छोटी भाभी

श्याम कुमार पोकरा




इन दिनों एहसास हो रहा था मुझे, घर से निकल कर परदेश में बसने का। एक के बाद एक मुश्किलें, अटकल, हौसला पस्त होने लगता है। हिम्मत टूट जाती है, मन में मलिनता छा जाती है। लेकिन फिर एक दृढता मिलती है। मन के अन्दर किसी ग्रन्थि से आत्मबल का श्राव होकर समस्त अंगों में प्रवाहित हो जाता है। ‘जीवन के रास्ते अतिसंकटमय हैं सफलता के लिए एक लम्बा संघर्ष करना होगा, असीम धैर्य के साथ निरन्तर।’ सत्य ही है, कॉलेज में पढने के लिए आया हूँ। आठ दिन की भागदौड के बाद रहने के लिए एक छोटी सी खोली मिल पाई है। अगर अब भी इंतजाम नहीं होता तो धर्मशाला से भी निकलना पडता, कहीं और ठोकरें खानी पडती।
सारे सामानों को व्यवस्थित रख दिया है। बक्सा खाली हो गया है। खोली में घर का स्वरूप उभरकर निखर आया है। मैं दरवाजा बंद करके झाडू उठा लेता हूँ, फर्श पर चलाने लगता हूँ। माँ की एक सीख सुनाई दे रही है- ‘घर हमेशा साफ सुथरा रखना।
आँखें खुलती हैं तो खोली में फैला हुआ अंधेरा न*ार आता है। उठकर घडी देखता हूँ, शाम के पाँच बज गये हैं। समझ में आता है कि पूरे चार घंटे सोकर उठा हूँ। पीठ की हड्डियों में दर्द महसूस हो रहा है। पीछे की खिडकी खोलता हूँ। एक अजीब सी दुर्गंध हवा के साथ प्रवेश कर जाती है। जी मिचलाने लगता है, मैं एक झटके के साथ खिडकी बंद कर
देता हूँ।
सारे कपडों को पानी म डूबो देता हूँ। एक एक करके सब पर साबुन घिसता हूँ। फिर मुठ्ठियों से उन पर प्रहार करने लगता हूँ। अनवरत आवाज आने लगती है छक...छक...छक...। मस्तिष्क इस कार्य से हटकर दूसरी योजनाएं बनाने
लगता है।
‘‘सुनिए....।’’ एक पतली सुरीली आवाज मेरे कानों में आकर टकराती है। सिर घुमाकर देखता हूँ। एक बाल्टी हाथ में लटकाए वह खडी है। वह पानी भरने आई है। लडकी है या औरत मैं कुछ निश्चय नहीं कर पाता हूँ, एकटक। और बाल्टी में गिरती हुई स्वच्छ पानी की धार को देखने लगता हूँ।
‘‘आपका नाम क्या है?’’ वह मुझसे पूछती है। मैं न*ारें ऊपर उठाकर देखता हूँ, जो क्षणिक उसकी काली आंखों से मिलकर अलग हो जाती है। मुंह से सिर्फ एक शब्द में जवाब निकलता है- ‘‘अमृत’’
‘‘कॉलेज में एडमिशन ले रहे हो?’’
‘‘हाँ, एम. एससी. फिजिक्स में।’’
‘‘बी.एससी. कहाँ से की है?’’
