कथा काव्य :प्यासा कौआ

माधुरी शास्त्री


सुनो सुनाऊँ एक कहानी
है सबकी जानी पहिचानी
माना है ये बहुत पुरानी
शिक्षा की इसमें गुडधानी।।
किसी घने जंगल में भैया
इक भोला कौआ रहता था
सारे दिन वह श्रम करता था
श्रम से कभी नहीं डरता था।।
इकदिन वह जंगल से ऊबा
सोचा बाहर दुनियाँ देखूँ
यही विचार ठानकर मन में
जा पहुँचा अनजान शहर में।
बल्ब जल रहे थे सब जगमग
रात लग रही थी दिन जैसी
किसी रेस्ट्राँ में फिर उसने
ढेरों जूठन फैली देखी।
छककर उसने डिनर उडाया
फिर जा बैठा खंभे ऊपर
ज्योंही प्यास लगी उसको तो-
लगा भटकने विह्वल होकर।
पानी की इक बूँद कहीं ना
लगा कोसने वह किस्मत को
है कैसा ये शहर अभागा
जल का कोई स्नोत नहीं है।
अचरज में भर रहा घूमता
वह प्यास पूरी नगरी में
बडी मंजिलों में बेचारा
पानी पीता किस गगरी में।
उडता-उडता गया सडक पर
जहाँ सो रहे थे मजदूर
पास रखा था घडा पुराना
पर, पानी था थोडी दूर।
कौआ भली भाँति परिचित था
पर्वत पीते कभी न पानी
अपने शिखरों से लौटाकर
हर्षित करते जग को दानी।
फिर उसने तरकीब निकाली
खोजी चतुराई की ताली
बहुत समय पहले नानी से
सुन रखी थी कथा पुरानी।
छोटे-छोटे कंकड चुनकर
लगा डालने घट के अंदर
क्रमशः पानी ऊपर आया
धीरे-धीरे पिया सम्हलकर।
अल सुबह फिर पर फैलाए
लगा नापने वह आकाश
शाम ढले, उससे पहले ही
जा पहुँचा अपनों के पास। ?
वापस आया उसे देखकर
सब कौओं ने की अगुवाई
अपने संगी साथी लखकर
खट्ठी मीठी कथा सुनाई।
इस घटना से देखो बच्चो!
यह शिक्षा सबको मिलती है
अपनी जन्मभूमि और मेहनत
सारी विपदा को हरती है।
घर जैसा है स्वर्ग कहीं ना
घर वालों सा प्यार कहीं ना
जो अपने हैं- वे अपने हैं
बाकी सब झूठे सपने हैं।। ?
सी/८ पृथ्वीराज रोड, सी. स्कीम, जयपुर-१