सच को फटकार मिली

अविनाश ब्यौहार



नवगीत
सच को
फटकार मिली
झूठ को शाबासी!
सन्नाटों के
खुले झरोखे!
जीवन में
धोखे ही
धोखे!!
उनकी भी
बुनियाद हिली है,
काम कर रहे
जो चोखे!!
ओस धुली
सुबह भी
लगती है बासी!
नहीं खनक है
अहसासों में!
दिखी दरारें
रेतीले दरिया
की झलकें
दिखती है
परिहासों में!!
किरचों सी
धूप चुभी
छाँव है जरा सी! ?
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