दो लघुकथाएँ

दुर्गेश्वरी शर्मा


स्तर
सविता का बेटा शहर के सबसे महंगे कहे जाने वाले अंगे*जी माध्यम वाले स्कूल में पढता था।
उसकी पेरेन्ट्स-टीचर्स मीटिंग म सविता गई।
वहां सजी धजी, कट आस्तिन ब्लाउज पहनी, खुले बाल म अपनी नौकरानी कांता बाई को देखा। सविता को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
‘‘तुम, यहां कैसे?’’
‘‘मेरा बेटा यहां पांचवीं कक्षा में पढता है। हर्ष नाम है उसका।’’ कांता बाई चहकती बोल रही थी, ‘‘हर्ष और आपका बेटा विवेक दोनों अच्छे दोस्त भी हैं।’’
‘‘वह विवेक के साथ पढता है।’’ सविता चौंकी।
‘‘हाँ, मालकिन।’’
मीटिंग के दौरान सविता कांताबाई से कुछ नहीं बोली लेकिन उसके चेहरे पर नागवारी साफ दिख रही थी कि वह खुश नहीं है।
दूसरे दिन कांताबाई हमेशा की तरह साधारण साडी पहने सविता के घर बर्तन मांजने गई।
बर्तन मांजने के बाद सविता ने बेरूखी से कहा, ‘‘कांता, तुम अपना हिसाब कर लो। कल से मत आना।’’
कांता की आँखों में आंसू झिलमिला गए।
सविता उसे रुपए थमाते हुए बोली, ‘‘अपने बेटे से कहना कि वह मेरे विवेक से दूर रहे।’’
कांताबाई मन ही मन अब सब कुछ समझ गई थी। ?
डर
‘‘दीदी, मेरी बेटी डॉक्टर बन गई है। उसे पडौस वाले गांव में पोस्टिंग मिल गई है। मैं कल से बर्तन मांजने
नहीं आऊंगी।’’
बर्तन मांजते हुए सुशीला बाई ने अपनी मालकिन से कहा।
मालकिन उसकी बात सुनकर हतप्रभ रह गई। फिर सम्भलकर बोली, ‘‘तूने तो कभी बताया नहीं था कि तेरी बेटी डॉक्टरी की पढाई कर रही है?’’
‘‘आपको बताती तो आप भी मुझे नौकरी से निकाल देती।’’ सुशीला बाई कहने लगी, ‘‘पहले जिस घर में काम करती थी वहां की मालकिन को पता चला तो उसने मेरा उसी वक्त हिसाब कर दिया था तब मेरी बेटी का एम.बी.बी.एस. म चयन हुआ ही था। उस मालकिन की बेटी चयनित नहीं हो पाई थी। जिसकी गाज मुझ पर गिरी।
सुशीला बाई ने सच कह डाला।
अब उसे अपनी नौकरी छूटने की चिंता जो नहीं थी। ?
२-घ-४५, बापूनगर, पुर मार्ग, भीलवाडा-३११००१ (राज.)