समकालीन हिन्दी कविता में आम आदमी की संवेदनाएँ

डॉ. गोपी राम शर्मा


सही अर्थों में संवेदनशील और जागरूक वही है, जो समय की नब्ज को पकड सके और नित प्रति परिवर्तित होते परिवेश और परिस्थितियों के स्पंदन को अनुभव कर सके। ऐसा व्यक्ति ही लोक मानस को समझ बूझ सकता है। लोक मानस से प्राप्त संवदेनाओं, मान्यताओं, मूल्यों एवं विश्वासों को समझकर सही अर्थों में जीता है। समकलीन हिन्दी साहित्य अपने समय या काल से जुडा है। समकालीन हिन्दी कविता हालांकि अपनी पुरातन धारा से जुडी है पर स्वतंत्रता के बाद आये भारतीय समाज के मूल्यों को बहुत प्रखर रूप से उभार रही है।
हिन्दी में समकालीनता शब्द अंग्रेजी के कन्टेम्परेनियम या कन्टेम्परेनिटी शब्दों का रूपान्तरण है जहाँ इनका अर्थ है- ‘एक ही समय में घटित होने वाला।’ समकालीन शब्द विशेषण है और समकलीनता एक संज्ञा है। स्वतंत्रता के बाद जनता द्वारा सुखद भविष्य के सपने देखे गए। आम आदमी के विकास हेतु पंचवर्षीय योजनाएँ बनीं, पंचशील और वसुधैव कुटुम्बकम् आधारित विदेश नीति बनी। यह मोहग्रस्तता का काल १९६०-६२ तक चला। लेकिन सन् १९६२ में चीनी आक्रमण और उससे प्राप्त पराजय ने अनेक प्रश्ा*ों को खडा कर दिया। चरमराती अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, जातिवाद, साम्प्रदायिकता आदि ने आम आदमी का मोहभंग कर दिया। इस प्रकार सातवें दशक के प्रारम्भ में भारतीय वातवरण में घोर अव्यवस्था और उथल-पुथल मची। समाज में इस एक ओर चेतना, जागृति और आक्रामकता जगने लगी, वहीं कुण्ठा, हताशा, प्रताडना, विवशता, दयनीयता, व्याप्त होने लगी। समकालीन कवि इन बदली परिस्थितियों से अप्रभावित न रहा और अपने काव्य में इन स्थितियों का चित्रण किया।
समकालीन कविता अनुभूति एवं अभिव्यक्ति दोनों रूपों में अपनी पूर्ववर्ती कविता से भिन्न है, क्योंकि समकालीन लेखन की भूमिका पूरी ईमानदारी से समकालीन व्यक्ति की जांच पडताल से जुडी है, इसीलिए इसमें अपने समय का यथार्थ चित्रण मिलता है। समकालीन कविता युगीन सन्दर्भों को लेकर नये-नये मूल्यों की स्थापना करती है। यह कोई अलग से आन्दोलन नहीं है बल्कि देश में जारी शोषण, बर्बरता, अत्याचार और आम आदमी की पीडा व्यक्त करने का आधार है। धूमिल, लीलाधर जगूडी, चन्द्रकांत देवताले, वेणुगोपाल, सोमदत, बलदेव बंशी, प्रयाग शुक्ल, सौमित्र मोहन, मलयज, नीलाभ, राजेश जोशी, अरुण कमल, गोरख पांडेय, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, राजकुमार कुम्भज, ज्ञानेन्द्रपति, मनोज सोनकर आदि कवि समकालीन कविता में अपने समय और परिवेश को चित्रित करने में लगे हैं।
साहित्य में आम आदमी या सामान्य जन की चर्चा विश्व के हर साहित्य में मिल जाती है। साहित्य व्यक्ति विशेष की संवेदनाओं का साधारणीकरण करता है। भारत के प्राचीन साहित्य में सामान्य जन की संवेदनाएं कम ही मिलती है। संस्कृत साहित्य का नायक तो धीरोदात्त प्रकार का होता है। हिन्दी में भक्ति काल में कबीर एवं तुलसी काव्य में सामान्य व्यक्ति का चित्रण मिल जाता है। रीतिकाल में फिर से आम आदमी नदारद है। आधुनिक काल में जन सामान्य एक क्रांतिकारी परिवर्तन के साथ उपस्थित होता है। भारतेन्दु, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, पंत, दिनकर आदि के साहित्य में जन साधारण का चित्रण मिल जाता है। सही मायनों में आम आदमी का चित्रण नागार्जुन की कविताओं में मिलता है। इस प्रकार सातवें दशक तक आम आदमी का किसी न किसी रूप में लिखा जाता रहा है पर सातवें दशक के कवियों ने आम आदमी को गम्भीरता एवं विविधतापूर्ण गहन संवेदना के साथ चित्रण किया।
