दो लघुकथाएँ

सुरेश कुशवाह ‘तन्मय’



गाँव और शहर
सरकते सरकते शहर एक दिन गाँव के पास जा पहुंचा। यह देखकर प्रसन्न मन गाँव ने उसका स्वागत करते हुए उसके कुशल क्षेम पूछे। बडे बोझिल स्वर में शहर ने बताया कि, क्या बताऊँ गाँव भाई जहां मैं रहता हूँ वहाँ दिनों दिन बढती अनियंत्रित भीड, अनगिनत वाहनों के शोर, विषैले धुएँ तथा गंदगी के मारे मेरा दम घुटने लगा है। ऐसे में यदि तुम मेरी मदद कर सको तो मैं खुली हवा में कुछ राहत की सांसें ले सकूँ।
इतना बडा साधन सम्पन्न शहर मुझसे मदद मांग रहा है, यह सोच गर्वित मन से गाँव ने शहर को अपने आस पास फैले खेत, जंगल एवं हरे भरे वनों की सैर कराई, और कहा कि, शहर भाई जब भी आप को अपनी जगह पर बेचैनी महसूस हो तब यहाँ आकर हवा में सांसें ले स्वास्थ लाभ ले सकते हो।
किन्तु कुटिल शहर के मन में तो कछ और ही चल रहा था। उदारमना गाँव के इस निश्छल आत्मीय आमंत्रण को आधार बना कर शहर ने यहाँ अपने पैर पसारना शुरू कर दिए। अब उन खेतों में अनाज के दानों की जगह सीमेंट, कांक्रिट और लोहा बोया जाने लगा। आस पास के हरे भरे वृक्ष कटने लगे। पशुओं के चरागाह अब शॉपिंग मॉल, बिग बाजार, बहु मंजिली इमारतों, भव्य होटलों तथा कृत्रिम बाग बगीचों में तब्दील हो गए।
बेचारा गाँव अब चारों ओर से शहर की चपेट में आ गया था। धीरे धीरे निरंकुशी शहर ने गांव पर भी अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया। असमंजस में असहाय गाँव ना तो अपने गाँवपने को बचा पा रहा था और ना ही पूरी तरह शहरी चाल चलन को अपना पा रहा था।
आज शहर अपनी सफलता पर गर्वान्वित हो खुशियाँ मना रहा है और उसका मददगार गाँव दुःख के सागर में डूबा मरणासन्न हालत में आखरी सांसें गिन रहा है। ?
अनूठी बोहनी
साँझ होने को आई किन्तु आज एक पैसे की बोहनी तक नहीं हुई। बांस और खपच्चियों से बने फरमे के टंगन में गुब्बारे, बांसुरियाँ और फिरकी आदि खिलौने करीने से टाँग कर रामदीन रोज सवेरे घर से निकल पडता है। गली, बाजार, चौराहों व घरों के सामने कभी बांसुरी बजाते, कभी फिरकी घुमाते और कभी फुग्गों को हथेली से रगड कर आवाज निकालते बच्चों / ग्राहकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। बच्चों के साथ छुट्टे पैसों की समस्या के हल के लिए वह अपनी बाईं जेब में कुछ चिल्लर घर से निकलते समय ही रख लेता है।
खिन्न मन से रामदीन अंधेरा होने से पहले घर लौटते हुए रास्ते में एक पुलिया पर कुछ देर थकान मिटाने के लिए बैठकर बीडी पीने लगा। उसी समय सिर पर एक तसले में कुछ जलाऊ उपले और लकडी के टुकडे रखे मजदूर सी दिखने वाली एक महिला एक हाथ से उंगली पकडे एक बच्चे को लेकर उसी पुलिया पर आकर सुस्ताने लगी।
गुब्बारों पर न*ार पडते ही बच्चा अपनी माँ से उन्हें दिलाने की जिद करने लगा। दो चार बार समझाने के बाद भी बालक मचलने लगा तो उसके गाल पर एक चपत लगाते हुए डांटने लगी कि दिन भर मजदूरी करने के बाद जरा सी गलती पर ठेकेदार ने आज पूरे दिन के पैसे हजम कर लिए और तुझे फुग्गों की पडी है। बच्चा रोने लगता है।
पुलिया के एक कोने पर बैठे रामदीन का इन माँ बेटे पर ध्यान जाना स्वाभाविक ही था। वह उठा और उस रोते बच्चे के पास गया। एक गुब्बारा, एक बांसुरी और एक फिरकी उसके हाथों में दे कर सिर पर हाथ रख उसे चुप कराया। फिर अपनी बाईं जेब में हाथ डाल कर चिल्लर निकाली और उसमें से इन तीनों की कीमत के पैसे निकाल कर अपनी दाहिनी जेब में रख लिए।
अचानक हुई इस अनूठी और सुखद बोहनी से प्रसन्न मन मुस्कुराते हुए रामदीन घर की ओर चल दिया। ?
२२६, माँ नर्मदे नगर, बिलहरी-४८२०२० जबलपुर (म.प्र.)
मो. ९८९३२६६०१४