पाँच कविता

प्रो. चद्रभानु भारद्वाज


हर बार
हर बार
कुछ न कुछ बीतता रहता है
मेरे भीतर
या लौटता रहता है
हर बार
इस ‘मेरे’ या ‘मैं’ तक।
मैं बनता रहूँ कुछ भी
निश्छल
निष्कपट
मानना है यह स्पष्ट सा
कि शब्द कुछ भी हों
वे बीतते रहते हैं
हर बार
बिना कोई अर्थवत्ता लिये।
हर बार काया कपट दर्शनों ने
किया है बेहाल
हर बार
कोई क्यों पूछे
भीतर की अकुलाहट!
जो है सिर्फ मदारी मेरे भीतर
कोई डुमडुमी बजाती हुई चेतना
मनकी भीड एकत्रित किए जाने की लालसा में
हर बार।
मुहब्बत या प्रेम या सौहार्द जैसे शब्द
अब लौट रहे हैं अपने अतीत की तरफ। ?
नदी के साथ-साथ
यह नदी मेरे जन्म की है
बचपन में इसने सिखाया
किनारे किनारे चलना
तनिक बढा और बडा हुआ
इसमें कूदने को मन किया
कूदा और देखी गहराई
इसी गहराई से मैं बना और
बनता चला गया
इस बनने बनाने के अक्षरों में
तीज त्यौहारों के गले मिला
ठुमके लगाये
साथ साथ उछल कर
उम्र के फलक पर एक तस्वीर बनी
जद्दो*ाहद
संघर्ष
मेल मिलाप
कभी भिडन्त
न जाने क्या क्या-!
नदी के बहाव में कोई अन्तर नहीं था
ठहराव की अभी गुंजायश भी नहीं थी।
फिर भी बहाव के साथ साथ
मैं भी बहने लगा
किसी बीच के रास्ते को ढूँढने
जो लडने भिडने के वक्त
सहज में ही उपजने लगते हैं
मैं पूछने लगा लगातार
यह बीच का रास्ता आखिर है क्या?
कोई निर्णायक इन्सानी पक्ष क्यों नहीं?
बेचारी नदी मायूस सी अभी भी मेरे साथ थी
हालांकि आकाश ने वर्षा का अपहरण कर अपने
साथ रख छोडा था
हालांकि सूरज अभी भी आग उगलने में लगा था
पर मेरे प्रश्नों के जबाब कहीं भी नहीं थे
आजकल नदियों का पानी सूखने लगा है
फिर मेरी नदी भी कैसे बचती
मैं फिर भी उसके साथ साथ चलता रहा
चीखता रहा
जल के बिना जीवन नहीं होता, मेरी कौन सुने!
पर यह सनातन सत्य है कि
नदी और जीवन कभी अकेले नहीं होते ?
यह बर्फ पिगलनी चाहिए
हर तरफ जमी है बर्फ
सिंहासन स्थिर है
यह बर्फ पिगलनी चाहिए।
चाहिए हवा
भरी हो प्राणवायु से
चाहिए जल
प्रवाहित हो जीवन जिससे
गतिशील बने जगत
व्यवस्था यही चाहिए
यह बर्फ पिगलनी चाहिए।
अट्टहास करते बादलों में भी
सूरज चमके
हँसती खिलखिलाती बिजली की कडक में
जिन्दगी हँसे- खिलखिलाएं
व्यवस्था यही चाहिए
यह बर्फ पिगलनी चाहिए।। ?
हमें पता है
हमें पता है कि
समय की लकीरों से बँधे हैं लोग
ये कभी विपरीत धारा का वरण नहीं करेंगे
हमारे पुरखे तो साहसी थे
जो सिंदवाद की तरह
नचाते हुए समुद्र रथ
अनजाने द्वीपों को खोज लाये थे
सभ्यता को सजाया
और आगे बढे
पर आज?
आज मछलियाँ बेरोक-टोक
सिर उठाए घूमती हैं
मेघ आ*ाादी से नहीं बरसते
हमने समय सन्नाटों से बुन लिया है
एक अजीब गीत
जो बिना राह तलाशे बजता रहता है
जहाँ तहाँ
गीली मिट्टी में रोपा हुआ बीज
कभी वृक्ष की शक्ल नहीं लेता
आशंकाओं से भरा हुआ है आज!
फिर भी हमारी यमुना
इस देश की गंगा अभी सूखी नहीं है
एक आशा
धीर बढा रही है
उसने सिर्फ तट बदल लिया है
थोडी दूर खिसक गई है। ?
जो बचा है उसके बारे में सोचो
हर कोई कुछ न कुछ सोचता है
सोचता है- बच्चों के बारे में
कितने प्यारे होते हैं बच्चे
धुले-पुंछे दमकते
चंदा को उछलकर पकड लेने वाले बच्चे!
कभी कोई आगे भी सोचता है
मां के बारे में सोचते ही
गंगा में ज्वार आ जाता है
जवान वृक्षों में आग दहकने लगती है
जिंदा स्वाभिमान लौटने लगता है।
उस दिन
इसी दोपहरी में माँ ने भी कुछ सोचा होगा
सोचा होगा एक फूल के बारे में
जो एक भरेपूरे बाग में महकने लगा था।
उस दिन
उस बच्चे की माँ जलती शाम के धुएं में
अचानक खो गई
बच्चा अब अकेला सोचता है भविष्य
सोचता है उन कातिलों के बारे में
जो दबे पांव आए और उस महकते बाग को
अगवा कर भाग गए।
सोचना शायद जिंदगी का अहम हिस्सा है
गुणा, भाग, बाकी, सब इस सोच के
तंतु बिखरे पडे हैं
जयपुर की सडकों पर
सोच रहे हैं आदमी के *ामीर के बारे में
सोचो-और सोचो,
जो बचा है उसके बारे में सोचो। ?

(प्रसंग- जयपुर में हुए बम हादसों के बाद)
११९, श्रीजी नगर, दुर्गापुरा, जयपुर-३०२०१८ (राज.)