साधारण, सामान्य, मामूली जन आदि आम आदमी के ही पर्याय है पर आम आदमी कहने में जितना पूरा ध्वनितार्थ मिलता है उतना अन्य पर्यायवाची शब्दों में नहीं। ‘आम’ शब्द अमूर्त है और यह व्यापक अर्थ की उद्भावना लिए हुए है। आम आदमी बिल्कुल मामूली, पद दलित, प्रताडित, विवश व्यक्ति के सन्दर्भ में अर्थ लिया हुआ है। इसी आदमी को परिभाषित करते हुए कमलेश्वर कहते हैं ‘‘यह आदमी वह है जो कहीं भी किसी भी क्षेत्र में नियन्ता नहीं है पर हर कार्य की आधारशिला है।’’१ यह आदमी सामाजिक विषमता से त्रस्त और शोषित व्यक्ति है जो प्रत्येक स्तर एवं हर अवस्था में अपने को विवश पाता है। समकालीन हिन्दी कविता इसी आदमी की पीडा को चित्रित करती है। सातवें दशक की इन कविताओं में आम आदमी की पीडा, संत्रास, दयनीयता, तनाव, जीवन संघर्ष का चित्रण है वहीं व्यवस्था की क्रूरता, दमन, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, विकृत न्याय व्यवस्था, महंगाई, भूख, कुपोषण, दरिद्रता आदि वर्णित है। इस कविता में आदमी का विद्रोह, चेतना, संघर्ष, विरोध, जागृति के स्वर भी सुनाई देते हैं।
आम आदमी की सबसे बडी पीडा निर्धनता की है। समकालीन कवि ने निर्धनता और अभाव पर खुल कर लिखा है। कवि दारिद्रय से उत्पन्न संवेदनाएं व्यक्त करते हुए लिखता है- ‘‘अम्मा सोचती/एक दिन हमारी गिद्द सी गरीबी उड जायेगी/मगर वह तोता ठहरी/कमबख्त इसी पिंजरे में जगी बैठी रही/अब माँ का काम बेटी ने संभाल लिया है/और गरीबी/वह कबूतरों सी बढती ही जा
रही है।२’’
समकालीन कविता मध्यम वर्गीय अभावों का दस्तावेज है। संवेदना यह है कि गरीब जेब से ही गरीब नहीं होता उसकी मानसिकता और व्यवहार में गरीबी उभरने लगती है। गरीब की नजर में महंगी वस्तुओं का चित्र आ ही नहीं पाता। इसी दृष्टि को समकालीन कविता उभारती है-
‘‘सहसा मैंने सुना/दबी जुबान से/कह रहा था ठेले वाला/इस आदमी के चेहरे से ही/मैं भाँप गया था/यह सस्ती ढेरी से खरीदेगा केले।’’३
आज के समय आम आदमी की पीडा को मंहगाई ने और बढा दी है। गरीबी को वह किसी तरह सहन करने की जुगत लगाता है पर दिनोंदिन बढती मंहगाई उसके बनाये हिसाब को गडबडा देती है। पीडा यह है कि दो जून का भोजन भी खटकने लगता है यथा- ‘‘रात भोजन करते हुए/मैं जब भी थाली में छोड देता हूँ/एकाध लुकमा/‘और थोडा सा खा लो’ के आग्रह के/बदले धीरे से अनाज की महंगाई/की बात करती हो।४’’
जब ऐसी पीडा का चित्र उभरता है तो पाठक विह्लित हो जाता है। कवि पूरे समाज को उस पीडा का अहसास कराना चाहता है जो महंगाई और निर्धनता के कारण समाज का साधारण व्यक्ति भोगता है। कवि समाज से ही नहीं, निर्जीव वस्तुओं को भी गरीबी की पीडा से स्पन्दित करना
चाहता है-
‘‘फलों/जब भी तुम महंगे बेचे जाओ/तो तुरन्त सड जाया करो/छूते ही या देखती ही।’’५
आम आदमी की एक समस्या बेरोजगारी की है। बेरोजगारी इस वर्ग में एक रूढि ही बन गया है। ग्रामीण इस रोजी रोटी के लिए शहर की ओर भागता है और शहरी दफ्तरों की खाक छानता है। मध्यम वर्ग के लिए नौकरी की तलाश एक बडी जद्दोजहद है। इसी पीडा को कवि इस कविता में उभारता है-
