दस का नोट

मुरलीधर वैष्णव


‘‘हा...हा...हा...दादी...ही...ही...दादी...ह....दा...दी...’’ साराह अपना पेट पकडे हँसी के मारे दोहरी हुई जा रही थी। क्या हुआ छोरी!...ऐसे क्यूं हँसे जा रही है ? लेकिन साराह की हँसी के मानो ब्रेक ही फेल हो गये हों।
‘‘छोरी, तू बावळी हो गई है क्या। कुछ बताएगी भी कि हुआ क्या है।’’ दादी भी उसे इस तरह हसते देख मुस्करा उठी। हँसी भी कैसी मिठी छूत की बीमारी(?) है!
‘‘बताती हूं... बताती हूं...। पडौस में जो गांव के पटवारी जी रहते हैं न....’’ वह बात पूरी करने से पहले बीच-बीच में फिर हँसने लगती। ‘‘अभी अभी पता चला है कि पटवारी जी बाथ रूम में स्नान करके जब अपना कच्छा पहन रहे थे तब कच्छे में छिपे बिच्छू ने उन्हें डंक मार दिया।’’ साराह ने अपनी हसी को मुश्किल से रोका।
‘‘ओह, यह तो बोत बुरा हुआ छोरी! और तू हँस रही है।’’ दादी ने साराह को यह कह तो दिया लेकिन कुछ क्षण बाद वह खुद भी हँस पडी। लेकिन उसी के साथ तुरंत ही उसने अपने बेटे यानि साराह के पापा को बुला कर अपनी कार में पटवारी जी को पास ही के कस्बे के अस्पताल में पहुंचाया।
साराह, आई.आई.टी. की तृतीय वर्ष की छात्रा, दिवाली की छुट्टियां में अपने घर जोधपुर आई हुई थी। कल वह अपने भतीजे के झडूले (मुंडन संस्कार) के लिए अपनी दादी व पूरे परिवार के साथ अपने पुश्तैनी गांव नेवरा-बालाजी आई हुई थी। वह गौर से देख रही थी कि दादी कितने प्यार और उत्साह से वहां अपने ग्रामीण रिश्तेदारों से बतिया रही थी। साराह को उनसे मिला रही थी। दादी की बुजुर्ग देवरानी ने उसके सिर पर जिस ममत्व से हाथ रखा, उसे ऐसा लगा जैसे उसके आशीर्वाद की किरणें सीधे उसके भीतर उतर रही हैं।
मुंडन-संस्कार के बाद दादी ने अपने थैले में से दस के नोटों की दो की कडका कडक गड्डियां निकाल कर ढोल बजाने वालों व गांव के बच्चों में बडी उदारता से बांटी थी।
गांव से लौटने से पहले दादी ने साराह को बतलाया कि उसके दादा के संग विवाह के बाद वह लंबा सा घूंघट निकाले इस गांव में बालाजी के मंदिर में जातें (फेरी) देने आई थी। उसने साराह को वह गुवाडी भी दिखलाई जहां तब बने एक झूंपे में उसके दादा का जन्म हुआ था। उसकी जगह अब एक पक्का कमरा बन चुका था।
‘‘दादी, दादी, दस-दस के कडक नोट मैंने एक लंबे अरसे बाद देखे हैं। आपने सब को दस के नोट दिये, मुझे क्यों नहीं दिये...’’ साराह नन्हीं बच्ची सी मचल पडी।
‘‘अरे मेरी लाडेसर, तुझे तो दस लाख दूं तो भी कम है।’’ यह कहते हुए दादी ने उसे दस दस के दस कडक नोट उसके हाथ में थमाते हुए उसका माथा चूम लिया। साराह ‘थैंक्यू वेरी मच्च’ कहते हुए दादी से लिपट गई।