‘‘सुमेरगंज से, एम.एस.सी. में वहाँ फिजिक्स नहीं है इसलिए यहाँ आना पडा।’’
बाल्टी पूरी भर गई है। टोंटी बंद करने के बाद बाल्टी को उठाकर मैं उसके हाथों में थमा देता हूँ। थैंक्यू कहकर वह मुड गई है, एक हाथ में बाल्टी लटकाए व दूसरे हाथ में अपनी साडी को समेटे हुए, वह सीढियां चढने लगी है। मैं पलटकर वापिस अपना धोबी घाट शुरू कर देता हूँ।
दूसरे दिन बहुत भागदौड के बाद फार्म जमा करा पाता हूँ। हल्की सी खुशी अनुभव होती है। लेकिन जब पता लगता है कि फीस तीन दिन बाद जमा होगी और एडमिशन कन्फर्म होगा, अनिश्चिता की स्थित में मन खीजकर रह जाता है। कैसा प्रशासन है। कॉलेज को खुले हुए कई दिन बीत गये हैं और अभी तक एडमिशन भी नहीं हो पाये हैं। पढाई कब प्रारम्भ होगी, कोई भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं है।
अभी आधा दिन बाकी है। कॉलेज से निकलकर मैं पास में ही स्थित मण्डल पुस्तकालय में आ बैठा हूँ। एक पत्रिका को लेकर पढ रहा हूँ। अचानक बाहर तेज हवाओं के साथ बारिश होने लगती है। चारों ओर पानी ही पानी फैल गया है। सहसा मुझे याद आता है अपने कपडे आंगन में बंधे तार पर फैलाकर आया था। गीले होकर कपडे इधर-उधर उड गये होंगे। मन चिन्तित होने लगता है।
घर पहुंचते ही चिंता और बढ जाती है। आंगन में बंधा हुआ तार खाली पडा है, कपडे उस पर नहीं है। क्या सब हवा के साथ उड गये हैं, या किसी ने समेटकर रख लिये हैं। गांव से निकलते समय पिताजी की कही एक बात याद आ रही है-‘वहां किसी प्रकार की लापरवाही मत रखना, नहीं तो नुकसान भुगतना पडेगा। शहरों का माहौल गावों से अलग होता है। वहां के लोगों में प्रेमभाव, मेलजोल अपेक्षाकृत कम होता है।’
किसी से पूछूंगा, तलाश करनी चाहिए। लेकिन किससे पूंछू? चारों तरफ लोग रहते हैं। सीधी बात को कोई उल्टा समझ कर बुरा भी मान सकता है। इसी कशमकश में मैं खोली का दरवाजा खोलकर बत्ती जला देता हूँ। पैरों के जूते मौजे उतारने लगता हूँ।
इसी समय ‘टिक...टिक...टिक...’सीढियों की ओर की खिडकी पर दस्तक होती है। मैं उठकर खिडकी खोलता हूँ। उसका चेहरा न*ार आता है। उसके पतले श्यामल होठों पर मुस्कान उभरी हुई है। वह बोलती है।
‘‘हो गया आपका एडमिशन’’
‘‘हाँ, आज फार्म देकर आया हूँ, फीस बाद में
जमा होगी।’’
‘‘किताबें मत खरीदना, मेरे पास रखी हैं।’’
‘‘आप एम.एससी. कर चुकी हैं?’’
‘‘नहीं, बी.एससी. के बाद पढाई छूट गई।’’
उसके नथुनों से एक लम्बा निःश्वास निकला और हवा में विलीन हो गया। चाहते हुए भी वह आगे कुछ नहीं बोली। अखबार में लिपटा हुआ कपडों का बण्डल उसने मेरी ओर बढा दिया। जिसे देखकर मैं खुश हो गया हूँ। मेरी एक बडी परेशानी दूर हो गई। कपडों का बण्डल हाथों में पकडकर मैं बोला- ‘‘धन्यवाद।’’
‘‘इसकी आवश्यकता नहीं है। यह तो पडोसी का फर्ज है।’’
वह सीढियां चढ रही है। बहुत दुबली पतली है, लेकिन सुंदर और सुशील है। शहर के बारे में, यहां के लोगों के बारे में पिताजी की कही हुई बात अब मुझे असत्य प्रतीत हो रही है।
यहां रहते हुए पूरे आठ दिन निकल गये हैं। कॉलेज में अभी भी पढाई शुरू नहीं हो पाई है। इधर उधर भटकने में ही दिन निकल रहे हैं। बिल्कुल निरर्थक तो नहीं कह सकता हूँ। मुझे बहुत सारी जानकारी मिल गई है। इस शहर के बारे में, पडोसियों के बारे में और उसके बारे में। क्या नाम है उसका यह अभी तक ज्ञात नहीं कर पाया हूँ।
यह मकान एक पुरानी हवेलीनुमा लगता है। मकान मालिक अब इस दुनिया में नहीं रहा है। मकान मालकिन है, उसके दो बेटे हैं, बहुएं हैं। वे सब ऊपर पहली मंजिल पर रहते हैं। अगल बगल में दोनों बेटों के कमरे हैं और बीच में गुम्बज वाले विशाल हॉल में उनकी माँ रहती है। नीचे छः कमरे हैं, बीच में बडा आंगन है। एक कमरे में मैं रहता हूँ और पास वाले कमरों में भी मेरे जैसे पढने वाले लडके रहते हैं। मेरे सामने के तीनों कमरों में पांचू काका का परिवार रहता है। पांचू काका पास ही सब्जी मंडी में ठेले
