वर्षा गीत

डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’


मत आओ मेरे आँगन में
पावस घन तुम व्यर्थ न आओ
इतने आँसू दिए प्रीति ने
सारी उमर भीगती जाए ।
अति वर्षा की गली फसल-सा
जीवन छला गया अपनों से,
जैसे किरन चाँद को लूटे-
सागर लुट जाए लहरों से।
मत आओ मेरे आँगन में
पावस घन बिजली न गिराओ
इतने दर्द सहजे मैंने
सारी उमर कूलती जाए ।।
शायद कोई आँख न ऐसी
जिसे स्वप्न से प्यार नहीं है,
सपनों के धोखे में आना
सचमुच कोई हार नहीं है,
मत आओ मेरे आँगन में
पावस घन तुम व्यर्थ न आओ
इतना साहस दिया हार ने
सारी उमर जीत ली जाए।
भूल नहीं करता है कोई
हो जाती है किन्तु सभी से,
भूल एक सी होती सबकी
काँटे से हो या कि कली से।
मत आओ मेरे आँगन में
पावन घन फिसलन न बढाओ
ऐसा फिसला पाँव भूल का
सारी उमर सीखती जाए।।
सारी उमर भीगती जाए।। ?
देवीपुरम कॉलोनी, शिवपुरी-४७३५५१ (म.प्र.)