‘‘एक बात है दादी, गांव के हालात अभी अच्छे न हो लेकिन जो हन्ड्रेड परसेंट ऑक्सीजन यहां की हवा में मिलती है, देट इज समथिंग रेयर।’’ साराह ने जोधपुर के लिए कार से लौटते समय एक लंबी सांस लेते हुए कहा। दादी और पौत्री म अच्छी घुटती थी। दोनों एक दूसरे के अच्छे दोस्त थे। साराह तो कभी-कभी दादी से बडी अंतरंग बातें तक कर लेती थी। दादी को भी साराह से बेहद प्यार था।
‘‘दादी, सच बताना कि दादा ने आपको जिंदगी में कितनी बार ‘आई लव यू’ बोला। दादी ने यह सुनते हुए साराह की आंखों में उतरी शरारत को पढ लिया था।
‘‘चुप कर छोरी! एक चांटा पडेगा।’’ दादी ने उसकी तरफ देखे बिना उसे डांट लगाई।
‘‘दादी ‘प्ली...ज ... प्ली...ज दादी, बताओ न’’ साराह ने अपना मुंह कुछ ऐसे बनाया कि दादी पिघल गई।
‘‘एक बार भी नहीं बस।’’
‘‘रियल्ली, हाऊ मी...’’ कहना तो वह चाहती थी कि ‘हाऊ मीन ऑफ दादा’ लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई और उसने उसकी जगह ‘हाऊ बेड!’ कह कर दादी की तरफ देखा।
‘‘यह तो तुमने भी सुना ही होगा साराह कि आजकल के अनेक पति-पत्नी एक दूसरे को दिन में दस बार ‘आई लव यू’ बोलेंगे और दो-तीन साल में ही एक दूसरे से उकता कर तलाक के लिए अदालत के दरवाजे पर पहुंच जाएंगे। न उनमें आपसी विश्वास होता है न त्याग न धैर्य। फिर प्रेम कहां से होगा। उस पर ये ‘लिव इन’ और ‘गे रिलेशन’ जैसी महानगरीय बिमारियां और फैल गई हैं। आजकल के लोग प्यार का अर्थ जानते ही कहां है। तेरे दादा के मौन आचरण में मेरे प्रति एक गहरा प्यार था। जब हमारा विवाह हुआ तब मैं साढे चौदह साल की थी और तेरे दादा उन्नीस साल के। मैं आठवीं पास थी और उन्होंने बी.ए. का इम्तहान दिया ही था। बहुत गरीबी और संघर्ष के साथ वे आगे बढ रहे थे। शुरू में एक राशन की दुकान पर साठ रुपये मासिक पगार पर काम करते हुए शाम को क्लासे*ा जोइन कर एलएलबी पास किया। फिर सरकारी विभाग में क्लर्क बने। दो साल बाद ही पब्लिक प्रोसिक्यूटर हो गये और मजिस्ट्रेट बन गये। इसी के साथ उन्होंने मुझे भी पढा कर बी.ए. पास करा दिया।’’ दादी यह कहते हुए कुछ क्षणों के लिए अपने मधुर अतीत के सागर में उतर गई थी।
‘‘दादा रिटायर्ड एज ए ग्रेट जज, देट आई नो दादी। बट बात तो प्यार की चल रही थी न। ये प्यार होता
क्या है?’’
‘‘ठीक से तो मुझे भी पता नहीं बेटा। लेकिन विवाह के बाद का हमारा वह किशोर-प्रेम दिव्य आकर्षण भरा था। बहुत ध्यान रखते थे वे मेरा। एक दूजे के प्रति हमेशा से अधीर से रहते थे हम।’’
‘‘आप दोनों के बीच कभी झगडा, हार-जीत ?’’
‘‘हां थोडा बहुत, कभी कभी। जहां तक हार जीत का सवाल है.... वो...’’
‘‘वो क्या दादी...’’