पर सब्जी बेचता है। उसका बडा बेटा शहर में रिक्शा चलाता है।
उसका कमरा ठीक मेरे कमरे के ऊपर स्थित है। सब उसे छोटी भाभी कहकर संबोधित करते हैं। क्योंकि वह मकान मालकिन की छोटी बहू है। बडी बहू को सब बडी भाभी कहकर पुकारते हैं। वह बहुत हसमुख है, बातूनी है। दिनभर इधर उधर गपशप करती रहती है। बच्चों की तरह खिलखिलाती रहती है। शाम को जब उसका पति ड्यूटी से घर लौटता है, तब वह दौडकर ऊपर चढ जाती है। फिर वह बाहर दिखाई नहीं देती है।
‘छोटी भाभी’ हां मैं भी उसे अब इसी नाम से पुकारने लगा हूँ। वह बाहर कम ही दिखाई देती है। हमेशा दरवाजे पर पडे मोटे पर्दे के पीछे ही रहती है। मैंने आज तक उसे न तो हँसते हुए देखा है, और न ही घर से बाहर कहीं जाते हुए देखा है। वह साधारण लिबास में ही रहती है। श्ाृंगार से शायद उसे घृणा है। उसकी शुष्क आँखों में, श्यामल होठों पर, अक्सर एक खामोशी छाई रहती है। अभी तक कभी मैंने उसके पति को भी नहीं देखा है। वह कब आता है, कब जाता है, क्या करता है मैं कुछ नहीं जानता हूँ।
रात के दस बज चुके हैं। मैं खाट पर चित्त पडा हूँ इतना अधिक खा लिया है कि सांस लेने में भी कठिनाई हो रही है। सारे बर्तन इधर उधर फैले पडे हैं। सोच रहा हूँ कि माँ मुझे इस तरह देख ले तो आसमान सिर पर चढा लेगी, लम्बा भाषण सुना देगी। लेकिन यहाँ मैं अकेला हूँ, बिलकुल आजाद। अधिक स्वतंत्रता ही आदमी को लापरवाह बना देती है। जो किसी भी प्रकार की हो सकती है और यही आगे चलकर उसकी शारीरिक व मानसिक विकृतियों में परिवर्तित हो जाती है। इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ हूँ कि खिडकी पर दस्तक होती है। मैं उठकर खिडकी खोलता हूँ।
‘‘छोटी भाभी आप!’’
‘‘हाँ, मैं आपको किताबें देने आई हूँ।’’
किताबों का बण्डल उसने खिडकी में रख दिया जिसे मैंने अपने हाथों में उठा लिया है। मेरी न*ार किताब के ऊपर लिखे नाम पर पडती है।
‘‘आपका नाम सुमन है छोटी भाभी?’’
‘‘हाँ, इन सब पर मेरा नाम लिखा है आप इसे काट देना’’
यह नाम इन किताबों के लायक नहीं रह सका है।’’
उसकी न*ारें झुक गई है, आवाज भर्रा सी गई है। दूसरे ही क्षण वह द्रुतगति से ऊपर चढ गई है। उसके हृदय में दबी हुई वेदना मैं भाँप रहा हूँ, लेकिन कारण समझ नहीं पा रहा हूँ।
उस दिन मुझे तेज बुखार चढ आया। पास के ही सरकारी अस्पताल से दवा लाकर खा चुका हूँ, लेकिन अभी भी ठंड से कांप रहा हूँ। शरीर के समस्त अंगों में दर्द हो रहा है। कमरे में अंधेरा छा गया है। पीछे की खिडकी की दरारों से होकर बाहर रोड लाइट का प्रकाश फर्श पर लकीरों के रूप में बिछा है। शरीर की शक्ति इतनी क्षीण हो चुकी है कि उठकर लाइट जलाने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा हूँ। मैं कम्बल में गठरी बनकर दुबका पडा हूँ। मुडी हुई टांगों के घुटने सीने से आ लगे हैं।
बहुत दूर घण्टाघर से बजते हुए घण्टों की आवाज सुनाई दे रही है टन...टन...टन...। कितने बार बजे हैं ठीक से गिन नहीं पाया हूँ। ग्यारह भी हो सकते हैं या बारह भी हो सकते हैं। नींद नहीं आ रही है। लम्बे समय तक बरबस आँखें बंद किये पडा रहता हूँ, लेकिन वे फिर खुल जाती हैं। अजीब सी बेचैनी होने लगती है। हाथ पैर पटकने लगता हूँ। नींद नहीं आना बेहद कष्टमय प्रतीत होता रहा है।
अचानक कमरे की लाइट जल जाती है। मैं फटी फटी आँखों से उसे सामने खडी देख रहा हूँ। उसके हाथ में थर्मस है एक जोडा कप प्लेट है। दरवाजा खोलकर वह कब अन्दर आ गई, मुझे पता ही नहीं लग पाया है। नजदीक आकर वह खाट पर बैठ जाती है और पूछती है।
‘‘अमृत, कैसी तबियत है अब?’’
