तीन कविता

कविता मुकेश


सागर
सागर मैंने तुम्हें देखा
उत्साहित उल्हासित आतुरित
विशाल हृदय से
बांटते हुए सारा जोश
सारी उमंग शक्ति ऊष्मा
लहरों को जो उछलती बल खाती
छू लेना चाहती है आसमान को
और शांत हो जाती है
किनारों से टकराते हुए
जानना चाहती हूं सागर
तुम युगों से बनकर सेनापति
लहरों की सेना के साथ
किससे लडने आते हो
हर रोज किनारों तक
या कि रहती है कोई जलपरी
गहरे तल में नाराज तुमसे
उसे मनाने आते हो
या तुम अत्यंत उल्लसित
किनारे खडी अपनी प्रेमिका
को बांहों में भरने आते हो
या कि नन्हे बालक की तरह
अपने साहसिक करतब
हमें दिखाने आते हो
मैं सम्मोहित तुमसे
तुम्हारा सानिध्य पाकर
लहरों में तुम्हारी लहरा कर
छू लेना चाहती हूं किनारों को
अनुभव कर लेना चाहती हूं
तुम्हारी शक्ति का जोश का
उमंग का और ऊष्मा का
थोडा सा सागर अपने
अंदर सदा-सदा के लिए
समेट कर ही यहां से
जाना चाहती हूं। ?
काली सडक
ओ काली क्रूर सडकों!
कैसे सौंप दूं
तुम्हें मैं
अपने होठों पर मचलती हँसी
बोजों में उछलती खुशी
कैसे मान लूं
कि तुम लौटा दोगी मुझे
मेरी अमानत यथावत
तुम चमकीली सर्पिणी
फुसलाती हो
उकसाती हो
नई-नई राहों पर बुलाती हो
अपने सम्मोहन की गिरफ्त में
दूर-सुदूर ले जाने के लिए
लहराती हो
बलखाती हो
रिझाती हो
तुम तिलस्मी
तुम जादूगरनी
मत बहकाओ इतना मुझे कि
चिपकते-जमते-उखडते कोलतार पर
मेरा भविष्य बिखर कर
तार-तार हो जाए
और मैं उसे बुन न पाऊं
जीवन भर। ?
स्वाद
जब देखती हूं
बाजार में कटी-छिली अधपकी
पकने को तैयार सब्जियां
खुश हो कर खरीदती हुई
महिलाओं को
बचेगा समय
तब सोचती हूं
कितना समय
किया होगा व्यर्थ
मेरी माँ-दादी-नानी ने
सब्जियाँ साफ करने में
पत्ता-पत्ता अलग करने में
रेशा-रेशा छाँटने में
धीरे धीरे गाते हुए गीत-भजन
गलाने में पकाने में
चखते ही खाना
जान लेते थे सभी
स्वाद से
आज तो खाना मां
ने पकाया है
दादी ने या फिर नानी ने
गंध हाथों की उनके
रच-बस जाती थी खाने में
आज सभी चुपचाप खा लेते हैं
भर ही लेते हैं पेट
कटी-छिली-अधपकी
पकने को तैयार
सब्जियों से। ?
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