‘‘सुबह साढे दस से साढे पांच तक/सारा दिन किचकिचाती धूप में/चालू चाय और बीडी के सहारे/विद्यालय और सरकारी कार्यालयों से/अखबार के दफ्तरों तक/फकत एक छोटी सी नौकरी की तलाश में/मैं नापता रहा था/अजगर सी लम्बी सडकें।’’६
आजीविका देने वाला भी न केवल कठोर काम लेता है, उनका खून तक चूस जाता है। मालिक लोग तो स्नियों की लाज तक खेलते हैं। मनोज सोनकर की ‘सनीचरी’, भागीरथ भार्गव की ‘भोली की माँ’, उदय प्रकाश की ‘करीमन करानची’, केदारनाथ सिंह की ‘माँ’, प्रेम शंकर रघुवंशी की ‘बर्तन वाली बाई’, आलोक वर्मा की ‘बेर बेचती बुढिया’ आदि निरीह महिलाएँ मालिकों के शोषण से गुजरती है। समकालीन कविता का एक चित्र देखिए-
‘‘जिस घर में काम करती है माँ/मालकिन की आँख बचाकर/जब मालिक थपथपा देते हैं माँ के गाल/काट लेते हैं चिकोटी/जब लाचारी से झुका लेती है माँ सिर/तब क्यों नहीं बदलती हैं चीजें?’’७
महंगाई, बेरोजगारी और इसके लिए हो रहे शोषण से पिसते-पिसते आम आदमी शारीरिक रूप से अक्षम होकर रुग्ण हो जाते हैं। बीमारियों से घिरा गरीब दोहरी मार झेलता है। ऐसे गरीब का चित्रण बहुत करुणा-संवेदना उपजाता है-
‘‘जिनके आंगन में धूप कभी नहीं आती/जिनके संडास घरों में खाँसी/किवाडों का काम करती है/जहाँ बूढे खाना खा चुकने के बाद अंधे हो जाते हैं/जवान लडकियाँ अंधेरा पकड लेती है।’’८
देश की स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक स्तर पर भी बहुत उथल-पुथल हुई है, जिससे आम आदमी बहुत प्रभावित हुआ। जिस जनतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर कल्याणकारी, शोषण मुक्त, धर्म निरपेक्ष शासन की कल्पना की गई थी, वे सपने पूरे न हो सके। शासन व्यवस्था एवं तंत्र की लाल फीताशाही ने आम आदमी के दुःखों को बढा दिया है। पुलिस बडे अपराधियों को संरक्षण देती है, उन्हें पालती है पर गरीब के छोटे से अपराध पर पूरी मुस्तैदी दिखाती है। आम आदमी पर पुलिस का कहर मानवीय संवेदना का चित्र प्रस्तुत करता है। लीलाधर जगूडी की कविता ‘बलदेव खटिक’ का रंगतू पेट भरने के लिए थोडा सा अनाज चुरा लेता है, और फिर- ‘‘अपनी लात से ताकत पैदा करके/उन्होंने उसे लूट से उठाया/और तुरन्त उसके हाथ बांध दिए/..... फिर थोडा बचे हुए अनाज के साथ/उसे शहर ले गये/जहाँ आदमी के लिए/जेल और पोस्टमार्टम की पूरी
व्यवस्था है।’’९
न्याय शब्द भी अपने अर्थ की गरिमा खो चुका है। कानून आम आदमी के हितों की रक्षा कर ही नहीं पा रहा। सर्वत्र भ्रष्टाचार, रिश्वत, विकृत न्याय व्यवस्था का बोलबाला है। आम आदमी की न्याय की पुकार संवेदना जगाती है-
‘‘दीवान कहता है कि किस कलम से करूं ? चांदी की कलम से करूं/सोने की कलम से करूं/.... मार खाया आदमी रिरियाता है/कि कानून की कलम से करो/कानून की कलम लकडी की होती है।’’१०
पूरा तंत्र ही आम आदमी के लिए बना नहीं हुआ। व्यवहार में प्रजातंत्र की आत्मा का ही हनन हो रहा है। यही कारण है कि आम आदमी का आजादी से मोह भंग हो रहा है। लोकतंत्र की हो रही हत्या की संवेदना समकालीन कविता में प्रकट होती है-
‘‘न कोई प्रजा है/न कोई तंत्र है/यह आदमी के खिलाफ/आदमी का खुला सा षडयंत्र है।’’११