‘‘मैं ठीक हूँ छोटी भाभी। मगर आप इस समय यहां आई हो, कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा।’’
‘‘क्या सोचेगा, क्या पडोसियों के दुख-दर्द में हाथ बंटाना भी गलत कार्य है। लो चाय पी लो, मैं तुम्हारे लिये चाय बनाकर लाई ह।’’
उसक स्वरों में दृढता थी, मेरे प्रति स्नेह था। मैं चुप बैठकर गटा गट चाय गले में उतारने लगा हूँ। वह बत्ती बंद करके चली गई है। सीढियों पर चढते हुए उसके पदचापों की आवाज कानों से टकरा रही है। अब पुनः चारों ओर सन्नाटा छा गया है। मैं आँखें बंद करके फिर सोने की चेष्टा करने लगा हूँ।
उस दिन भौतिक विज्ञान के एक सवाल में मैं ऐसा उलझा कि आधी रात बीत गई। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। कभी कभी दूर हाइवे पर गुजरने वाले वाहनों की आवाजें आती हैं और लुप्त हो जाती हैं। अचानक ध्यान भंग हो जाता है। बाहर सीढियों पर किसी के लुढकने की आवाज सुनकर मैं चौंक पडता हूँ। किताब बंद करके मैं उठ जाता हूँ और दरवाजा खोलकर बाहर निकलता हूँ।
एक दुबला पतला युवक सीढियों के नीचे अचेत पडा है। सिर में शायद पत्थर की चोट लगी है उसके माथे से खून बह रहा है। सिर के लम्बे बाल उलझे हुए हैं, दाढी बढी हुई है कपडे मैले हैं।
मैं घबरा सा गया हूँ, कौन है, क्या हुआ है इसे, कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। उसका सिर टेढा दबा हुआ है, सीधा करने के लिए झुकता हूँ तो शराब की तीखी दुर्गंध मेरे श्वसन तंत्र में समा जाती है। एक घृणित शब्द मेरे मुंह से फूट पडता है-‘शराबी!’
मैं सीधा खडा होता हूं अचानक दृष्टि उस पर पडती है। वह सीढियों पर खडी है शान्त और अविचल। म एकटक उसे देख रहा हूँ। धीरे धीरे वह नीचे उतरती है। मेरे नजदीक आकर बोलती है।
‘‘अमृत, इन्हें उठाकर ऊपर ले चलो, यह मेरे
पति हैं।’’
यह सुनकर एक झटका सा लगा मुझे और मैं कांप गया। मैं कुछ नहीं बोला, चुपचाप उसे उठाकर सीढियां चढने लगा हूँ।
उसे मैंने पलंग पर लिटा दिया है। वह मेरे पस खडी है। मेरी दृष्टि उसकी आँखों में पडती है। उनमें पानी भर आया है और बहने लगा है। ये उसके आँसू हैं जो मन की व्यथा का प्रकट कर रहे हैं। वह अपने पति की सेवा में लग जाती है और मैं सीढियां उतरकर नीचे अपने कमरे में चला आता हूँ। फिर मैं पढ नहीं पाता हूँ, सो भी नहीं पाता हूँ। सोचता रहता हूँ, उसके पति के बारे में, उसके बारे में।
ढलते हुए सूरज की धूप खिडकी से होकर फर्श पर पड रही है। बडी भाभी और माँ जी बातें करती हुई बाहर निकल गई हैं। वे शायद सब्जी खरीदने निकली हैं। आंगन में पांचू काका के परिवार बच्चे खेल रहे हैं। मैं कॉलज से लौटा ही हूँ, कुर्सी पर फैलकर बैठा हूँ। मैं एकटक फर्श पर बनी धूप छाँव के मध्य की रेखा को देख रहा हूँ, जो मद्यम गति से दीवार से दूर होती जा रही है। इसी समय छोटी भाभी की आवाज कानों से आकर टकराती है।
‘‘क्या सोच रहे हो अमृत?’’
मैं चौंककर सीधा बैठा जाता हूँ। होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए जवाब देता हूँ।
‘‘कुछ नहीं छोटी भाभी, अकेला रहता हूँ तो दिमाग में तरह तरह के विचार आने लगते हैं।’’
‘‘अभी क्या सोच रहे थे तुम, क्या घर की याद आ रही है?’’
