तीन गज़लें

अश्वघोष




नाम लिखकर अब हमारा कुछ फरारों में
हैं वो शामिल चाँदनी के रा*ादारों में
जो ग*ाब का लाल उभरा है अभी सूरज
खलबली-सी मच गई लँगडे विचारों में
एक पत्थर चुप्पियों के बीच क्या फैंका
लाख इल्*ाामात हैं अब इश्तहारों में
डाल दी थीं जो उन्होंने आदमी के बीच
देख, पौधे जम गए हैं उन दरारों में
कल गिरेगी गा*ा जिन पर इस व्यवस्था की
हम खडे हैं हौसले से उन कतारों में ?

एक अनबन-सी चली है इन दरख्तों में
इसलिए ही खलबली है इन दरख्तों में
जब भी देखे ये गले मिलते हुए देखे
दूरियों की कब गली है इन दरख्तों में
साँस भी लेते हैं तो इनकी बदौलत ही
जिन्दगी अपनी पली है इन दरख्तों में
साए में इनके उगे हैं सत्य के अंकुर
साधना की स्थली है इन दरख्तों में
*ान्दगी भर दूसरों के काम ही आए
बात ये कितनी भली है इन दरख्तों में ?

सत्ता ने जो हर दिन छोडे सडकों पर
दौड रहे काग*ा के घोडे सडकों पर
तख्ती, बस्ता, कलम, दवातें भूल गए
महँगाई ने हाथ मरोडे सडकों पर
घर से तो निकले थे प्यार को लेकर हम
फूट गए नफरत के फोडे सडकों पर
आज हवा भी दीखी बदली-बदली-सी
बरसाए पीठों पर कोडे सडकों पर
एक धमाका सुनकर फिर बा*ाारों में
लोग सभी दहशत में दौडे सडकों पर ?
७, अलकनन्दा एनक्लेव, जनरल महादेव सिंह मार्ग
देहरादून-२४८००१ (उत्तराखण्ड) मो. ९८९७७००२६७