तीन लघुकथाएं

डॉ. पूरन सिंह




एम आई फ्राम मशीहगढ
मेरे पैदा होने से पहले ही मेरे पिता ने, और मेरे पिता ने ही क्यों पूरी बाल्मीकि बस्ती ने धर्म परिवर्तन कर लिया था और मेरी बस्ती का नाम मशीहगढ हो गया था। आज भी यही नाम है। बस्ती में एक खूब सुन्दर सा चर्च बनवाया गया था। वहां शायद तब भी शहर से बडी-बडी नन्स और फादर्स हमारी बस्ती में आते होंगे। आज भी आते हैं। बस्ती की स्थिति में काफी कुछ परिवर्तन हुआ है।
मैंने भी खूब मेहनत की। लगन और ईमानदारी से पढी और आज मैं एलआईसी में डबल ए. ओ. के पद पर
कार्यरत हूं।
उस दिन मेरा मन किया कि अपने चर्च में तो नियम से जाते ही हैं, चलो आज शहर के बडे चर्च में जाकर प्रभु यीशु का वंदन करते हैं। उसका धन्यवाद करते हैं। सो मैं चली गई थी। बडे चर्च में पूजा चल रही थी। साहब और मेम साहब खूब गोरी-चिट्टी, सजी-धजी अपने-अपने बच्चों और प्रियजनों के साथ प्रभु यीशु की वंदना में मग* थे। मैं भी अंतिम पंक्ति में बैठ, वंदना में लीन हो गई थी।
काफी देर बाद वंदना समाप्त हुई तो सभी आपस में बातें कर रहे थे। एक दूसरे को ‘विश’ कर रहे थे। आपस में खुश थे। मुझे कोई नहीं जान रहा था न मुझसे कोई बात कर रहा था। मैं भीड में भी बिलकुल अकेली थी और दुखी भी थी। सोच रही थी कोई मुझसे भी बात करे।
तभी, किसी के पवित्र हाथों का स्पर्श मेरे कंधों पर हुआ। फादर ऑफ द चर्च। हां, फादर ही थे। उन्होंने मुझसे बहुत प्यार से हाथ मिलाया। मुझे खुशी हुई थी।
‘कौन हैं आप।’ देववाणी सी हुई थी।
‘फादर, मैं क्रिस्टीना लाल हूं।’ मेरे पिता का नाम मंगूलाल था। उन्होंने ही बडे प्यार से जीसस क्राइस्ट के नाम पर मेरा नाम क्रिस्टीना रखा था।
‘या...या...। आई अंडस्टुड। यू आर फ्रॉम मशीहगढ।’ फिर फादर ने एक हेयदृष्टि मुझ पर डाली और बोले थे, ‘यू नो... आई थिंक.....देयर इज आल्सो अ चर्च। यू मस्ट गो देयर। दैट इज मेड ऑनली फॉर यू एण्ड पीपल लाइक यू। दिस चर्च फॉर...।’ फिर फादर उन गोरे सुन्दर से सजे धजे लोगों की ओर देखने लगे थे। ‘गॉड ब्लेस यू माई चाइल्ड।’ सिर पर हाथ फेरते हुए जाते-जाते उन्होंने कहा था, ‘यू अण्डरस्टैण्ड व्हाट डिड आई से।’
मैं वहां फिर एक पल भी न रूक पाई थी और चलते-चलते भी यही कहे जा रही थी, ‘.....आई अण्डरस्टुड फादर... आई अण्डरस्टुड एवरीथिंग।’ और न जाने क्यों मेरी आँखें भर आई थीं जिन्हें मैंने अपनी हथेलियों से बंद कर लिया था। ?
अंधा रास्ता
वाहन इतनी तेजी से चल रहे थे कि सडक पार करना बहुत ही कठिन काम लग रहा था फिर ऐसे में कोई अंधा व्यक्ति...। मुझसे नहीं रहा गया सो भागकर उनके पास पहुंच गया था मैं और उनका हाथ पकडकर बोला था, ‘चलिए।’
‘अंधा हूं बेटा, कुछ दिखाई नहीं देता। तुम मिल गए सडक पार करवा रहे हो भगवान आपका भला करे..।’ फिर कुछ देर रूककर वह अंधा व्यक्ति बोला था, ‘क्या नाम है आपका।’
‘एम.पी.सिंह जाटव।’ अब हम बीचोंबीच सडक पर थे। उस अंधे व्यक्ति ने मेरा हाथ झटक दिया था और बहुत ही बेरूखी से बोला था, ‘मैं रास्ता पार कर लूंगा।’ और अपने गले में पडे भगवान राम के पैंडल को चूमते हुए ‘...राम राम... शिव शिव... हे राम... हे राम’ जपने लगा था।
मुझसे रहा नहीं गया सो बिलबिलाया था, ‘अंधे हैं आप........सडक पार नहीं कर सकते..रास्ता नहीं दिखाई देता है आपको लेकिन....लेकिन जाति....जाति दिखाई
देती है।’
उस अंधे व्यक्ति ने मेरी एक न सुनी थी। वह अब भी सडक के बीचोंबीच खडा ‘हे राम....हे राम’ जप
रहा था। ?