वह खिडकी में कोहनी टिकाकर खडी हो गई है। ठोढी को हथेली पर रखकर मंद मंद मुस्करा रही है। मैं कुर्सी से उठकर खिडकी के नजदीक आ जाता हूँ,
बोलता हूँ।
‘‘कुछ दिनों से मैं आफ बारे में ही सोचता रहता हूँ छोटी भाभी’’
‘‘मेरे बारे में!’’
वह सीधी खडी हो गई है और उसकी प्रश्न भरी निगाहें मुझे ताकने लगी हैं। मैं मुड जाता हूँ, दीवार पर पीठ टिका देता हूँ। और सामने टंगी दुर्गामाता की छवि को निहारते हुए बोलता हूँ-‘‘आप कितनी अच्छी है छोटी भाभी। आप सुन्दर है, सुशील हैं और पढी लिखी हैं फिर आपने अपने लिए ऐसे अयोग्य जीवन साथी का चुनाव क्यों किया है। एक शराबी को अपना पति क्यों स्वीकार किया है।’’
मैं उसके मुखमण्डल को देखने लगा हूँ। उसकी काली आंंखों की पलकें झुक गई हैं, हवा के झोंके से दो केशलताएं चेहरे पर सरक आई हैं। और कानों में टंगी स्वर्णिम बालियां कम्पन करने लगी ह। उसकी लम्बी पतली ग्रासिका म उतार चढाव हो रहा है। वह कुछ बोलना चाह रही है लेकिन उसके श्यामल होठ निष्क्रिय पडे हैं, एक दूसरे से चिफ गये हैं। चाहते हुए भी वह कुछ बोल नहीं पा रही है।
‘‘ मुझे माफ कर दो छोटी भाभी, शायद अपनी सीमाओं से बाहर निकल गया हूँ।’’
मैं सिर झुकाकर पश्चाताप प्रकट करता हूँ। बिना कुछ कहे वह द्रुतगति से सीढियां चढ गई है।
दूसरे दिन मैं कॉलेज से लौटता हूँ। खोली का ताला खोलकर अन्दर प्रवेश करता हूँ। किताबें यथास्थान रखकर पैरों के जूते मौजे उतारने लगता हूँ। इसी समय खिडकी पर दस्तक सुनाई पडती है। खिडकी खोलता हूँ तो उसका शान्त गंभीर मुखमण्डल न*ार आता है।
‘‘अमृत, क्या मेरा एक काम करोगे?’’
‘‘हां, बोलिए छोटी भाभी, क्या काम है?’’
एक पर्चे के साथ पचास रुपये को नोट मेरी और बढाते हुए वह बोलती है- ‘‘अमृत बाजार से ये दवाइयां ले आओ, मेरी तबीयत ठीक नहीं है।’’
‘‘ठीक है छोटी भाभी, मैं अभी आपकी दवाइयां लाता हूँ।’’
मैं उसके हाथ से पर्चा व रुपये ले लेता हूँ। वह शिथिल कदमों से सीढियां चढने लगती है।
दवाइयों का पैकिट हाथ में थामें मैं ऊपर चढ रहा हूँ, सतर्क व चौकन्ना होकर। कोई मुझे ऊपर जाते हुए न देख ले, एक डर मन में बैठा हुआ है। मैं एक अच्छा कार्य कर रहा हूँ, कोई अपराध नहीं कर रहा हूँ। फिर भी मन में उपजे इस भय का कारण समझ नहीं पा रहा हूँ।
क्षणभर में उसके बंद द्वार के पास ठहरता हूँ।
हाथ से हल्का सा धक्का देता हूँ और दरवाजा खुला जाता है। वह अस्पष्ट सी पलंग पर लेटी हुई न*ार आ रही है।
मैं पुकारता हूँ।
‘‘छोटी भाभी, मैं आपकी दवा लाया हूँ।’’
‘‘अन्दर आ जाओ अमृत।’’
उसकी क्षीण आवाज सुनाई पडती है। अन्दर पहुंचकर मैं दवा उसके हाथों में थमा देता हूँ। बत्ती जलाता हूँ। ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में वह स्पष्ट नजर आती है। उसकी न*ारें ऊपर छत पर घूम रहे पंखे पर टिकी हैं। चेहरे पर पसीने की बूंदें उभरी हुई हैं, मुंह अधखुला है और उसकी सांसों की गति अत्यधिक तेज है। लग रहा है उसे दमा का दौरा पडा है। बडी कठिनाई से वह उठकर बैठती है। दवाई का पैकिट खोलते हुए वह पानी मांगती है।