‘‘वे अहं से हार जाते मैं समर्पण से जीत जाती। एक प्रसंग याद आ रहा है साराह, इसे ध्यान से सुनना। एक बार नारद जी ने द्वारिकाधीश से पूछा कि क्या कारण है कि सर्वत्र ‘राधे राधे’ हो रहा है। आपकी महापटरानी रुक्मणि और अन्य रानियों को तो कोई याद भी नहीं करता। कृष्ण यह सुन कर नारद के सामने ही पलंग पर धडाम से गिर गये। नारद से बोले कि नारद मेरे सिर में तेज दर्द हो रहा है, तुम कुछ करो। नारद को आश्चर्य हुआ। वे बोले कि आप तीन त्रिलोकीनाथ हो। आप ही बताओ मैं क्या करूं । कृष्ण बोले, मेरे किसी सच्चे भक्त के चरणों की रज लेकर आओ। उससे मैं मेरे मस्तक पर लेप करूंगा तो दर्द ठीक हो जाएगा। नारद जी असमंजस में वहां से दौडे और सबसे पहले रुक्मिणी के पास जाकर उन्हें अपने चरणों की रज देने को कहा। रुक्मणि ने अपने पांव पीछे खींच लिए। वे बोली कि यह क्या कर रहे हो आप। कृष्ण मेरे पति है। मेरे चरणों की रज यदि उनके माथे पर लगी तो मुझे नरक में जाना पडेगा। यही जवाब अन्य रानियों ने भी दिया। नारद निराश हो गये और तुरन्त मन की गति से राधा के पास पहुंच कर उन्हें सारी बात बतलाई। राधा ने उनसे पूछा कि मेरे प्रभु को सिर दर्द हुए कितनी देर हो गई। नारद ने बतलाया कि यही कोई एक डेढ घडी हुआ है। इस पर राधा नारद जी पर नाराज हो गई। उसने कहा कि मेरे प्रिय को एक डेढ घडी से जो वेदना हो रही है उसके लिए आप जिम्मेदार हो। आप मेरे चरणों की रज जितनी ले जाना चाहो ले जाओ। उसके बदले में मुझे दस बार भी नरक जाना पडे तो मंजूर है। राधा की चरण रज लेकर नारद कृष्ण के पास पहुंचे। कृष्ण ने उस रज का अपने मस्तक पर लेप किया और सिर दर्द ठीक हो गया। कृष्ण ने नारद से पूछा कि कुछ समझ में आया कि सर्वत्र राधे राधे क्यों हो रहा है। नारद बोले कि हां समझ में आ रहा है प्रभु। और वह यह कि आप जिससे प्रेम करते हो उसे एक क्षण भी तकलीफ में नहीं देख सकते। चाहे उसके बदले में आप को कैसा भी त्याग क्यों न करना पडे। यही सच्चा प्रेम है।’’
साराह यह सुन कर अभिभूत-सी हो गई। उसे लगा मानो वह कुछ समय के लिए राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम-लोक में पहुंच गई है। दूसरी ओर उसे अपनी आई.आई.टी. संस्थान और महानगरीय आधुनिक माहौल के देह-प्रधान हालात् याद कर वितृष्णा होने लगी। वह यह सोच कर कभी कभी दुखी हो उठती कि वहां अधिकतर लडके लडकियां विवाह-पूर्व यौन सम्बंध, शराब व नशे की दवा लेने व रेव पार्टियों में जाने में अपनी शान समझते हैं। स्वयं उसे मालूम था कि उस जैसी कुछ लडकियां जो अपना कौमार्य बचाते हुए अपनी पढाई व कैरियर पर ध्यान देती है उन्हें वहां ‘बेहन जी’ ही कह कर चिढाया जाता है। हाल ही में हुई एक घटना को तो वह याद कर सिहर जाती है कि उनके संस्थान के टायलेट्स की पाइप लाइन इसलिए चॉक हो गई थी कि उसमें से करीब तीन-चार किलो व*ान के कन्डोम्स फंसे मिले थे।
हां, कुछ लडके भी ऐसे थे जो शराब व रेव पार्टियों से दूर रहते थे। अचानक वह ऐसे ही एक पारिवारिक जीव, किंतु सुदर्शन व्यक्तित्व के धनी, अपने सहपाठी, अभिषेक के बारे में सोचने लगी जो कुछ दिनों से उसे अच्छा लगने लगा था।
‘‘ऐ छोरी! कहां खो गई। कुछ दिन रहे हैं तेरी छुट्टियां खत्म होने में। यहीं मेरे पास बैठ। फिजीकली भी और... क्या कहते हैं...
