बडे लोग

मीनू त्रिपाठी


‘‘सुरेखा, आज चंदा आई है क्या...?’’ तृप्ति ने बालकनी से झांककर अपनी पडोसन से पूछा तो जवाब मिला, ‘‘वो अपनी बेटी की ससुराल गई है। दो-चार दिन की छुट्टी समझो।’’ ‘‘पर क्यों’’ ‘‘तृप्ति ने हैरानी से पूछा तो सुरेखा बोली, ‘‘अब क्या पता... इधर कुछ दिनों से वो परेशान सी लगती थी। शायद उसकी बेटी की ससुराल में कुछ झंझट चल रहा है।’’ सुरेखा की बात पर तृप्ति मन ही मन कुढकर बोली, ‘‘झंझट में तो मैं पड गई।’’ चंदा के ना आने की खबर सुनकर उसका दिल बैठ गया। दो-चार दिन नहीं आएगी। यह सोचकर गुस्सा आने लगा था। पूरा घर अस्त-व्यस्त था। कहां से काम शुरू करे समझ ही नहीं आ रहा था।
‘‘चंदा तुम्हारा काम बिलकुल साफ नहीं है।’’ कहने वाली तृप्ति आज उसकी अहमियत को समझ रही थी। जितनी देर वो काम करती है तृप्ति उसके काम को लेकर टोकती रहती थी। पर आज ऐसा लग रहा था कि वो आए और तृप्ति चुपचाप आंखें मूंदे बैठ जाए... साफ-सुथरे घर और रसोईं को देखने के लिए तरसी आंखें सच में मुंद गई थी। पहले से बता कर जाती तो उसके इंत*ाार में घर को यूं ही फैला ना छोडती। रसोईं के बर्तन धोती तृप्ति के कानों में जय की आवा*ा आई, ‘‘अमोदिनी बुआ का फोन आया था।’’ ‘‘क्यों...’’ तृप्ति के पूछने पर जय रसोई में ही चले आये... ‘‘दोहरी खुशी है, पहली, मृदुला अपनी ससुराल वापस जा रही है; दूसरा फूफाजी के चुनाव पास है। ऐसे में कुछ अपने खास लोगों को बुलाया है। उनमें हम भी हैं। चुनाव की कुछ *ाम्मेदारी देना चाहते होंगे।’’ जय की बात का तृप्ति ने कोई जवाब नहीं दिया तो जय कुछ पल रुक कर दोबारा बोला, बडे दिनों बाद अमोदिनी बुआ की आवा*ा से खुशी झलक रही थी। आखिरकार मृदुला अपने ससुराल जाने को तैयार हो गई।’’ ‘‘मतलब कुएँ में कूदने का मन बना लिया उसने... या जबरन सबने उसको तैयार कर लिया कि तुम कुएँ तक पहुँचो धक्का हम लगा देंगे।’’ तृप्ति के इस तरह बोलने पर जय विचलित होकर बोला ‘‘कैसी विचित्र बातें कर जाती हो तुम.. कल उनके घर में ऐसी कोई क्रांतिकारी-ऊटपटांग बात मत कर देना। दस तरह के लोगों में कुछ दूसरी पार्टी के भी लोग हो सकते हैं। चुनाव के दिन आने वाले हैं। मृदुला को लेकर ऐसा कुछ न कहना जिससे उनकी साख खतरे में पड जाए। मत भूलो, वो बडे लोग हैं, कल को सुधाकर फूफा विधायक बने तो हमारे भी काम आएंगे। वो हर बात को लेकर सावधानी बरत रहें हैं इसीलिए समय से मृदुला को ससुराल भेज रहे हैं। ताकि विरोधी पक्ष को उनके खिलाफ कोई मुद्दा न मिले। मृदुला को लेकर पहले ही फूफा जी की काफी छीछालेदर हो चुकी है।’’
‘‘जय प्ली*ा, आफ मुंह से ये सब सुन कर मुझे अच्छा नहीं लग रहा है... व्यवहारिकता के नाम पर हम गलत का साथ नहीं दे सकते हैं। मृदुला को लेकर इधर-उधर की बातें करने वाले बेवकूफ होंगे। तुम्हें कुछ पता भी है। कैसे मृदुला की ससुरालवालों ने मानवीयता की सारी हदें पार कर दी थी... दहेज को लेकर जिनका मुंह सदा खुला रहा। समाज का डर उन्हें होना चाहिए, मृदुला जैसी गुणी लडकी की महेंद्र ने कोई कद्र नहीं की। आए दिन उसकी कोई ना कोई मांग सुधाकर फूफा पूरी करते रहे। मुझे तो ताज्जुब है कि माता-पिता होकर भी कैसे भूल गए बुआ-फूफा मृदुला की दुर्गति... उन लोगों ने मार-पिटाई के साथ खाने तक को तरसाया था। जब गर्भवती हुई तो जबरन भू*ण जांच करवाई... उसका बच्चा सिर्फ इसलिए गिराना चाहते थे, क्योंकि वह लडकी थी। आज के *ामाने में ऐसी दकियानूसी सोच... बडे लोगों के घर में ऐसी छोटी मानसिकता रखने वाले लोगों को देखकर आश्चर्य होता है। वो तो मृदुला की हिम्मत थी जो ऐसा नहीं होने दिया और माएके चली आई। अब वापस उसी नरक में जाने को तैयार कैसे हुई।