दवाई पीकर वह पूर्ववत् लेट गई है। मैं एक स्टूल पर उसके न*ादीक ही बैठ गया हूँ और उसकी सांसों के आवेगों को स्पष्ट सुनने लगा हूँ। मैं उसके रोग की तकलीफ को महसूस कर रहा हूँ। आँखों और चेहरे के भावों से उसके प्रति अपनी सांत्वना प्रकट कर रहा हूँ। हाथ बढाकर उसके ललाट का पसीना पौंछता हूँ तो उसकी आँखों में पानी भर आता है और उसका सिर मेरे हाथ पर झुक जाता है।
बहुत समय बीत गया है और मैं अभी भी उसके नजदीक ही बैठा हूँ। मेरे मन की आशंकाए व भय जड मूल से नष्ट हो गये हैं। मैं सिर्फ उसकी पीडा को महसूस कर रहा हूँ। उसके मासूम मुखमण्डल को देख रहा हूँ, जो झडे हए पत्ते की भाँति पीला पडने लगा है।
अब उसकी आँखें बंद हो गई हैं, श्वासों की गति सामान्य हो गई है। मैं आहिस्ता से उठ जाता हूँ और बत्ती बंद करके बाहर निकल जाता हूँ, कि उसका डूबा हुआ स्वर सुनाई पडता है-‘अमृत मुझे अकेली छोडकर मत जाओ, मेरा दम घुट रहा है।’
मैं रूक जाता हूँ, वापिस लट पडता हूँ।
‘‘माँ जी को बुलाऊं छोटी भाभी?’’
‘‘वे नहीं आयेगी, वे मुझसे घृणा करती हैं।’’
मैं बत्ती जलाता हूँ। उसके नजदीक बैठकर सहानुभूतिपूर्वक पूछता हूँ-‘‘आपको यह बीमारी कब से लगी है छोटी भाभी?’’
कुछ क्षणों तक शुष्क नेत्रों से वह अपलक मुझे देखती रहती है, फिर धीरे से उसके होठ फडफडाते हैं।
‘‘जब से मैं इस घर में आई हूँ।’’
मुझे आर्श्चय होता है। मन में आशंका सिर उठाती है और मैं पूछता हूँ-‘‘आपको इस घर में दुख मिला है? क्या आप यहाँ नहीं आना चाहती थी छोटी भाभी?’’
‘‘तुम ठीक कह रहे हो अमृत। मैं आगे पढना चाहती थी, विज्ञान पढने में मेरी बहुत रुचि थी। मैं भी इन सबकी तरह कुछ बनना चाहती थी।’’
उसकी न*ारों के साथ मैं भी ऊपर देखने लगा हूँ। दीवारों पर सुनहरे फ्रे मों में वैज्ञानिकों की तस्वीर टंगी हैं। एक चित्र में न्यूटन गंभीर मुद्रा में विचारमग* है, दूसरे चित्र में गैलिलियों एक लम्बी दूरबीन से आसमान में ताक रहा है। एक चित्र में आइन्सटाइन के चेहरे पर सफलता की मुस्कान बिखरी हुई है। एक चित्र में मैडम क्यूरी सूक्ष्मदर्शी में देख रही है और उसी के पास दूसरी तस्वीर में डॉक्टर भाभा की सौम्य छवि को चित्रित किया गया है। क्षणभर रूककर वह फिर बोलने लगी है।
‘‘ये तस्वीर मैंने कॉलेज के दिनों में बनाई हैं। बचपन से ही मेरा मन वैज्ञानिकों से प्रभावित रहा है। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी शादी हो जाये और मैं एक बंधन में बंधकर रह जाऊं। लेकिन ममता के आँसुओं ने मेरी इच्छा दबा दी। माता पिता ने अपना सामाजिक दायित्व निभाया और मेरी शादी यहां कर दी। उस दिन से ही मेरी पढाई छूट गई है, मैं यहां कैद होकर रह गई हूँ। शराबी पति से मुझे प्यार के बजाय लाते व तिरस्कार ही मिला है। माँ जी ने भी मुझे कभी गले नहीं लगाया है। यहां मेरा दम घुट रहा है, हर दिन मैं मरती जा रही हूँ।’’
उसकी आँखों में पानी भर आया है। एक असह्य वेदना से वह छटपटाने लगी है। मैं द्रवित हो उठा हूँ, विडंबना से मन भर आया है। भावुक होकर मैं उसे सांत्वना देता हूँ-‘‘समय का इंतजार करो छोटी भाभी, हिम्मत मत हारो, सब ठीक हो जायेगा। मैं समर्थ होकर आफ लिए अवश्य कुछ ना कुछ करूंगा।’’