निर्धनता, महंगाई, बेरोजगारी, रूग्णता, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, विकृत न्याय व्यवस्था एवं लोकतंत्र की अव्यवस्था ने आम आदमी के हृदय के शीतल वारि को सूखा दिया है। मनुष्य के कोमल भाव मिटते जा रहे हैं। पैसे के लिए दौड ने प्रेम जैसी नैसर्गिक आवश्यकता को दर किनार कर दिया है-
‘‘सहसा चौरस्ते पर जली लाल बत्ती जब/एक दर्द हौले से हिरदै को हेल गया/ऐसी क्या हडबडी कि जल्दी से पत्नी को चूमना/देखो फिर भूल गया।’’१२
संवेदना यह है कि भावनाओं की कोई कीमत नहीं रही। भावनाएं पथरा सी गई है। अब आम आदमी के जीवन के जीवन में कोई उमंग बचती नहीं दिख रही। भावों की ऊष्मा ठंडी पडती जा रही है। अब भावनाओं और वस्तुओं में कोई फर्क नहीं रहा-
‘‘पर सच तो यह है कि यहाँ/या कहीं भी फर्क नहीं पडता/तुमने जहाँ लिखा है ‘प्यार’ वहाँ लिख दो ‘सडक’/फर्क नहीं पडता।’’१३
स्पष्ट है कि परिस्थितियों व व्यवस्था के दुश्चक्र में फंसा आदमी कोल्हू के बैल की तरह श्रम का स्वेद बहा रहा है। उसकी जिजीविषा ही उसे जिन्दा रखे है। वह जी नहीं रहा, वह केवल दिन काटता है। उसकी नियति, भाग्य में यही बदा है कि बिना कुछ कहे, बिना कुछ मांगे, बस यूँ ही खटता रहे-
‘‘मैं कोल्हू का बैल सदा/दशा दिशा क्या जानूँ अपनी/होश संभाला था तब से ही/बन्द हो गये मेरी खातिर/जीने के सब तर्क।’’१४
उपर्युक्त विवेचन से कहा जा सकता है कि समकालीन हिन्दी कविता साधारण या आम आदमी के सरोकारों से जुडी है। आम आदमी के संघर्ष, पीडा, नियति, शोषण, द्वन्द्व आदि भावों को व्यक्त करने में यह कविता एक माध्यम बनी है। आम आदमी की पीडा को बयां कर सबमें मानवीय संवेदनाएँ जगाने का स्तुत्य कार्य करने में समकालीन कविता सफल रही है। ?
संदर्भ-
१. (सं) ऋषि कुमार चतुर्वेदी- हिन्दी कहानी, १९७७ ई,
गं*थायन प्रकाशन, अलीगढ।
२. बली सिंह-दो पीढिया, वर्तमान साहित्य (अंक ७५),
बाघम्बरी हाउसिंग स्कीम, इलाहाबाद, पृष्ठ-५०
३. विनोद दास-पोस्टर, पहल पत्रिका, अंक ३७, जबलपुर,
पृष्ठ-२५९
४. धूमिल-गृह युद्ध, सुदामा पांडे का प्रजातंत्र, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, १९८४ ई. पृष्ठ-३८
५. लीलाधर जगूडी-प्रार्थना, घबराये हुए शब्द, राजकमल
प्रकाशन, नई दिल्ली, १९८१ ई. पृष्ठ-५१
६. राजेश जोशी-असली किस्सा तबीयत हिरन हो जाने
का, इसलिए भोपाल, पृष्ठ-२०
७. विनोद दास-वजीफा, खिलाफ हवा से गुजरते हुए, भारतीय
ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, १९८६ ई., पृष्ठ-३८
८. धूमिल-मकान, संसद से सडक तक, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, १९७२ ई. पृष्ठ ५५-५६
९. लीलाधर जगूडी-बलदेव खटिक, बची हुई पृथ्वी,
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, १९८१ ई. पृष्ठ-१०३
१०. उपरिवत, पृष्ठ-१०८-१०९
११. धूमिल-सुदामा पांडे का प्रजातंत्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, १९८४ ई. पृष्ठ-१८
१२. धूमिल- किस्सा जनतंत्र, कल सुनना मुझे, युगबोध
प्रकाशन, वाराणसी, पृष्ठ-१८
१३. केदारनाथ सिंह-जमीन पक रही है, प्रकाशन संस्थान,
दिल्ली, १९८० ई. पृष्ठ-४६
१४. रमेशचन्द्र साह- स्थित प्रज्ञ, हरिश्चन्द्र आओ, प्रकाशन
संस्थान, दिल्ली, १९८० ई. पृष्ठ-१७
डॉ. भीमराव अम्बेडकर राजकीय महाविद्यालय, श्रीगंगानगर (राज.)