तीन गज़लें

रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’




भाईचारा, दर्द, मुहब्बत बिकता है ईमान मियाँ
दुनिया के बाजार में तुम भी बन जाओ सामान मियाँ
गैरों को भी अपनाने का हुनर सीखना पडता है
है आसान फरिश्ता बनना बन जाओ इन्सान मियाँ
आवाजों के इस जंगल में भीतर का स्वर सुनना है
आँखें बन्द भले हों लेकिन रखना खोलके कान मियाँ
सुबह-सुबह भोले चेहरे पर हँसी देखली बच्चे की
मिल जायेंगे मन्दिर-मस्जिद गीता और कुरान मियाँ
मयखाने में हम मस्तों को क्यों ललचाते देख के शेख
भीतर आओ या जाओगे जीने का सामान मियाँ
जितना चाहो इसको सँवारो चाहे जितने रंग भरो
झेल न पायेगा आँधी का झोंका एक मकान मियाँ
नाम बडा था मिलने पहुँचे जाकर बस इतना देखा
बडी दुकान सजा रक्खी थी फीके थे पकवान मियाँ
आवारा बादल सा ये भी कहीं चल देगा छोड के साथ
साथ जो चाहो तो फिर रखना ‘यायावर’ का ध्यान मियाँ ?

लग रहा है आदमी अब सिर्फ सोना खाएगा
या कि चाँदी से लिपट सुनसान में सो जाएगा
चाँद पर जाने लगी हैं हसरतें जिस व्यक्ति की
बाप के आँगन में वह दीवान इक चुनवाएगा
बाँधकर परमाणु बम को तितलियों के पंख से
प्यार के आभास को नर भूनकर के खाएगा
बेचकर तस्वीर बावा की पुरानी हाठ में
पुत्र मेरा न्यूड पेंटिंग घर में लेकर खाएगा
पाँव से चट्टान लिपटी है अँधेरे की अगर
अगले पल माँ की दुआओं का दिया जल जायेगा।
है जरा मुश्किल मगर फूटेगी इक मीठी नदी
जब पहाडों से हमारा हौसला टकराएगा
हो गया बूढा तो यह पैनी कुल्हाडी आ गयी
फलसफा दुनिया का यह गिरता शजर बतलाएगा
सिर्फ ‘यायावर’ रहेगा या वहीं बूढा कबीर
पोथियों के साथ पंडित एक दिन मर जायेगा ?

हम हैं है यह भूख हमारी है तो है
फिर भी यह अपनी खुद्दारी है तो है
*ाख्मों पर अहसास नमक का होता है
होगी यारों की ऐयारी है तो है
रोज हमें किश्तों में भरना पडता है
यो जिन्दा रहना लाचारी है तो है
माली है ये सपनों वाले गुलशन का
हाथ में जिसके पैनी आरी है तो है
लेकर बैठा है तूफान सफीने में
देखो नाविक थी तैयारी है तो है
शेख इबादत पण्डित पूजा करते रहें
हम को मुहब्बत की बीमारी है तो है
काँधे पर गन तो हाथों में है थैली
लोक मतों का यह व्यापारी है तो है
आदत आठ पहर बस कागज रंगने की
‘यायावर’ को यह बीमारी है तो है ?
८६, तिलक नगर, बाईपास रोड, फिरोजाबाद-२८३२०३
मो. ०९४१२३१६७७९