यह सुनकर वह मेरी आँखों में देखने लगी है। शायद मेरी बात में छिपी सच्चाई का आकलन करने लगी है। मैं उठकर नीचे अपनी खोली में चला आता हूँ। फिर रात भर सो नहीं पाता हूँ। दर्द से कराहती हुई उसकी मासूम छवि बार बार मेरी आँखों में प्रकट हो आती है। जो मेरी नींद को दूर भगा जाती है।
यहां रहते हुए आज मुझे पूरे दो साल बीत गये हैं। मेरी पढाई पूरी हो गई है। कमरा खाली करने के लिए मैं अपने सामान को बांध रहा हूँ। इसी समय वह खिडकी में न*ार आती है। चेहरे पर छाई हुई उदासी स्पष्ट झलक
रही है।
‘‘अमृत, तुम जा रहे हो, शायद अब मिलना होगा या नहीं। जाते जाते तुम अपना रोल नम्बर देते जाओ। तुम्हारा रिजल्ट देखकर मुझे अति प्रसन्नता होगी।’’
उसके स्वरों में निहित दर्द मैं महसूस कर रहा हूँ। एक कागज के टुकडे पर अपना रोल नम्बर लिखकर उसको देता हूँ और बोलता हूँ- ‘‘छोटी भाभी आप निराश न हों। एक दिन मैं वापिस आऊंगा और आपको इस नरक से अवश्य छुटकारा दिलाऊंगा।’’
वह कुछ नहीं बोली। कुछ क्षणों तक मेरी आँखों में देखती रही। सहसा वह मुडी और द्रुतगति से सीढियां चढ गई है। मुझे लगा जैसे वह ऊपर जाकर फूट फूट कर रो पडी है।
ऑटोरिक्शा मुख्य द्वार पर खडा है। पांचू काका मेरे सामानों को लदवा रहे हैं। कमरा खाली करके मैं चाबी माँ जी को दे आया हूँ। फिर सबसे विदा लेकर ऑटोरिक्शा में आ बैठा हूँ। ड्राइवर ने ऑटोरिक्शा स्टार्ट करके आगे बढा दिया है। ऊपर चढकर जब हम मुख्य सडक पर मुडे हैं, मेरी दृष्टि उसके दरवाजे पर जा टिकी है। वहां वह खडी हुई मुझे दूर जाते हुए देख रही है।
बरसों बाद आज मैंने इस शहर में कदम रखा है। स्टेशन पर उतरते ही मुझे छोटी भाभी की याद आ गई है। आज मैं दिल्ली की एक कन्सट्रक्शन कंपनी में इंजीनियर हूँ। कम्पनी को इस शहर में एक कॉन्ट्रेक्ट मिला है। इसी सिलसिले में प्रारम्भिक निरीक्षण के लिए एक कमेटी को यहां भेजा गया है। मैं भी इस कमेटी का मेम्बर हूँ। रेल्वे स्टेशन से बाहर निकलकर हम कार से होटल की ओर बढ रहे हैं। मेरी न*ारें बार बार चन्द्रपुरा की ओर उठ रही हैं, जहाँ कभी मैं दो साल तक रहा हूँ। जहाँ छोटी भाभी
रहती हैं।
दिनभर मैं कम्पनी के कार्यो में ही व्यस्त रहा हूँ। शाम को फ्रेश होकर मेरे सभी साथी सिनेमा देखने निकल गये हैं। और मैं टैक्सी पकड कर छोटी भाभी से मिलने चल पडा हूँ। मन में कई तरह के विचार उमड रहे हैं। अब वह कैसी होगी, बरसों बाद क्या वह मुझे पहचान लेगी! मैं तो यहां से निकलकर कुछ ही दिनों में उसे भूल गया था। अपनी नौकरी और अपने भविष्य को बनाने में जुट गया था। अब तक मैं बहुत कुछ हासिल कर चुका हूँ। दिल्ली में मैंने मकान खरीद लिया है, कुसुम से शादी कर ली है और मैं एक बच्चे का बाप भी बन गया हूँ। यह सब सुनकर छोटी भाभी बहुत खुश होगी। उसके कहे हुए वे शब्द मुझे याद आ रहे हैं- ‘‘अमृत तुम्हारा रिजल्ट देखकर मैं बहुत खुश होऊंगी।’’
टैक्सी से उतरकर मैं उस हवेली को देखने लगा हूँ। यहां कुछ नहीं बदला है। सब कुछ वैसा ही लग रहा है। अंधेरा हो गया है, बत्तियाँ जल उठी हैं। बाहर बच्चों का झुण्ड अभी भी क्रिकेट खेल रहा है। मैंने मुख्य द्वार में अन्दर प्रवेश किया। आंगन में खटिया पर बैठे हुए पांचू काका की न*ार मुझ पर पडी। चश्मे के मोटे शीशे में से कुछ देर तक वे मुझे घूरते रहे। फिर बोले- ‘‘किससे मिलना है बाबूजी?’’