‘‘मेंटली भी’’ साराह ने दादी की बात पूरी की।
साराह यह देख कर बहुत खुश थी कि दादी ने पूरे परिवार को एक सूत्र में बांध रखा है। वह व उसके दोनों बडे भाई भाभियां, और अपने माता-पिता के साथ शाम को वे अवश्य एक साथ बैठ कर खाना खाते हैं। होली, दिवाली आदि सभी त्यौहार-उत्सव साथ-साथ खुशी-खुशी मनाते हैं। कभी थोडी खटपट हो भी जाती है तो दादी के आगे सभी नत मस्तक हो जाते हैं। उनकी प्यार भरी सीख से सब ठीक हो जाता है। उसे परिवार के महत्व का गहरा एहसास होने लगा था। वह पांच साल की थी तभी उसके दादा गु*ार गये थे। उसे ठीक से उनकी याद भी नहीं थी।
आज दादी अपनी एक बीमार सहेली से मिलने जा रही थी। रास्ते में कार में उसने मुझे बतलाया कि उसके दादा ने ही उसे सिखाया कि कुछ बुजुर्ग रिश्तेदार व मित्र इतने अच्छे होते हैं कि वे आपको आगे बढता देख कर बहुत खुश होते हैं। वे हमेशा अपको आशीर्वाद देने के लिए तत्पर रहते हैं। बदले में वे आपसे कुछ नहीं चाहते। उनसे समय समय पर मिलते रहना चाहिये। उनके पास कुछ देर बैठना व उन्हें सुनना भी उनकी सेवा ही होती है।
दादी की अहैतुकी बात मेल-मिलाप की यह सीख साराह के भीतर गढे संस्कार-कोष में जमा हो चुकी थी। साराह अच्छी तरह समझने लगी थी कि समय तेजी से करवट ले रहा है। आज उसके पिता के व्यापार के कारण उसके दोनों भाई जरुर साथ रहते हैं लेकिन कल वह स्वयं इंजीनियर बन कर कहीं नौकरी करेगी। शादी होने पर अपने पति के साथ रहेगी। दोनों नौकरी पेशा होने पर शायद एक बच्चे से अधिक पैदा न कर पाएं। उससे अधिक बच्चों का पालन पोषण उनके लिए शायद संभव भी नहीं होगा। वह इस आशंका से भी वाकिफ थी कि आने वाले समय में मौसी, भुआ जैसे रिश्तों का अस्तित्व भी खतरे में होगा। लेकिन दादी के दिए संस्कारों से प्रभावित वह एक मर्यादित व सुखद गृहस्थी का सपना अवश्य पालने लगी थी।
साराह की छुटियां खत्म होने में दो दिन ही बचे थे। दादी उसके लिए बेसन के लड्डू व मठरी आदि बनवाने की तैयारी में लगी थी। साराह आज रात दादी की गोद में सिर टिकाए लेटी थी। दादी उसके बालों में हौले हौले अंगुलियां फेर रही थीं।
‘‘दादी एक बात तो आपको आज बतानी ही पडेगी... और वह यह कि मेरे ग्रेट दादा ने आपको सुहागरात पर मुंह दिखाई में क्या दिया?’’ साराह की आंखें फिर शरारत से नाचने लगी थी।
‘‘सुहागरात ? अरे छोरी, शादी के दो-तीन माह तक तो तेरे दादा मेरी छोटी उम्र को देखते हुए अपने हाथों में मेरे छोटे छोटे हाथ लेकर उन्हें व मुझे देखते ही रहते।’’
