सोशल भेडिया

मनोज वार्ष्णेय


आज पहली बार क्षेत्र में पुलिस गश्त पर थी। थानेदार से लेकर अर्दली तक। लगता था पूरा थाना ही मौके पर आ जुटा है। थाने की बात अगर छोड दें तो, कई डीएसपी तथा सीआईडी के जवान भी क्षेत्र में गुपचुप आ जुटे थे। खोजी कुत्ते कॉलोनी में जहां-तहां सादा वर्दी में घुम रहे जवानों के साथ थे। कुल मिलाकर वीआईपी मूवमेंट था। लोगों को शक था, कोई आतंकवादी इस कॉलोनी में आ गया है, उसी की खोज चल रही है? कुछ लोगों का मानना था, मुख्यमंत्री स्तर का कोई नेता औचक निरीक्षण के लिए आने वाला है, इसलिए इतनी कवायद है।
कॉलोनी के होली चौक, डेयरी चौराहा और कूडे वाला चौक पर लौंडे-लपाडे मजमा लगाए खडे थे। चर्चा का विषय वही। घरों के बाहर भी माहौल में गर्माहट। यहां तक की मंदिर के बाहर लगने वाली महिला चौपाल में भी वही चर्चा। आज इतनी पुलिस क्यों? एक मुंह से दस-दस किस्से। यह हो सकता है? नहीं ऐसा तो नहीं है? अच्छा फिर यह होगा, इसलिए इतनी पुलिस है। स्थिति की गंभीरता इस बात से पता चलती है कि बच्चों के क्रिकेट मैच के दौरान भी यह बात मुख्य थी कि पुलिस अंकल क्यों घूम रहे हैं? बच्चे भी कयास लगा रहे थे, कि कोई बच्चा चोर कॉलोनी में आ गया है, इसलिए इतनी पुलिस है। पिंटू का सोचना था-अपनी कॉलोनी अभी जंगल जैसी ही है, हो सकता है कि कोई भेडिया किसी बच्चे को ले गया हो और पुलिस बदमाश के चक्कर में अपना समय बेकार कर रही हो? हनी बोला-नहीं यार, पुलिस तो ऐसे ही चक्कर लगा रही है, अगर बच्चा चोरी होता तो शाम को मंदिर म बैठने वाली आंटियां यहां आतीं?
हनी की बात सही थी। महिला चौपाल में ऐसी कोई बात हुई ही नहीं थी। लिहाजा इस बात की गुंजाईश कम थी। यूं भी मीडिया इतना सशक्त है कि अगर कोई भेडिया आया होता तो अब तक देशभर में हल्ला मच जाता? मीडिया का आजकल यही काम रह गया है। किसान चाहे रोज आत्महत्या करते रहें। गरीब भूख के मारे अपना लिवर, किडनी बेचते रहें और तो और गरीबों की पत्नियां किराए के लिए कोख गिरवी रखती रहें पर मीडिया तो मीडिया है, उसे इससे फर्क नहीं पडता। हां, फर्क पडता है अगर कहीं कोई भेडिया आ जाए या फिर हम देश भक्ति के रंग में रंगकर असहिष्णुता का लबादा ओड लें। तो मीडिया के लिए बे*किंग न्यूज बन ही जाएगी। सही भी है भूख से मरते समय टीआरपी नहीं बढती, क्योंकि मरने वाला थोडे ही टीआरपी बढाएगा? टीआरपी तो भेडिया ही बढाएगा। अब तो देश का बच्चा-बच्चा समझने लगा है इस टीआरपी के खेल को। ठीक वैसे ही जैसे १९९२ म वह समझ गया था कि बच्चा-बच्चा राम का। तो इस तरह हर ओर रहस्यमय वातावरण था।
शाम का समय, मंदिर में आरती हो रही थी। मंदिर के पुजारी महाराज शंकर देवा का ध्यान आरती की गहराई में था। पर वहां पर जो महिलाएं तथा रोजाना के आने वाले भक्त थे, वह इस बात पर उतावले थे कि महाराज से पूछें कि कॉलोनी में क्या हो रहा है, जो इतनी पुलिस यहां पर घूम रही है? औरतें जोर से चिल्ला रही थीं, जय जगदीश हरे....। इस दौरान आरती के कई हिस्से गायब हो गए। शंकर देवा ने पीछे मुडकर देखा तो सभी भक्त आंखें बंद कर भक्तिभाव से आरती में तल्लीन नजर आए। उन्हें लगा कि आज उनका ही मन भटका हुआ है, इन बेचारियों का क्या दोष?
