तीन कविताएं

अब्दुल रशीद पठान


नटखट बंदर
उछल कूदता धूम मचाता
घुस गया रसोई के अंदर।
बडी पूंछ काले मुँह वाला।
छोटा सा एक नटखट बन्दर।।
रोटी खाई केला खाया।
दूध पी गया एक कटोरा।
सारा फ्रिज खाली कर डाला।
निकला वो तो बडा चटोरा।।
खों खों करके दाँत दिखाए।
मम्मी पापा सब डर जाए।
डंडा ले पीछे जब हम दौडे।
जा चढा पेड के ऊपर।
कपडे ले छत पर जा बैठा।
पास न उसके कोई जाए।
डाल डाल पर कूदा फिरता।
हम सबको वो खूब छकाए।।
मटकी फोडी गिलास तोडे।
रसोई में कुछ ना बाकी छोडे।
खाकर पीकर मस्त हो गया।
सो गया पलंग पर जाकर।
छोटा सा एक नटखट बंदर।। ?
मेरी मां
सबसे प्यारी, जग से न्यारी।
फूलों की महकी फुलवारी।
सभी दुखों को हँसकर झेले।
है सबसे अच्छी मेरी मां।।
मैं रोउं तो मुझे हँसाती।
अच्छी अच्छी सीख सिखाती।
तरह तरह के खेल खिलाती।
बन कर छोटी बच्ची मेरी मां।
सुबह सुबह मुझे नहलाती।
नए नए कपडे पहनाती।
डांट लगाती फिर सहलाती।
है कोमल कच्ची मेरी मां।।
बस्ता ले खुद बैठ सामने।
होम वर्क पूरा करवाती।
खुद जागे पर मुझे सुलाती।
है सीधी सच्ची मेरी मां।।
हाथ जोड मैं करूं प्रार्थना।
दो भगवान ऐसा वरदान।
सब बच्चों की मां हो ऐसी।
जैसी अच्छी मेरी मां।। ?
सबके मन को भाता मोर
सबसे प्यारा सबसे सुन्दर।
सारे पंछियों का सिरमौर।
रंगबिरंगे पंखों वाला।
सबके मन को भाता मोर।।
बादल गरजे मेहा बरसे।
मेहा आओे का करता शोर।
बूढे, बच्चे खुश हो जाते।
जहां कहीं दिख जाता मोर।।
मुरलीधर का मुकुट सजाता।
गरदन को मटकाकर चलता।
संग मोरनी के इठलाकर।
नाचे लहरा पंखों को मोर।।
घर आंगन में आ जाता है।
सुबह सुबह होते ही भोर।
दाना खाकर उड जाता है।
धारे शीश कलंगी मोर।।
अपनी अनुपम सुन्दरता से।
बना राष्ट्रीय पक्षी मोर।
जो भी इस पक्षी को मारे।
मिले उसको तो दंड कठोर।। ?
‘आशियाना’ गांधीपुरा, लाखेरी, जिला-बून्दी (राज.)
मो. ९४१४३३७५१३