विश्वास नहीं होता कि कुलीन कहे जाने वाले घरों में ऐसी कुरीतियां दबे-ढके चल रही हैं। तुम्हें जाना है तो जाओ, मैं इस पाप का हिस्सा नहीं बनूंगी।’’
‘‘ओहो तुम तो हर बात पर अड जाती हो, अब तो सब ठीक है... मृदुला को वो खुशी-खुशी ले जा रहे हैं। बुआ बता रहीं थी कि अब उनके समधियाने में भावी संतान के लिये बेटे-बेटी का कोई विवाद नहीं है। महेंद्र की समझ में भी सही-गलत आ गया है। वैसे भी फूफा जी के चुनावी वादों में बेटियों की सुरक्षा सबसे अहम है ऐसे में अपनी बेटी की सुरक्षा नहीं करेंगे क्या..’’ ‘‘अरे छोडो! लोग क्या समझते नहीं हैं, चुनाव सिर पर हैं खुद की मायके बैठी बेटी कहीं उनके चुनावी वादों की पोल ना खोल दे इसलिए अपने दामाद से सौदा किया है कि तुम हमारी बेटी का ध्यान रखो हम तुम्हारे घर को धन-दौलत से भरते रहेंगे। ये रिश्वत नहीं तो और क्या है।’’ ‘‘बस करो तृप्ति, तुम ओवररियेक्ट कर रही हो.. क्या उनके बीच सब कुछ ठीक नहीं हो सकता है। पर तुम्हें तो मृदुला के ससुराल वालों और बुआ-फूफा के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका चाहिए...’’ जय की बात का जवाब दिए बगैर तृप्ति दूसरे कमरे में चली गई। चंदा के ना आने से मन पहले ही अशांत था। बची-खुची कसर जय के साथ हुई बहस ने पूरी कर दी थी। रात तक ना जाने की कसम खाने वाली तृप्ति दूसरे दिन सुबह तक जय के साथ अमोदिनी बुआ के घर जाने को तैयार हो
गई थी।
अमोदिनी बुआ के घर अच्छा खासा जमावडा लगा था। बेटी माएके में रह रही है ये चिंता मानो आम हो गई थी। रिश्तेदारों के अलावा नेता किस्म के लोग भी थे। सलाह-मश्विरा चल रहा था। मृदुला की ससुरालवालों के पौ-बारह थे। बिना मांगे उनकी मुराद पूरी हो रही थी। चुनाव के दिन न*ादीक थे, सो फूफाजी कोई खतरा उठाना नहीं चाहते थे। उनकी इस नस को मृदुला के ससुराल वालों ने पकड रखी थी। सभी के एक सुर थे-चलो मृदुला को लेने महेंद्रजी आ रहे हैं वरना बेवजह सुधाकर के नाम पर बट्टा लगता... ‘‘बट्टा लगने की चिंता में हम कहीं हम मृदुला के भावी जीवन का बंटाधार कर दे।’’ तृप्ति के मुंह से निकला ही था कि सबने उसे खा जाने वाले न*ारों से देखा। बुआ बोल रही थी, ‘‘जो मृदुला की किस्मत में था उसे मिला... घर में उसके अलावा दो और भी बच्चे हैं कल को उनके भी घर परिवार बसने हैं... अब उसकी वजह से मीनल और सोयम की *ांंदगी को अनदेखा नहीं कर सकते हैं फिर तुम्हारे फूफा... उनका नाम-इज्जत... बहुत सारी बातों का ख्याल रखना पडता है। वरना रिश्ते बिगाडने में क्या देर लगती है।’’ बुआ की हाँ में हाँ मिलाने में सबने फुरती दिखाई थी। जानते थे एक महीने बाद फूफा विधायक बन गए तो काम निकलवाने में यही बुआ सेतु का काम करेंगी। सभी में उनके शुभचिंतक होने की मानो होड लगी हुई थी। तृप्ति कुछ और बोले उससे पहले जय ने इशारे से उसे चुप रहने के संकेत दिया।