आरती खत्म होते-होते वहां उपस्थित भक्तों के सब्र का बांध टूट चुका था। महिलाएं तो बेचैन हो रही थीं। शंकर देवा चरणामृत दे रहे थे, तभी मिसेज तिवारी पूछ ही बैठीं-पंडित जी आजकल कॉलोनी का माहौल कुछ अच्छा नहीं नजर आ रहा है? कोई टेंशन है? जो इतनी पुलिस घूम रही है?
नहीं, क्यों क्या हुआ? शंकर देवा ने पूछा?
महाराज, दो दिन से पुलिस ही पुलिस है, समझ में नहीं आ रहा मामला क्या है?
हां, यह बात तो है। मैंने भी देखा है, पर बेटा हुआ क्या है? मैं देखता हूं।
पंडित जी हमारा जी तो ऊपर को आ रहा है। छोटे-छोटे बच्चे हैं हमारे, मिसेज तंवर उनके साथ हां में हां मिलाते हुए बोलीं।
हां, मांजी देखूंगा, आज ही पूछता हूँ थानेदार से?
इस संवाद के बाद आरती का कार्यक्रम समाप्त हुआ। महिलाएं गुटों में एक-दूसरे से सटकर चलती हुई, अपने घरों को रवाना हो गईं। समय बहुत खराब है। एक-दो महिला अकेली घर जाए और रास्ते में घुमती पुलिस....। हे भगवान!, अब या तो इस कलियुग को खत्म कर दे या फिर हमें उठा ले, बडबडाते हुए पंडित जी ने भी आरती की दीया मां, दुर्गा के चरणों में समर्पित कर घर की राह पकडी।
पंडित जी अपनी उधेड-बुन में मंदिर से निकलकर सीधे घर की और चल पडे। थोडी दूर चले तो दो-तीन पुलिस के जवान उन्हें घूरते हुए नजर आए। पास पहुंचे तो एक ने हाथ देकर रोक लिया। मानो किसी मोटरसाइकिल का चालान करना हो। गनीमत यह कि पंडित जी चाबी से नहीं चलते हैं, इसलिए उनकी चाबी नहीं निकाली। एक जवान बोला-ओए, कहां से आ रहा है?
जी, मैं वहां पर पूजा-पाठ करता हूं। प्रातः-शाम
का नियमित।
अच्छा तो तू पंडित है? क्या नाम है तेरा?
जी, पंडित तो क्या? मैं तो बस आरती का दीया घुमा लेता हूं। ऐसे मेरा नाम राजेश यादव है।
वाह-वाह क्या बात है। यादव और मंदिर का पुजारी? पुलिस वालों ने फिर मखौल उडाया। लगा जैसे कुत्ते का हाथी बनाने का प्रयास किया जा रहा हो? अच्छा, जा चल अपना रास्ता देख।
पंडित जी उनका आदेश ले घर की ओर लौट चले। वे जा तो घर ही रहे थे, लेकिन मन में यही उधेडबुन थी कि मामला क्या है? पुलिस वाले जब मेरे साथ ही ऐसा व्यवहार कर रहे हैं तो औरों के साथ क्या करते होंगे? मन कहीं और कदम कहीं और? एकाएक किसी ने पीछे से उनकी पीठ पर हाथ दे मारा। पलटे तो देखकर माथा चकरा गया। सामने मंदिर के पास पले कुत्तों का झुंड था और आगे एक मोटरसाइकिल वाला ची...ईईई करके रुक गया।
क्या पंडित जी दिखाई नहीं दे रहा आज? इन कुत्तों से इतना मोह जो आगे की सुध ही नहीं है? अरे, खुले कुत्ते लेकर क्यों चल रहे हो? पालना है तो इनके रस्सी बांधो। क्या हुआ बेटा? पंडित जी घबरा गए। बेटा कोई गलती हो गई क्या?
