का मेघदूत साकार होने लगता है-
‘‘कहां गया धनपति कुबेर वह/कहां गयी उसकी अलका,
नहीं ठिकाना कालिदास के/व्योम प्रवाही गंगाजल का,
ढूंढा बहुत परंतु लगा क्या/मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताये वह छायामय/बरस पडा होगा न यहीं पर,
जाने दो, वह कवि-कल्पित था,/मैंने तो भीषण जाडों में,
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर/महामेघ को झंझानिल से,
गरज-गरज भिडते देखा है,/बादल को घिरते देखा है।१५’’
यहां कवि के मानस में कालिदास और उनके मेघदूत की स्मृतियां है और यहीं-कहीं उस मेघ के बरस जाने का अनुमान भी है। नागार्जुन कालिदास के मेघ को कवि-कल्पित कह सकते हैं, क्योंकि उन्हें उसका कोई प्रमाण नहीं मिलता, पर इस महामेघ के गर्जन-तर्जन के साथ झंझानिल से जूझने का दृश्य कवि अपनी खुली आंखों से देखते हैं। ऐसे दृश्य-बिंब एवं स्मृति-बिंब बाबा के काव्य में स्वतः ही साकार हो उठते हैं। बाबा के काव्य में ‘‘सरल-बिंब भी स्वतः ही दृष्टिगोचर होने लगते हैं। उनकी कविता ‘‘उनको प्रणाम।’’ की ये पंक्तियां ही पर्याप्त है- ‘‘जो नहीं हो सके पूर्ण काम/मैं करता हूं उनको प्रणाम।’’१६
इसी प्रकार बाबा की ‘‘जया’’ कविता है, जिसमें सर्वत्र चाक्षुष-बिंब का दिग्दर्शन होता है-
‘‘छोटे-छोटे मोती जैसे दांतों की किरणें बिखेरकर
नील कमल की कलियों जैसी आंखों में भर
अनुनय सादर
चार साल की चपल-चतुर वह बहरी-गूंगी
कितनी सुंदर, नयनाभिराम
उस लडकी का है जया नाम’’१७
बाबा की अनेक कविताएं मध्यमवर्गीय मंसूबों की व्यथा-कथा के ताने-बाने में बुनी हुई है। ‘‘बाकी बच गया अंडा’’, ‘‘तीनों बंदर बापू के’’, ‘‘स्वदेशी शासक’’, ‘‘शासन की बंदूक’’, ‘‘२६ जनवरी, १५ अगस्त’’, ‘‘इंदु जी, क्या हुआ आपको’’, ‘‘गेहूं दो, चावल दो’’, ‘‘देवी, तुम तो काले धन की बैसाखी पर....’’, ‘‘तीन दिन, तीन रात’’, ‘‘प्रेत का बयान’’ आदि ऐसी कविताएं हैं, जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण करने वाली कालजयी कविताएं कही जा सकती हैं। इन कविताओं में युगीन सत्य सहज-सरल बिंबों-प्रतीकों में व्यक्त हुआ है और यह सब सायास नहीं, अनायास ही घटित हुआ है। ऐसे औघड जनकवि की काव्य-प्रतिभा को शत-शत नमन, कोटि-कोटि प्रणाम! ?
संदर्भ -
१. हिंदी साहित्यकोश, भाग-२, पृ. २९६ (सं. धीरेंद्र वर्मा
आदि, संस्करण-१९८६ ई.)
२. नागार्जुन, पृ. ५२ (सं. प्रभाकर माचवे, सुरेश सलिल,
राजपाल एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली)
३. वही, पृ. ५०
४. ‘‘नया पथ’’, पृ. १७४ (सं. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह,
चंचल चौहान, जनवरी-जून २०११ संयुक्तांक, ४२
अशोक रोड, नई दिल्ली)
५. वही, पृ. १०९
६. वही, पृ. १५३
७. वही, पृ. १४३
८. वही, पृ. १४३
९. वही, पृ. १४५
१०. वही, पृ. १७०
११. वही, पृ. १५५
१२. वही, पृ. १४४
१३. वही, पृ. १२७
१४. वही, पृ. १५२
१५. वही, पृ. १०२
१६. वही, पृ. ९९
१७. वही, पृ. १०४
१८. वही, पृ. ११८
अनाथालय के पीछे, विवेक नगर, बीकानेर-३३४००१ (राज.)