‘‘पांचू काका आपने मुझे नहीं पहचाना! मैं
अमृत हूँ।’’
यह सुनकर वे खुशी से झूम उठे। खडे होकर मुझे गले लगा लिया। फिर बडे पोते से कुर्सी मंगवाकर उस पर मुझे बैठा दिया और मेरे बारे में कई प्रश्न करने लगे।
यहां बैठे हुए मुझे काफी समय बीत चुका है। एक एक करके सभी, माँ जी, बडी भाभी, पांचू काका के बहू बेटे, पोते-पोतियाँ सभी मुझसे मिलकर चले गये हैं। मेरी न*ार बार बार उठकर छोटी भाभी के दरवाजे पर पड रही है, लेकिन वह अभी तक न*ार नहीं आई है। चाय का अंतिम घूंट गटककर मैंने पांचू काका से पूछा- ‘‘काका सब आ गये हैं, लेकिन छोटी भाभी न*ार नहीं आई है।’’
मेरा प्रश्न सुनकर पांचू काका के चेहरे पर छाई हुई प्रसन्नता अचानक लुप्त हो गई। गंभीर व दबे हुए स्वर में वे बोले- ‘‘अमृत अभी दो महीने पहले ही छोटी भाभी यह दुनिया छोडकर चली गयी है। बेचारी बडी दुखियारी थी। अभी उसकी चिता ठण्डी भी नहीं हुई थी कि छोटे भैया ने दूसरी शादी कर ली है।’’
यह सुनकर मैं सन्न रह गया। क्षण भर के लिए आंखों में अंधेरा सा छा गया। कानों ने सुनना बन्द कर दिया और जमीन घूमने सी लगी। मन गहरे विषाद में डूब गया। बहुत ही कठिनता से मैं बोला- ‘‘काका बहुत देर हो गयी है, अब मैं चलता ह।’’
अभी मैं कुर्सी से उठा ही था कि कागज का एक पुलिंदा ऊपर से गिरा और नीचे फर्श पर बिखर गया। ये उन्हीं वैज्ञानिकों की तस्वीरों के टुकडे थे जो छोटी भाभी की आदर्श थी, उसकी पूजा थी। आज वह नहीं रही तो निर्ममता से इन्हें भी फाडकर फैंक दिया गया है।
मैं फूर्ती से झपटा और इधर उधर बिखरे पडे उन तस्वीरों के टुकडों को इकठ्ठा करने लगा। फिर उन्हें अपने कोट में दबाकर तेजी से वहां से बाहर निकल आया हूँ। पांचू काका को मेरी हरकत शायद पागलपन लगी हो लेकिन तस्वीरों के टुकडों को पाकर मैं बहुत राहत महसूस कर रहा हूँ। अपनी कायरता व स्वार्थवश मैं छोटी भाभी के लिए कुछ नहीं कर सका हूँ। मेरी आत्मा मुझे कोस रही है। मैं एक अंधेरी गली से गुजर रहा हूँ और शीघ्र यहां से दूर चला जाना चाहता हूँ।
फटे हुए उन चित्रों को जोडकर मैंने सुनहरे फ्रेमों में लगवा लिया है। वैसी तस्वीरें फिर साकार हो उठी हैं। इन्हें मैंने अपने रीडिंग रूम में लगवा लिया है। लोग अक्सर पूछते हैं- ‘‘ये फटी पुरानी बेतुकी तस्वीर क्यों लगा रखी हैं?’’ मैं टाल जाता हूँ किसी को कुछ नहीं बताता हूँ। इन तस्वीरों की महत्ता को सिर्फ मैं ही समझ सकता हूँ। जिनके पीछे छिपी एक संवेदनाशील नारी की व्यथापूर्ण जिंदगी आज भी मेरे हृदय को विदीर्ण कर जाती है। ?
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