गलती हो गई...? चिढाता सा हुआ युवक खीजता हुआ आगे बढ गया। पंडित जी की जान में जान आई। कुत्ते और पंडित जी नार्मल होकर फिर चल पडे। थोडी दूर चलकर समझ में आया अगर सिंटू पंजा नहीं मारता तो आज वे उस मोटरसाइकिल वाले के कारण मरघट पर होते। सही है कुत्तों में अभी इंसान का खून नहीं पहुंचा है, इसलिए उनमें वफादारी बाकी है।
पिछली होली की बात है, जब पूरी कॉालोनी मंदिर पर एकत्र हुई तो हँसी-ठठा के बीच कई ऐसी बातें हो गई थीं जो नहीं होनी चाहिए थीं। चुटीली बातें डॉक्टर रामभजन को लग गई थीं। लोगों ने उन पर कमेंट किया था-घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने। रामभजन नाराज थे और उनके साथ ही चेतना भाभी भी। चेतना भाभी ने कह दिया था-पैसे लेते हैं तो कम से कम एक गुजिया तो खिला देते? किसी पर इस बात का कोई असर नहीं पडा था। ऐसी कई बातें थीं जो पुलिस के घूमने के पीछे घूम रहीं थीं। पर जब भेद खुला जब तब सबकी आंखें फटी की फटी रह गईं। पता चला पुलिस भाई साहब के कुत्ते को तलाश रही है। क्यों यह किसी की समझ में नहीं आया।
भाई साहब कॉलोनी के बडे व्यक्ति थे। पिताजी मंत्री और खुद भाई साहब कलेक्टर के पद से रिटायर हुए थे। वह बहुत बडे राजनीतिक भी थे। विशेषता यह जहां पर झगडा हो वहां पर वह हाजिर। चाहे घर का हो या फिर लडकी छेडने का। यहां तक की कोई सडक पर पान खाकर थूक दे तो वह पूछ लेते थे-कहां रहते हो तुम? पडौस की किसी कॉलोनी का हो तो वह समझ ही नहीं पाता था कि उसका कसूर क्या है? भाई साहब के हमदम भी कम नहीं थे। एक फोन पर हाजिर। पुलिस के कारिंदे तो उनके हुकुम को बजाने के लिए बेताब रहते थे। दूसरे सरकारी विभागों के अधिकारियों का तो कहना ही क्या? हालात का अंदाज इसी से लगता है कि कोई भी कार्यक्रम उनकी अनुमति के बिना संभव ही नहीं था। कॉलोनी का विभीषण उनका सबसे बडा राजदार था। यह उपाधि कॉलोनी के एक आदमी को उसकी पत्नी ने ही दी थी। वह अपने पति की कई बातों से दुखी रहती थी। पत्नी के सामने कैसे बोले कोई लिहाजा, विभीषण की उपाधि उन सज्जन ने सहर्ष स्वीकारी ली थी।
खैर, कुत्ता खोजने के पीछे जो बात थी वह यह थी कुत्ता कई दिन से मिल ही नहीं रहा था। और कुत्ता किसी और का नहीं, खुद भाई साहब का। उन्हीं भाई साहब का जो कॉलोनी के सबसे बडे हमदर्द थे। जिनके दम पर वहां रह रहे लोगों की जिंदगी चलती थी और अगर वह नहीं होते तो शायद वहां भूत हनुमान चालीसा पढते।
भाई साहब का कुत्ता चंचल, चपल। वफादारी में उन जैसा ही। उसे घुमाने के लिए उनके हमदर्दों में होड रहती थी। कई बार तो उसके लिए मारपीट की नौबत तक आ गई थी। रामनवमी पर जब डांडिया हो रहा था तो वह भी मंच के पास बंधा था। लोगों का मानना था कि भाई साहब तभी यहां पर रह पाएंगे जब उनका कुत्ता मौजूद रहेगा। उसके लिए आइस्क्रीम आदि की विशेष व्यवस्था थी। व्यवस्थापकों को पता था कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो पता नहीं भाई साहब क्या कर बैठें?