यह कहते हुए दादी के गाल इस उम्र में भी लज्जा से लाल हो गये।
‘‘री...य..ल्ली...! दादा वा*ा जस्ट ग्रेट... इट इज सिंपली इनक्रेडिबल...!’’ साराह उछल पडी।
आज सुबह ही दादी अपने बॉक्स-रूम में अपनी खास अलमारी को खोल कर नीचे फर्श पर बैठी एक बडे रूमाल में बन्धे पुलिंदे को देख रही थी उसमें रखे साराह के दादा के प्रेम-पत्रों को पढने में वह खोई हुई थी। कुछ पत्रों को पढने के बाद उसने अपने पति की जवानी का, बल्कि केवल उन्नीस-बीस वर्ष की उम्र का श्वेत-श्याम फोटो देखा और फिर करीब पचपन साल पहले की मीठी यादों में खो गई। वह फोटो एक बहुत पुराने दस के नोट में लिपटा हुआ था। दादी को उस अवस्था में कुछ पता नहीं चला कि कब साराह चुफ से आकर उसके पीछे चुपचाप खडी हो गई हो गई थी और सब कुछ देख रही थी।
अचानक बाज की तरह झपटा मार कर साराह उस फोटो और दस के नोट को ले उडी।
‘‘अरे रुक साराह बेटी! ऐसे मत कर। तुझे मेरी सौगन्ध मुझे यह फोटो व दस का नोट वापिस दे दे,
नहीं तो...’’
‘‘नहीं तो क्या...’’ साराह दादा की सुन्दर पासपोर्ट साइज फोटो व दस के नोट दादी के सामने लहराते
हुए बोली।
‘‘नहीं तो तू मेरा मरा हुआ मुंह देखेगी, समझ लेना।’’ दादी अधीर हो उसके पीछे धीरे धीरे भागती हुई पसीना पसीना हो रही थी। साराह को लगा कुछ खास गंभीर बात है।
‘‘अच्छा ठीक है। फोटो लौटा देती हूं। दस के नोट का क्या है, यह तो मैं रख लूं। अभी बाहर खडे सब्जी वाले से हरा धनिया मिर्च लानी है।’’
‘‘नहीं नहीं मेरा बच्चा, ऐसा मत कर। तू नहीं समझेगी। इस दस के नोट के बदले यह पांच सौ का नोट रख ले।’’ दादी ने साराह को पांच सौ का नोट दिखाते हुए कुछ इस कदर विनती की जैसे उस दस के नोट में उसके प्राण
बसे हो।
साराह को भी माजरा कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन वह समझ गई कि उस दस के नोट में कोई खास रा*ा जरूर छिपा है। वह अब दादी को अधिक परेशान नहीं करना चाहती थी।
‘‘चलो दादी, मैं इस दस के नोट को आपको लौटा देती हूं और इसके बदले में पांच सौ रुपये का नोट भी नहीं लेती। लेकिन इस दस के नोट का रा*ा तो आपको बताना ही पडेगा।’’ साराह उत्सुकतावश अधीर हुए जा रही थी।
दादी अभी भी हांफ रही थी। कुछ सांस लेने के बाद उसने उस दस के नोट को अपने हाथ में लेकर चूमा।
‘‘साराह, तूने एक बार पूछा था न कि तेरे दादा ने मुझे मुंह-दिखाई में...’’ आगे वह नहीं बोल सकी। उसकी आखों में दो आंसू निकल कर वहीं पलकों की कोरों पर ही ठहर गये थे। ?
ए-७७, रामेश्वर नगर, बासनी, जोधपुर-३४२००५ (राज.)
मो. ९४६०७७६७००