रात को तृप्ति मृदुला से मिलने उसके कमरे में जाने लगी गई तो वहाँ महेंद्र और फूफा तो वहां फूफाजी महेंद्र के वार्तालाप के अंश कानों में पडे-फूफा महेंद्र को आगाह कर रहे थे, ‘‘देखो महेंद्र, तुम्हारे लिए इतना सब कुछ किया है तो अब कोई चूक नहीं चाहिए। तुम्हारी सारी बातें मैंने मान ली है सो अब कोई तमाशा होनी नहीं चाहिए... मृदुला तुम भी खयाल रखना, घर की बात चहारदीवारी से बाहर नहीं जानी चाहिए... जब तक चुनाव नहीं हो जाते तुम यहाँ मत आना...’’ तृप्ति के पाँव मानो जम गए थे.... सुधाकर फूफा अब भी बोल रहे थे ‘‘महेंद्र, तुम ध्यान रखना कि मीडिया में या कहीं बाहर भूल कर भी ये बात ना आए कि मृदुला अपनी बेटी की जान बचाने के लिए माएके आ बैठी थी।’’ ‘‘नहीं पापा, मृदुला को कोई परेशानी नहीं होगी गारंटी देता हूं।’’ तृप्ति का मन कसैला हो गया था। वह वहीं से उल्टे पैर वापस हो ली। जय से अपनी तबियत खराब होने का बहाना बनाकर अपने अपने घर जाने की इच्छा जाहिर की। बुआ-फूफा खुद भी चाहते थे कि तृप्ति वहां उपस्थित ना रहे। चलते समय तृप्ति मृदुला से मिली तो मृदुला ने रोते हुये कहा, ‘‘मम्मी-पापा को मुझसे *यादा अपने नाम-और इज्*ात की परवाह है। अब तो खुद के लिए कुछ करना पडेगा.... मेरी जिद पर मेरी बेटी इस संसार में आ तो रही है लेकिन उसके भविष्य के लिए चिंतित हूं। ये समझ गई हूं कि अपनी बेटी के लिए मुझे ही लडना होगा। फिलहाल तो वो सही-सलामत संसार में आ जाए बस... इस घर से मुझे कोई मदद नहीं मिलेगी। पापा हर हाल में चुनाव जीतना चाहते हैं.. मेरी बलि देकर तो यही सही...पर बेटी पर आंच नहीं आने दूंगी... ‘‘देख मृदुला अब हिम्मत हारने का समय नहीं है...’’ घुटी-घुटी हिचकियों के साथ तृप्ति के गले लग गई थी।
मृदुला से मिलने के बाद तृप्ति का मन भारी हो गया। घर वापस आते समय तृप्ति को चुप देखकर जय ने कहा, ‘‘तृप्ति, सिर्फ तुम्हें ही नहीं, मुझे भी बुरा लग रहा है। उसका ब्याह जल्दी रचाकर उसकी छीछालेदर कर दी है। खैर अब उसे दिक्कत नहीं होनी चाहिए। सुना है, सुधाकर फूफा ने नयागाँव वाला पेट्रोल पंप महेंद्र के नाम कर दिया है।’’ तृप्ति ने जय की बात का कोई जवाब नहीं दिया। रात देर तक उसे मृदुला का चेहरा याद आता रहा। कितने खुदग*ार् हो गए थे अपने ही पिता, ताकत और शोहरत के आगे अपनी ही बेटी का सौदा करके कितनी आसानी से उस पर लोक-व्यवहार का मुलम्मा चढा दिया। थकी हुई तृप्ति को देर रात नींद आई। सुबह कॉलबेल की आवाज से आंख खुली तो सामने खडी चंदा को देख उसकी बांछें खिल गई। लगा ढेर सारी खुशियों ने उसके साथ प्रवेश ले लिया हो। ‘‘कहाँ चली गई थी, घर की देख क्या हालत हो गई है।’’ तृप्ति की बातों पर बिना किसी प्रतिक्रिया के वो चुपचाप अपने काम में लग गई। ‘‘क्या हुआ सब ठीक तो है ना...’’ ‘‘ क्या बोलूं मेमसाब, सब ठीक कहाँ है ? पर शायद, अब ठीक है।’’ एक पल को उसने आंखें बंद की फिर इस तरह खोली मानो सामने का नजारा कुछ साफ नहीं हो। असमंजस में भरी फिर बोली, ‘‘मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।’’ चंदा की उलझी उलझी बातें तृप्ति की समझ से बाहर थी। ‘‘क्या हुआ, साफ-साफ बता ना...’’ तृप्ति के पूछने पर बुझे शब्दों में बोली, ‘‘निधी घर आ गई है... मतलब हमेशा के लिए उसे लिवा लाए हैं।’’ ‘‘क्या हो गया?’’ तृप्ति ने सहानुभूति से पूछा तो चंदा आंसुओं को रोक नहीं पाई भरे गले से बोली, ‘‘क्या बताऊं मेमसाब, सोचा था समय से बेटियों का ब्याह कर निपटा दूंगी पर ये निपटाना बडा महंगा पडा। इस एक साल में मेरी बच्ची ने क्या नहीं सहा है। मार पिटाई, अपमान क्या नहीं सहा निधी ने...’’ सुबकती हुई चंदा को देखकर उसने भरे मन से कहा, ‘‘मैंने पहले भी कहा था कि अभी वो छोटी है शादी मत करो पर तुम लोग सुनते कहाँ हो... ससुराल वालों को समझाने से बात बनेगी क्या... अगर बोल तो हम बात करें।’’ ‘‘ना मेमसाब, अब बहुत हुआ। गए तो थे उसके पति को समझाने पर वो कसाई समझने वालों में से नही है। निधी को ठीक से रखने की एवज में पैसा मांगा है दुष्टों ने। ब्याह में जल्दीबाजी दिखाकर एक गलती तो कर दी। अब और पैसा देकर दूसरी गलती नहीं होने देंगे... अपनी बेटी को अब उस नरक में नहीं ढकेलेंगे। जो थोडी बहुत जमापूंजी है उससे उसे आगे पढाऊंगी, इस लायक बना दूंगी कि वो खुद को भी पाले और अपने बच्चे को भी...’’ कहते हुए चंदा का चेहरा सख्त हो गया, बर्तन मांजते हाथों में सख्ती आ गई थी। ऐसा लगा मानो वो बर्तन नहीं कोई निर्णय हो जिसे वो अपने दृढ संकल्प से चमका रही हो। ‘‘क्या निधी पेट से है...’’ ‘‘तृप्ति ने संकोच से पूछा तो चंदा बोली, ‘‘हाँ मेमसाब, कसाई की बकरी सी हालत थी निधी की.. उसका मरद बोलता है कि बेटा ही जनना, जो बेटी जनी तो नहर में डुबो आएगा... न न मेमसाब, बेटा या बेटी; निधी अब उसे अपने दम पर पालेगी।’’ तृप्ति का जी सहसा काँप गया ऐसा लगा जैसे वो निधी की नहीं मृदुला की बात कर रही हो। ‘‘मेमसाब जी मैंने ठीक किया न....’’ चंदा के कहने पर तृप्ति चौंककर बोली, ‘‘बहुत ठीक किया। इससे अच्छा निर्णय कोई और हो ही नहीं सकता था। हमारी कभी भी कोई मदद चाहिए तो बेहिचक कहना...’’ तृप्ति की बात पर चंदा कुछ बोली नहीं... सहसा ये सोचकर तृप्ति फीकी हँसी हँस दी कि निधी मृदुला कैसे हो सकती है। जिसकी माँ चंदा जैसी हो उस बेटी की गति मृदुला जैसी कैसे हो सकती है। चंदा अभी भी बोल रही थी, ‘‘शादीशुदा बेटी मायके आकर बैठ जायेगी तो दस लोग बातें बनायेंगे....लेकिन क्या करें अपनी कोख जनी को लोगों के दर से अपने हाल पर तो नहीं छोड सकते हैं। औरों की तो बात दूर है निधी के बापू भी राजी नहीं थे कि निधी से उसकी ससुराल छते पर जब वो मेरे साथ गए उसकी दुर्दशा अपनी आँखों से देखी तो खुद ही लिवाए लाए लाये...’’ चंदा की बातें सुनकर तृप्ति ने उसे हौसला दिया, ‘‘चंदा तूने जो किया है उसे करने की हिम्मत बडे-बडों में नहीं होती है। अब जो फैसला ले लिया है तो उसके आगे समाज की मत सोचना...’’ यह सुनते ही चंदा बोली, ‘‘मेमसाब हम बहुत छोटे लोग हैं... समाज की हम चिंता नहीं करते। इनसे बढकर हमारा परिवार पति बच्चे हैं। इनका सुख-दुख मेरा अपना है समाज की चिंता करे बडे लोग... यहाँ तो संतान ही हमारी जागीर है। वो सुखी न हो तो
क्या फायदा...’’
