एक लघुकथा

मुकेश पोपली


बिलों के सांप
उनके कहने पर उसने सब कुछ किया, जब कहा गया बोलो तब उसने उन्हीं की शान में कसीदे पढे, जब कहा गया चलो तब वह धीमे-धीमे उनके ही पांव के निशान पर चला, जब कहा खा लो तब उसने उनकी थाली में रखी गई जैसी सामग्री ही अपनी थाली में परोसने को कहा और थाली खाली करने के लिए उसी अंदाज में चाटा, उनकी ही तरह वह बिना साबुन के नहाता रहा, पूजा की थाली गिराई उनकी ही तरह लात मारकर और गिरी माचिस की तीली से उनकी ही तरह सुलगाई अपने होंठों के बीच दबी जोंक, पैग टेबल पर बनाए पैग पर पैग और डालता रहा गिलास में बार-बार पारदर्शी ‘आईस-क्यूब’, कागजों पर शराब बिखेर उसने कविता बनाई, गिलास में घुलती बर्फ ने कहानी का रूप धरा और नशे में डूबती, तिल-तिल मरती, बिना किसी सहारे न चल सकने की मजबूरी उसकी जिंदगी एक उपन्यास बन गई।
घोषणा होने के बाद उनके प्रशंसक उन्हें घेर लेते हैं और मिडिया वाले पूछते हैं- पुरस्कार के बारे में, यह आपका भाग्य है या आपका एकल रचना पुरुषार्थ, कहना तो वह चाहता है कि सब-कुछ उनकी मेहरबानी है जिनके सान्निध्य में मैंने अपनी आधी उम्र गला दी और आगे भी यही क्रम जारी रहेगा, अभी तो कई पडाव बाकी हैं, लेकिन चूंकि उनको वह बहुत आदर देता है और इतने अपनत्व पर वह नाराज हो सकते हैं, अतः उनके प्रभाव को कायम रखते हुए उन्हीं की शैली में कहता हैं, ‘मित्रों, लेखन तो कोई भी कर सकता है, मेरे भी रोम-रोम में यह प्रक्रिया दिन-रात चलती है, कौन सी बात किस कागज पर किस रूप में चिपक जाए, मैं कह नहीं सकता’ जवाब सुनकर पत्रकार और उनके पाठक संतुष्ट हो जाते है, आलोचक और पुरस्कार की कतार में लगे बाकी लेखक अपना सिर पीट लेते हैं, वह मुस्कराता, हो-हो करता, धुंआ उडाता नमस्कार करता उसी मंडली में जा बैठता है जिसे आधुनिक भाषा में ‘‘माफिया’’ कहा जाता है, वहां छलकते हैं जाम पर जाम ‘चियर्स’ करते हुए कि आज उनके हाथ एक और पुरस्कार लगा है, अब अगले वर्ष के लिए तैयारी की जाए, कुछ देर बाद बेहोशी के आलम में वह अपने-अपने घर जाकर बिस्तर में दुबक जाते हैं जैसे लघुकथाएं शिकार करने बाद अपने-अपने बिलों में सांप। ?
राजभाषा अधिकारी, भारतीय स्टेट बैंक, जयपुर प्रशासनिक कार्यालय
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