भाड
गांव गया था नाना के घर। नाना नहीं है अब। मामा भी नहीं हैं। मामा का बेटा है। मुझे देखकर बहुत खुश हो गया। घर के बाहर ही मिल गया था, ‘अरे जावित्री, देखो तो कौन आया है बुआ का बेटा, अरे वही, दिल्लीवाला......मेरा भाई।’ शायद वो अपनी पत्नी को बुला कम रहा था पास-पडौस के लोगों को सुना ज्यादा रहा था।
‘मैंने गाडी वहां खडी कर दी है कोई बात तो नहीं’ दिल्ली का आदमी अपने से ज्यादा अपनी गाडी की परवाह में रहता है।
‘कोई बात नहीं....कहीं खडी कर दो।’ कहते हुए उसने मेरा सामान अपने हाथ में लिया और भाभी को देते हुए बोला था, ‘जावित्री खूब बढिया सा खाना बनाओ.......रामकुमार बीस-बाइस साल बाद आया है। बडा आदमी क्या हुआ अपने इस भाई को ही भुला दिया.......बचपन में हम दोनों साथ-साथ खेला करते थे.....
है ना..........।’
‘हाँ’ कहकर हम दोनों वहीं बरामदे में ही बैठ गये थे। नाना-नानी से लेकर अम्मा-पिताजी और बच्चों की फिर नौकरी-चाकरी से लेकर खेती-बाडी तक की बातें होती रही थी हम दोनों में।
कुछ देर बातें करने के बाद मेरा ममेरा भाई बोला था, ‘अब तुम आराम करो......मुझे कुछ काम है.....अरे काम क्या खाद लानी है......अभी दो घण्टे में आता हूं।’ फिर अपनी पत्नी को बुलाते हुए कहा था, ‘जावित्री, रामकुमार को खाना खिला देना। न जाने कितनी देर का भूखा होगा। मैं लेट नहीं होऊंगा जल्दी आ जाऊंगा।’
‘ठीक है।’ कहते हुए भाभी बाहर आ गई थीं।
मेरा ममेरा भाई चला गया था।
मैं नहाया धोया। खाना खाया। नींद आ गई तो सो गया था। वह अभी तक नहीं आया था। मैंने भाभी से कहा, ‘भाभी.....भइया तो आए नहीं......मैं तब तक नहर की तरफ घूम आऊं। मन कर रहा है। बचपन में खूब घूमा करते थे हम और भाई।’
भाभी ने हाँ में सिर हिला दिया था।
मैं गांव घूमने निकल गया था। गांव अब कहने को ही गांव था। सुविधाएं लगभग सभी थीं जो शहरों में होती हैं लेकिन थीं आधी-अधूरी। नहर, बाग, बरगद और मंदिर सब देखा पहले जैसा कम ही था फिर याद आया....अरे हाँ...शैदा नाना का भाड.....ओ हाँ कैसे अच्छे थे शैदा नाना......मेरी बनियान में भी चना-चबैना रख देते थे। चलो वहाँ
चलते हैं।
भाड आज भी वहीं था। बहुत सारे लोग, मक्का, चना, बाजरा आदि भुंजवाने के लिए बैठे थे। एक आदमी भाड झौंक रहा था। दूसरा भून रहा है। मैं उनमें से किसी को नहीं जानता था। मैं थोडी देर तक तो उन्हें देखता रहा फिर मुझे न जाने क्या हुआ। मैंने अपने दोनों हाथ उनके सामने कर दिये थे जो मक्का के दाने भून रहा था। मैं बचपन में भी शैदा नाना के आगे ऐसे ही कर देता था। उसने मेरी तरफ देखा, ‘क्या’।
मैंने भुने हुए मक्का के दानों की ओर इशारा किया बिल्कुल वैसे ही जैसे शैदा नाना से किया करता था। उसने उन भुने हुए मक्का के दानों (चबैना) में से आधी मुठ्ठी दानें मेरी हथेली पर बडी मुश्किल से रखे और ऐसे देखा मानो कह रहा हो, यहाँ भाड के सामने बैठो तो जानूं......आए बडे.......भिखमंगा कहीं के।
मैं उन आधी मुठ्ठी भुने हुए मक्के के दानों को लिए खडा रहा। सभी लोग मुझे देख रहे थे। फिर चलने लगा तो मन ने कहा, ‘फेंक दे इन दानों को.....जो इतने अपमान से दिए गए हैं।’ मैंने जैसे ही फेंकने को हाथ ऊपर उठाया कि न जाने कहां से आवाज आई थी, ‘अरे ये तो रामश्री का बेटा है......ले ले..........जब इन्हें चबा ले तब और ले जाना.......बहिन-भांजी को देने से तो बरक्कत होती है.......ले जा....अरे ये तो चिरैया चिनगुनी है...इनके चुगने से तो हमें भी अल्लाह खूब देता है।’
मैंने मक्का के भुने हुए दानें नहीं फेंके थे। अपनी पीटर इंग्लैण्ड की शर्ट में रख लिए थे कि पीछे से वही मक्का के दाने भुनने वाला लडका चिल्लाया था, ‘ओ साब क्या हुआ.......कम लगे हों तो मोल ले लो।’
‘मोल के दानों में वो स्वाद कहां।’ फिर मैंने उससे पूछा था, ‘तुम शैदा नाना के नाती हो।’
‘हाँ’
‘मुझे पहचानते हो।’
‘नहीं’
‘मेरे नाना का नाम दुर्गा था। शैदा नाना और दुर्गा नाना आपस में दोस्त थे। मैं तुम्हारे भाड पर......आ.....या......करता.......। इसके आगे मैं बोलने की कोशिश कर रहा था। आंखें भर आई थीं।.....लेकिन आज......आज.....तुम तो सारी परम्पराएं रीति-रिवाज सभी कुछ भूल गए....।’
‘बाबूजी, परम्पराएं.......रीति-रिवाज सभी जानता हूं मैं लेकिन कमबख्त ये पेट नहीं जानता।’
इतना कहकर वो मेरी ओर क्षमा मांगने वाली दृष्टि से देखने लगा तो मैंने उसे अपने अंक में भर लिया था।
भाड अब शायद पहले जैसा गरम नहीं रह गया था। ?
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