दो लघुकथाएँ

डॉ. उषा किरण सोनी


प्रवचन और प्रवंचन
कॉलोनी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के वाचक स्वामी हरिहरानंद जी अनेक प्रेरक प्रसंगों के साथ, अपनी रसमयी मधुर वाणी में दिए प्रवचनों में, श्रोताओं को मोह माया से दूर रहकर कृष्ण भक्ति के लिए प्रेरित करते, जिसे सुनकर श्रोता भाव विभोर हो जाते। बीच-बीच में उनकी साथी गायन मंडली के भजन कानों में अमृत घोल देते। सात दिनों से चल रही कथा के समापन में आज समस्त श्रोताओं ने व्यास गद्दी व श्रीमद्भागवत ग्रंथ पर श्रद्धानुसार अन्न-धन व वस्तुओं की भेंटें चढाई।
कथावाचक व उनकी मण्डली को पास की एक धर्मशाला म ठहराया हुआ था अतः वे भेंट में मिले धन व वस्तुओं के ढेर को लेकर धर्मशाला चले गए ताकि वे वापसी की तैयारी कर लें। उन्हें रात की गाडी से हरिद्वार जाना था। शाम को आयोजकों की ओर से श्रीधर बाबू, कथावाचन के लिए निश्चित की गई राशि और उनकी रेलयात्रा की टिकटें देने धर्मशाला गए। बंद कमरे के बाहर पहुंचकर, भीतर से आते शोर को सुनकर वे ठिठक गए। भीतर भेंट में मिले धन-वस्त्र व वस्तुओं के बँटवारे को लेकर सभी में महाभारत चल रहा था। श्रीधर बाबू के मन में उठ रहीं भक्ति रूपी सुनामी की लहरें नीचे
उतरने लगीं। ?
मूल्य
सुनार ने सोने की अँगूठी पर मीना लगाया तो अँगूठी खिल उठी। उसका सौंदर्य देख सुनार भी खुश हो गया।
‘देखा! मेरे कारण तुम्हारा सौंदर्य और मूल्य दोनों बढ गए’, मीना ने इतराकर सोने से कहा।
सोना मुस्कराया और बोला, ‘अरे भाई! मैं तो पहले भी सोना था और अब भी सोना हूँ; मेरा जितना मूल्य पहले था, अब भी उतना ही है। हाँ! तुम्हारा मूल्य *ारूर मुझ पर लगकर बढ गया। जब तक तुम मुझ पर नहीं लगाए गए थे तब तक तुम मिट्टी के भाव बिक रह थे पर अब जब तुम मुझ पर लगा दिए गए तो तुम्हारा मूल्य भी मेरे बराबर हो गया।’
दरअसल जब मीना लगे आभूषणों को तौला जाता है तो मीना भी सोने के भार म शामिल होता है और उसका मूल्य भी सोने के बराबर ही लगाया जाता है। सोने के मुँह से सच सुनकर मीना की चमक फीकी पड गई। ?
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