पंडितजी कुत्ते को लेकर बहुत संवेदनशील थे। खुद उनके द्वारा मंदिर परिसर में तंत्र-तंत्र कर खिलाए गए प्रसाद को उनके पाले कुत्ते ही ग्रहण करते थे। कितनी औरतें थीं जो बच्चा पैदा कराने के लिए वहां पर भैंरु जी को भोग लगाती थीं। कुछ लोग ज्योतिषियों के कहे अनुसार कुत्तों के लिए चुपचाप मिठाई आदि रात को रख जाते थे। पर बच्चा कोई कुत्ता थोडे ही पैदा करवा सकता था, इसलिए पंडित जी पर उन औरतों की विशेष कृपा दृष्टि बनी रहती थी। वे कभी पंडित जी को कोसतीं, साला-हरामी जात देखी है अपनी... और बना फिरता है पुजारी। पोंगा पंडित कहीं का। इसी कमीने के कारण हनुमान जी हमारी नहीं सुन रहे। कभी-कभी तो बात यहां तक हो जाती थी कि कॉलोनी में जब तक यह पंडित रहेगा तब तक ऐसी विपदाएं आती रहेंगी। मालूम पडता था कि सारी विपदाओं के लिए जिम्मेदार शंकर देवा और मूर्ति बन बैठे हनुमान जी ही थे। ऐसे पंडित जी ही क्यों, वहां आने वाले भी मंदिर परिसर में पले कुत्तों को शनि का दूत मानते थे। हां, एक-दो लोग जरूर उनसे दुश्मनी निकला लेते। मौका पाकर उनके लात मार देना, पत्थर मार देना। ऐसे लोगों का बहाना ही तो चाहिए होता है। जब-तब ऐसी बातें होती थीं कि यह भगवान को गंदा करते हैं? पर कोई यह नहीं देखता था कि भाई साहब का कुत्ता कितना खतरनाक है। प्रातः जब भाई साहब उसे घुमाने ले जाते थे, तो वह कब भडक जाए वह खुद नहीं समझ पाते थे।
बात बहुत पुरानी नहीं है। दीवान रामतीर्थ की बहू अपने छोटे बच्चे के साथ दूध लेने सरस डेयरी चौराहे पर जा रही थी। तभी भाई साहब के कुत्ते ने उस हमला कर दिया। भाई साहब तो शहर में थे नहीं। कुत्ते को घुमाने के लिए बिग्रेडियर बाबू के पिताजी अंगूर सहाय ले गए थे। खुद कुत्ते के आगे सहाय साहब लाचार थे, पर स्वामीभक्ति थी, लिहाजा अपना कर्म जरूर करते थे।
इधर कुत्ता दीवान जी की बहू पर लपका, उधर उसके हाथ से बच्चा छूटकर सडक पर गिर गया। दूध की बोतल और साडी उससे संभली नहीं। जरा सी देर में मजमा आ जुडा। कुछ दयाभाव से थे, बेचारी की मदद कर दें और कुछ नेत्रभक्ति के लिए। चलो इसी बहाने कुछ दर्शन हो जाएंगे। यूं भी दीवान जी की बहू गजब की दर्शना थी। शरीर देखते ही बनता था। दीवान जी के मिलने वाले कई तो इसीलिए उनके घर जाते थे कि इसी बहाने वह नजर आ जाएगी। पर वह कम ही सामने आती थी, हां जिसको दिख जाती उसका वह दिन सकारथ हो जाता था। उस दिन वह कृतार्थ हो जाता था। लोगों ने उसे जैसे-तैसे हौसला बंधाकर घर पहुंचाया। उसके घर पहुंचते ही उसकी यह हालत देखकर हल्ला मच गया। दीवान जी को लगा कि यह किसी शोहदे का काम है। चौपाल पर बैठे पंच भी भडक उठे, पर जब बहू ने सारी कहानी कह सुनाई तो सभी इस बात पर नाराज हुए कि यह भी कोई बात है? कुछ न कुछ तो करना ही पडेगा इस कुत्ते का, नहीं तो यह हमारा जीना दूभर कर देगा। तमाम माथाफोडी के बाद तय हुआ कि इसे कम से कम घुमाने ले जाया जाएगा। भाई साहब ने भी यह बात मान ली थी।
