स्मरणांजलि ः चार गीत चार ग*ालें

अखिलेश ‘अंजुम’


मैना मारे टिहोका
मौसम के हरकारे
चिट्ठी ले आये...
फसलों के सरसों से-
हाथ करो पीले
भैजो, नैहर से सासरे
करो नहीं हीले-हवाले।
ऋतुओं के राजा ने
संदेश भिजवाये...।
मैना मोर टिहोका
टेसू के फागुनी इशारे
दर्शन की आस लिये गोरी
देहरी पर रो*ा दिया बारे।
आमों की डार-डार
बौर खिलखिलाये।
मौसम के हरकारे
चिट्ठी ले आये...। ?
पाँव स्वयं ही....
मन में इच्छा-वेग चाहिये
पाँव स्वयं ही चल पडते हैं।
घबराते क्यों शैल-श्ाृंग लख
जलती ज्वाला का भय क्या है;
बदल रहा मन क्यों कटु-रस चख
शूलों की शैय्या डर क्या हैं!
अपने पर विश्वास चाहिये
मार्ग स्वयं खिंच आ मिलते हैं।
पथ के माया-मोह बहुत हैं
हार-जीत के खेल बहुत हैं
पद का लोभ, रूप की तृष्णा,
रत्न-पिपासा विघ्न बहुत हैं।
अपनी निर्मल ज्योति चाहिये
अंधकार सब मिट चलते हैं।
वरदानों बल जीना क्या है
भाग्य-रेख बल चलना क्या है!
औरों के उपकार-भरोसे
फलने का दम भरना क्या है!
निज के कर्म-योग के बल पर
बढते वही अमर बनते हैं। ?
मुझे ले चलो वहाँ
मुझे ले चलो वहाँ जहाँ पर
पीडा का उत्सव होता है!
जिन्हें अभावों की बस्ती में
मस्ती से जीना आता है
मथ-कर जीवन-सिन्धु सदा ही
जिन्हें गरल पीना आता है।
तनिक झुका पाना भी इनको
कहाँ भला सम्भव होता है!
जो कष्टों से जूझ-जूझ कर,
जीवन-रथ को हाँक रहे हैं,
पाँव छिले होने पर भी जो
जो संघर्षों के साथ रहे हैं
ऐसे लोगों का तो दर्शन भी
पावन-अभिनव होता है!
ऐसे लोग पर तो मुझको
गर्व सदा, अनुभव होता है
मुझे ले चलो वहाँ जहाँ पर
पीडा का उत्सव होता है...! ?
जायेंगे कहाँ हम...
हाथों से लेकर माथे तक-
बढते ही जाते हैं-
दुर्दिन के जाले!
चटक-चटक टूट रही-
गुदडी की सींवन,
उघड रहा दिन-प्रति-दिन
ढका-छुपा जीवन
जूझता अभावों से आदमी
क्या ओढे और
क्या बिछाले!
सूरज नंगी पीठों पर
मार रहा कोडे,
अपने ही आँगन में कैद हुए
जायेंगे कहाँ हम भगौडे!
अब अपने हाथों से, फोड रहे
निर्मम हो, अपने ही छाले...
बढते ही जाते हैं... ?

अन्दर-बाहर बडी घुटन है,
यह क्षण जीना बडा कठिन है।
बाँहों में भरते हो लेकिन
अंदर तो बेगाना-पन है।
कांटे तो कांटे थे-आखिर
फूलों में भी बडी चुभन है!
इस युग की उपलब्धि यही है
हर चेहरा टूटा दरपन है।
अंगारों पर राख जमी है,
फिर भी इनमें खूब तपन है!
रिश्ते-नातों से तो अच्छा
शायद घर का सूनापन है।
ऐसे लाखों घर हैं जिनमें
अरमानों की लाश दफन है। ?

रा*ापथ जिनसे जगमगाए हैं,
क्या वो सब रौशनी के साये हैं?
चंद ख्वाबों की *ांदगी के लिए
हमने खुद ही फरेब खाये हैं।
रौशनी की यहाँ तिजारत ने-
हाय! कितने ही घर जलाये हैं।
छोड बैठे हैं खुद को लहरों पर
जब से साहिल पे घर बनाये हैं।
देखिये आजकल अंधेरों ने
हर तरफ दायरे बढाये हैं।
उसने बढकर मुझे सम्भाल लिया,
जब कदम मेरे लडखडाये हैं।
आज कल असलियत छुपाने को
लोग चेहरे कई लगाये हैं। ?

आदमी रद्दी हुआ, अखबार हो, जैसे।
*ादगी टूटी हुई तलवार हो, जैसे।
हाथ बाँधे सिर झुकाये, भीड चारों ओर,
हर तरफ कोई लगा, दरबार हो, जैसे।
हर नया अनुभव हमें यूँ तोड जाता है,
काटती तट को नदी की धार हो, जैसे।
दर्द के एकान्त-क्षण हमने जिये कुछ यूँ,
कोई उत्सव हो, कोई त्योहार हो जैसे।
आप से अब तक निकटता यूँ रही अपनी,
बीच में इक कांच की दीवार हो, जैसे...। ?

जीवन का पर्याय आज कुछ, आँसू बोलना है,
इस परवत से उस परवत तक, पत्थर ढोना है।
मुस्कानों से दर्द छुपाते रहना ही अच्छा,
पर्त दर्द की खुल जाना तो, नंगा होना है।
पग-पग पर उत्तुंग-शिखर सी, खडी समस्याएँ
और आदमी आज हो गया, कितना बौना है।
लाख जतन किये मिल जाए सुख, पल-दो पल का
किन्तु नहीं आया वो गुर, जो जादू-टोना है।
हम ठहरे वंशज पीडा के, हम से मत उलझो,
दुख तो अपने निकट सदा ही, रहा खिलोना है.. ?