चन्दा चली गई थी पर उसकी कही बातें देर तक तृप्ति के कानों में गूंजती रही, काश! सुधाकर फूफा और अमोदिनी बुआ के पास भी चंदा सा मन और सोच होती। काश! वो भी अपनी बेटी के दर्द को महसूस कर पाते... यकीनन चंदा के सामने वैसी महत्वाकांक्षाओं और झूठे मानसम्मान की मोटी दीवारें नहीं थी जैसी फूफा जी के सामने थी। तभी तो वह बेटी के मन को भेद पाई उसके हित को प्रमुखता दे पाई.... जबकि लाभ-हानि के पलडे में तौलकर किया गया मृदुला के जीवन का सौदा लोगों की तंगदिली का जीता जागता उदाहरण था। हानि के पलडे में तौलकर मृदुला की *ादंगी का किया सौदा ऊंचे लोगों की तंगदिली का जीता-जागता उदाहरण था।
चंदा चली गई थी। चिंतन में डूबी तृप्ति से जय पूछ रहे थे, ‘‘आज तुम्हारी बाई ने क्या बहाना बनाया ना आने का....’’ और दिन होता तो वह चिढकर बोलती, ‘‘इनके पास बहानों की कमी है क्या... आज ये, तो कल कोई और जाल-झंझट ले कर बैठ जाएंगे... ना आने का बहाना गढना इनके बाएं हाथ का खेल है।’’ पर आशा के विपरीत तृप्ति के मुंह से निकला ‘‘आखिर उसका भी घर है... अपना घर परिवार देखने के लिए कभी छुट्टी ले ली तो क्या आफत आ गई...’’
जय कुछ और पूछते उससे पहले वह बोली, ‘‘कितना आश्चर्य है कि इनके घर छोटे पर दिल बडे होते हैं। वहीं बुआ-फूफा जी सरीखे लोगों के दिल कितने छोटे होते हैं ना... काश! फूफाजी और अमोदिनी बुआ का दिल उनके घर की तरह बडा और सोच विस्तृत होती तो कितना अच्छा होता। अपनी मृदुला का जीवन भी निधी की तरह संवर जाता।’’ जय किसी और विवाद में पडने से पहले वहाँ से चले गए। तृप्ति सोच रही थी क्यों नहीं बुआ और सुधाकर फूफा अन्याय के खिलाफ लडने के लिए चंदा जैसी हिम्मत जुटा पाए। शायद उनकी स्वार्थ लोलुपता ने उनकी हिम्मत को क्षीण कर दिया था। निधी किस्मतवाली है जो छोटे घर में जन्मी... कम से कम उस छोटे घर में उसकी किस्मत और भविष्य संवारने का ऊंचा *ाज्बा रखने वाले लोग तो हैं.... जो तथाकथित बडे लोगों से साफ और ईमानदार सोच रखने वाले हैं। ?
ष्/श्ा कर्नल पी एस त्रिपाठी
२८१/२ रुड्डद्मद्ग ष्टश्ाह्वह्म्ह्लह्य, श्वद्मद्यद्बठ्ठद्द त्रड्डह्म्द्ध रूद्बद्यद्बह्लड्डह्म्4 स्ह्लड्डह्लद्बश्ाठ्ठ
स्रड्डद्बश्चह्वह्म्-३१३००१ (ऋड्डद्भ.) रूश्ा. ०९६७४९४०१०६