दो कविता

नरेश मेहन


मेरा गांव
गांव से आए हो
बताओ।
कैसा है
मेरे गांव में
क्या अब भी
वैसा ही है
मेरा गांव!
पगडंडिया
अब भी
लेती होगी
धने पेडों की छांव
जिस पर पडते होंगे
ग्वालों के पांव।
आज भी
आती होगी
गांव में
सरसों के फूलों की महक
जब आता होगा
बंसत का झोंका
मेरे गांव में।
अब भी
नव यौवना सा
संवर जाता होगा।
मेरा गांव
जब बरसात में
चिडिया चहकती होगी
और मोर
तानता होगा छतर।
अब भी
ऋतुएं
जीवन को संवारने
पसारती होंगी पांव
और
थिरक उठते होंगे
मोरों जैसे
युवाओं के पांव।
बताओ ना
क्या अब भी
गुदगुदाता
ख्यालों में
मेरा गांव
बताओ ना
क्या अब भी
वैसा ही है
मेरा गांव।
या
वह भी हो गया है
ठीक शहर जैसा
बिना सिर
बिना पांव। ?
पत्ता
दूर से उडता हुआ
एक पत्ता
आ कर
मेरे कन्धे पर
बैठ गया
मैंने पूछा
कहाँ से आए हो
इस कदर
अनायास गुमसुम से।
वह सकपकाया
मायूस हुआ
फिर बोला
शहर में आया हूँ
जबरी डाल से छिटक
कर
न चाहते हुए भी
अपनी प्यारी सी
उसी नन्ही डाल से
बिछुड कर।
शहर में
अब मेरा
दिल नहीं लगता
कांपता है वृक्ष।
सहमी रहती है टहनियां
तेज हॉर्न की आवाज से
घुटता है दम मेरा
धुएँ में उदास
पेड की शाखा पर।
मुझे दो कंधा
मेरे भाई
मुझे अपने
साथ ले चलो
शहर से दूर
किसी नदी किनारे
किसी खेत पर
छोटे से गांव में।
जहां मैं सुन सकूं
आफ पक्षियों का
संगीत प्यार से। ?
वार्ड न. १४, मोहन हाऊस, ढिल्लो कॉलोनी, हनुमान गढ-३३५५१२