दस कविताएं

सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’



मीठा बोलें
बच्चों बात कहो ना झूठी
जब भी बोलो सच्चा बोलो
नहीं बुरे को बुरा कहो तुम
अच्छे को बस अच्छा बोलो।
औरों के दोषों पर तुमको
ध्यान नहीं कोई देना है,
अगर मिले गुण कोई उनसे
संभव हो अपना लेना है।
अपने से जो बडे लोग हैं
आदर देकर उनसे बोलो,
और रहे जो तुमसे छोटे
खोल हृदय को उनका हो लो।
अपशब्दों को कभी भूलकर
नहीं जीभ पर अपनी लाना,
कोई चुभती बात कहे तो
तुमको है गुस्सा पी जाना।
तुम जैसा व्यवहार करोगे
वैसा ही जग से पाओगे,
सबसे मीठा बोलोगे तो
अच्छे बच्चे कहलाओगे। ?
बादल
काले काले बादल आए
बिजली को चमका लहराए,
कभी इकट्ठे हो जाते हैं
कभी कभी होते छितराए।
संग हवा के उडते जाते
पानी की बूँदें बरसाते,
आतप से जलती धरती को
शीतलता देकर सरसाते।
भरते जल से ताल तलैया
देख घास को उछले गैया,
रेतीली नदियों में अब तो
लगी डोलने डगमग नैया।
सभी ओर हरियाली छाई
जीवन ने ली फिर अँगडाई,
जाग उठे सोये-से तरुवर
बही सुखद चंचल पुरवाई
नभ में उडते बादल काले
सचमुच धरती के रखवाले
आ आकर ये भर जाते हैं
खुशियों से प्राणों के प्याले। ?
नन्ही चिडिया
नन्ही चिडिया बोल रही है
कानों में रस घोल रही है
फुदक रही है इधर उधर यह
पूँछ उठाकर डोल रही है।
दाना ढूँढ रही है आँखें
उड जाने को तत्पर पाँखें,
छुप जाती यह पलक झपकते
बदल बदल पेडों की शाखें।
नन्ही चिडिया भोली भाली
सब पीडा सह जाने वाली,
इसको दे दो थोडा दाना
रख दो इक पानी की प्याली।
जब-जब यह घर-आँगन आती
जीवन का संगीत सुनाती,
भुला सभी देती यह दुःख को
मन को खुशियों से भर जाती।
कल यह दूर कहीं जाएगी
वापस लौट नहीं पाएगी,
सन्नाटे जब होंगे गहरे
याद बहुत इसकी आएगी। ?
गर्मी
लगा बीतने ज्यों ही जाडा
गर्मी का बज उठा नगाडा,
तेज हुए सूरज के तेवर
किरणें आग उगलती भू पर
हवा बहुत ही गर्म हुई है
मौसम बनकर शेर दहाडा।
माँग रहे सब ठण्डा पानी
छाया लगती बडी सुहानी,
दुबक रहे हैं सभी घरों में
मानो हाथी आ चिंघाडा।
रहते हैं झल्लाए पापा
खो देती मम्मी भी आपा
दादाजी के मित्रों का भी
जमता घर पर नहीं अखाडा।
तापमान बढता ही जाता
काम नहीं कुछ मन को भाता,
अबके तो गर्मी ने सारे
अनुमानों को दिया पछाडा।
काट दिए हैं हरे भरे वन
किया धुएँ का अति उत्सर्जन,
बढती गर्मी का कारण है
हमने पर्यावरण बिगाडा। ?
बसन्त
बीत गया सर्दी का मौसम
दिन बसन्त के आए
फूलों पर आकर भँवरे ने
गीत प्रेम के गाए।
डाल डाल पर पत्ते फूटे
कली कली मुस्काई,
आमों के बौरों के छूकर
चली मधुर पुरवाई।
खेतों में फूली सरसों तो
वन में टेसू खिलते,
फूल कमल के तालाबों में
लहरों से हिल डुलते।
पंचम स्वर में कोयल कूकी
चिडिया जी भर चहकी
गेंदे और गुलाब संग ही
चम्पा जूही महकी।
उल्लासों की गंध अनोखी
बिखरी है धरती पर,
हम भी इसका अनुभव करके
भर लें अपने अन्दर। ?