भाई साहब ने लोगों की बात तो मान ली पर वह उसे हजम नहीं कर पा रहे थे। उनके आगे दूसरे अपनी बात मनवा लें यह कैसे हो सकता था। उन्हें समझ में आया कि यह हो न हो किसी उनके खास आदमी का ही काम है। हमदर्द, सक्रिय हो गए। कभी इस चौराहे पर तो कभी किसी की बैठक में। मंदिर में भी दोनों समय दंडवत करने के लिए लोगों की भीड जमा होने लगी। पंडित जी भी समझ नहीं पाए कि यह क्या हो रहा है। जो लोग मंदिर को योजना का दफ्तर मानते थे वह अब इसे पूजाघर कैसे समझ रहे हैं। भाई साहब का विरोधी गुट भी पूरी तरह से अपने रंग में था। वह इस मौके को छोडने में अपनी हेटी समझ रहा था। उसने रोज नए पैतरे चलने आंरभ कर दिए। कभी सूचना पहुंचती यह काम सूर्यप्रताप का है और श्रीमातम के द्वारा प्रायोजित है। कभी इसे रागिनी मैडम से जोडा जाता। पर भाई साहब किसी मुकाम तक पहुंच ही नहीं पा रहे थे। आखिर उन्होंने अपनी नाक कटाकर सगुन बिगडवाने की सोच ली थी।
पुलिस की खोज जारी थी। इस बीच एक घटना यह हो गई कि मोहल्ले के दूसरे कुत्तों ने सडक छाप एक कुत्ते को फफेड दिया। सूचना हैजे की बीमारी की तरह तेजी से वायरल हो गई। भाई साहब के साथ ही उनके हमदर्द और इलाके के डीएसपी भी आ धमके। उन्हें देखते ही भीड धूप निकलने के बाद छंटे कोहरे की तरह छंट गई। एक कांस्टेबल आगे बढा-सर जरा डंडा देना देखूं अपना ही तो नहीं है? कहकर उसने डीएसपी से डंडा लेकर कुत्ते का उल्टा-पल्टा। भाई साहब किसी अनहोनी के डर से दूसरी तरफ देख रहे थे। जब उन्हें कांस्टेबल ने देखने को कहा तो एक हल्की नजर देखी। नहीं, यह नहीं है हमारा? कहकर वह संतुष्टि के भाव से भीड को देखने लगे। भीड की थोडी हिम्मत बंधी। चलो, एक विपदा तो आने से टल गई। पर कुत्ते को तो मिलना ही चाहिए, इसलिए उसकी खोज फिर से आरंभ हुई। एक योजना यह सामने आई कि उसके पोस्टर चिपका दें, लेकिन भाई साहब ने इसके लिए मना कर दिया। लोगों का अच्छा नहीं लगेगा। ऐसी कई योजनाएं सामने आई। हर एक यह कहकर खारिज हो गई कि इसमें दम नहीं है। आखिर में विभीषण ने भाई साहब को समझाया कि क्यों न हनुमान जी से मदद मांगी जाए? वे जरूर मदद करेंगे। बात सोलह आने सच थी। तय पाया गया कि मंगलवार को हनुमान जी को मदद का परवाना भेजेंगे। पूरे कार्यक्रम की तैयारी कर ली गई।
भाई साहब सारी योजना बनाकर घर पहुंचे। मन आज कुछ हल्का था। कुत्ता मिल नहीं रहा था लेकिन हनुमान जी के माध्यम से कुत्ता मिलने की आशा बंध चुकी थी। बाहर से ही पत्नी को आवाज लगाई - जरा पानी पिला दो? और हां छत पर ही दे देना मैं वहीं पर हूँ। पत्नी से निवेदन कर भाई साहब धीरे-धीरे छत की ओर जाने लगे। छत पर पहुंचते ही उनके होश उड गए। जवान हल्क से चिपक गई। देखते ही आंखें भर आई। जगह-जगह कबूतरों के पंख पडे थे और उनका कुत्ता उनके सामने दुम हिलाता हुए दांत दिखा रहा था। ?
३९७, पत्रकार कॉलोनी, मानसरोवर, घौलाई, जयपुर (राज.)
मो. ८७६९०८५३८०