तीन कविता

अर्पण कुमार


बोझ
सुनता आया हूँ
बचपन से
अपना बोझ स्वयं उठाओ
और तब से
कहीं गहरे अवचेतन में
बैठा हुआ है यह शब्द
कुंडली मारे हुए
सोचता हूँ
सुनने और सहने में
कितना अंतर होता है!
और कुछ शब्द
सचमुच कितने व*ानी होते हैं!
एक बार *ोहन और *ांदगी में
आ जाएं
तो जाने का नाम नहीं लेते
उठाते हुए कई-कई बोझ
अब तो कंधों ने भी
उचकना छोड दिया है
और कुछ दोस्ती-सी हो गई है
इस शब्द से भी
और शायद तभी
बोझ
हल्के लगने लगे हैं इन दिनों ?
यह जो माँ होती है
पति की खातिर बच्चों से
बच्चों की खातिर पति से
जो हरदम ताने सुनती है
इसको उसको गुनती है
जो खुद कुछ नहीं कहती है
बिना कहे फिर भी
जो सब कुछ व्यक्त कर जाती है
वह माँ होती है
भोर में विभोर हो
जो बिस्तर छोड देती है
देर रात तक खटती
जो सूरज की हिम्मत
तोड देती है
वह माँ होती है,
घर के दरवा*ो से ही
जो किसी अनहोनी को
मोड देती है,
ममता के हाथों
वशीभूत हो
जो दोनों मुट्ठी
खोल देती है
वह माँ होती है
श्रम के गृह-शिविर में जो
चहुँ ओर होती है
हर बच्चे की *ाुबान पर
जो ‘वन्स मोर’ होती है
वह माँ होती है
जिसके आँचल की
छाया लेने
नारायण स्वयं शिशु
बन जाता है
लीलाधारी की लीला
जिसके आगे
खुद छोटी पड जाती है
वह माँ होती है
फिर यह कैसी
विष बयार बहती है
माँ अगले जन्म
खुद लडकी नहीं
बनना चाहती है
हर हाल में टिकी रहती माँ
फिर यहाँ कैसे हार जाती है
यह जो माँ होती है
वह इतनी कैसे
म*ाबूर हो जाती है
यह जो माँ होती है
क्या कहने भर को
माँ होती है! ?
यह जो कल्पना है
जो मेरी कालिमा को
किसी खय्याम सा पीती है
वह कल्पना है
जो मेरी वासना को
अनुष्ठान मान
भरपूर निभाती है
वह कल्पना है
आकाश बेपर्दा है चतुर्दिक
और धरती ने
लाज छोड रखी है
जो इस मनोहरता को
मेरी दृष्टि में भरती है,
वह कल्पना है
रख अपने मान को
परे जो मुझे मानती है
वह कल्पना है
जिसका ताउम्र ऋणी रहूंगा
उस विराट हृदया को
पहुँचे मेरा सलाम
जो मेरे एकान्त को
किसी कलावंत सा दुलारती है
वह कल्पना है
कंफपाते कँवल
को जो झट अपना
शीतल गोद सौंपती है
अपराध कैसा भी हो
जिसकी कचहरी मुझे
रिहा कर देती है
जिसकी कटि से
लग मेरे सपने कल्पनातीत
उडान भरने लगते हैं
खुद काजल लगा जो
मुझे बुरी न*ारों से बचाती है,
वह कल्पना है
हर सच में कुछ कल्पना है
हर कल्पना का
*ारा अपना भी सच है
कुछ लिखे गए
और प्रेषित हुए
जो अनलिखा रहा
वह भी तो खत है
उससे मुझे मिलना न था
उसे मेरे पास आना न था
जानते थे हम इसे
जिसे मैंने फिर भी दुलारा
और जो मुझको खूब है सही
हासिल यही वो वक्त है
उसे बस घटित होना है
सच में हो या झूठ में
गली में हो या हो बीच अँगना
प्यार तो बस हो जाता है
खुली आँखों से हो या
देखें हम कोई सपना
पक्षी कलरव करते हैं
पेडों के पत्ते सरसराते हैं
और संध्या गीत कोई गाता है
तुम चुफ से
मेरे पास चली आती हो
सजनी हो या हो कि कल्पना। ?