चार कविता

किरण राजपुरोहित


कविता
कविता अल्हड होकर भी
करती प्रतीक्षा
उस पर कविता
होने की छाप की
कई बार होती
उगाही उसकी
कई बार होता पाठ
तराशी जाती
लय फ्रेम की कैंची से
फिर उतारते छिलके
और परोसते किताब पर
बहुत ही नफासत से बेजोड बनाकर
जिसकी आंखों में
झांकने को आतुर
तरसती सी
गुमसुम चुप हो जाती
वह गंवई सरल कविता ?
अकेला
अपनी व्यस्तताओं के जंगल में
विचरता
कितना अकेला है आदमी
रास्ते पर रास्ते खुलते
चौराहे छुप जाते चौराहे पर छोडकर
पगडंडियों का अपनापन
नहीं सुनने देता
मृगतृष्णाओं का नीरव ?
फुलवारी
बात बेबात पसरते किस्से
हवाओं से होड लेती अफवाहें
बिना धड के सिर उगते
नाराजगियों की
घनघोर घटायें
मनाने के प्रयास विफल
और अकडते ठनते
तब सम्बंधों की फुलवारी
सुबह-सवेरे ही झुलसे ?
अनंता
टटोल कर सिरे आसमान के
धरती ने छुपाली
अपनी गहराई
विस्तृतता की आवाजाही
भरपूर है छाई
पर साथी का मान
उंचा ही रहे
यही प्रयास रहता दोनों का
धरती उसे अनंत कहती
आसमां उसे अनंता! ?
सी-१३९, शास्त्री नगर, जोधपुर (राज.)