दो गज़लें

कुंदन सिंह सजल



अगडे पिछडे बस्ती में हैं,
यारी, झगडे, बस्ती में हैं।
दंड पेलते पहलवान हैं,
लू लू लंगडे बस्ती में हैं।
सूद खोरके, कर्जदार के,
सारे लफडे, बस्ती में हैं।
अपराधी भी, गुनहगार भी,
तगडे तगडे बस्ती में हैं।
मर्यादा के चलन पुराने,
अब तो बिगडे बस्ती में हैं।
गुरु शिष्य के, पिता पुत्र के,
रिश्ते उजडे बस्ती में हैं।
आरोपों प्रति आरोपों के,
झूठे झगडे बस्ती में हैं। ?

समय रहा है फिसल, मियां।
होले होले संभल, मियां।।
पुरखों ने जो राह रची-
उन राहों से निकल मियां।
जग परिवर्तित दीखेगा-
पहले खुद को बदल, मियां।
जिन पर कृपा रही रब की-
सभी जगह है कुशल, मियां।
रब ने सबको मन बांटा-
चंचल, चंचल, चपल, मियां।
कुछ चेहरे बदरंग होते-
कुछ मुख होते कमल, मियां।
विरले सायर वो, जिनकी-
हर पंक्ति है, गजल मियां।
बिना अक्ल के, मुझे बता-
कहां हुई है नकल, मियां।
हल्के कवियों में मिलते हैं-
कोई कोई सजल, मियां। ?
उदयनिवास, रायपुर (पाटन) सीकर-३३२७१८ (राज.)