फूल
रंग बिरंगे खिले बाग में
तरह तरह के फूल,
तितली भँवरे आकर इन पर
रहे खुशी से झूल।
मधुमक्खी उड आकर जाती
इनके रस का पान
नन्ही नन्ही चिडियों से भी
रखते ये पहचान।
गंध लुटा ये भीनी भीनी
महकाते परिवेश,
हरदम हँसते मुस्काते हैं
नहीं मनाते क्लेश।
अपनी सुन्दरता से सबको
बुला रहे हैं पास,
भर देते ये मन के अंदर
एक नया विश्वास।
देखो कितनी भली लग रही
इन पर पडती धूप
फूलों से ही निखर रहा है
इस धरती का रूप। ?
पेड
रहे झुमते पेड खुशी से
सारी सारी रात
उन्हें देर तक रही नहाती
रुक-रुक कर बरसात।
तेज हवा के झौंकों में वे
लहरा अपने पात,
लगता जैसे आसमान से
करते कोई बात।
झक झोरे खाती शाखों से
धिरक रहा है गात,
पेड झुके तो टला शीश से
भीषण झंझावात।
धूप खिली तो हँसे पेड भी
ज्यों निश्छल नवजात
पेड हमें देते हैं सुख की
जीवन में सौगात। ?
बादल
बैठ हवा के पंखों ऊपर
यहाँ वहाँ उडते हैं बादल
बजा रहे खुशियों में भरकर
ढोल नगाडे तुरही माँदल।
चित्र कई ये खींच रहे हैं
बार बार चमका कर बिजली
पर्वत की चोटी से बातें
करते रहते अगली-पिछली।
पता नहीं किसकी जल्दी है
बिना रुके ये भागे जाते
अपना बोझ जरा कम करने
रुक रुक कर पानी बरसाते।
काले भूरे रूप बदलते
जैसे हो रूई के गोले
छिटक छिटक जाते हैं नभ में
बनकर शिशु भेडों के भोले।
आँचल से लहराकर नभ में
बादल देते हमको छाया
इनसे गिरती बूँद बूँद में
छुपी हुई ममता की माया।
बादल से ही वर्षा होती
वर्षा से मिलता है पानी
पानी से हम सबका जीवन
इससे अपनी धरा सुहानी। ?
जंगल के प्राणी
तरह तरह के कई जानवर
रहते हैं जंगल के अंदर
भालू चीता हरिण लोमडी
हाथी खरहा बिल्ली बंदर।
चींटी चूहे गिलहरियाँ भी
जंगल के अंदर हैं होते
और वहीं पेडों पर रहते
काग कबूतर चिडिया तोते।
अन्य कई प्राणी भी रहते
नहीं नाम जिनका हम जानें
छोटे हों या बडे सभी ये
जंगल को अपना घर मानें।
जंगल ही जीवन है इनका
जंगल से ना इन्हें भगाएँ,
नहीं भूल से जंगल काटें
और न इसमें आग लगाएँ। ?
नन्हे बच्चे
नन्हे नन्हे बच्चे तीन
खेल कूदने में तल्लीन
एक गेंद से खेल रहे हैं
बजा बजा खुशियों की बीन।
कभी गेंद को देते लात
कभी चूक कर खाते मात
कभी कभी छीना झपटी कर
आपस में कुछ करते बात।
बोल रहे तुतलाते बोल
हँसी बिखेरे दिल को खोल
टूटे-फूटे खेल खिलौने
जग में इनका धन अनमोल।
छोटा-सा इनका संसार
आपस में है निर्मल प्यार,
हँसने रोने में कम पडता
पूरे दिन का भी विस्तार
मन में इनके सदा उमंग
आशाएँ जीवन का अंग,
भूल सभी चिंता जाता मैं
पाकर इन बच्चों का संग। ?
३-फ, २२, विज्ञान नगर, कोटा-३२४००५ (राज.)
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