आठ कविता

राजकुमार कुम्भज


स्त्रियां बनाती हैं मन
स्त्रियां बनाती हैं मन
फिर स्त्रियां अपने मन-मुताबिक
बनाती हैं मनुष्यों का मन और मनुष्य
मनुष्यों से बनती है दुनिया
दुनिया से बनती है दुनिया भर की मनुष्यता
मनुष्यता वह भी जो युद्ध-विरोधी
और मनुष्यता वह, वह भी जो युद्ध-पसंद
किंतु वह मनुष्यता और वह, वह मनुष्यता कहां
जो कहलाई यहां युद्धबंदी?
किंतु यह क्या, यह क्या
कि युद्ध-विरोधी कि युद्धपसंद कि युद्धबंदी
शामिल दुःख सबके सब यहां से वहां तक
स्त्रियां बुनती हैं एक मन ऐसा ही
स्त्रियों के पास होता है एक मन ऐसा ही
स्त्रियां सर्दियों विरुद्ध बुनती हैं गर्मियां
स्त्रियां सर्दियों विरुद्ध बनाती हैं रोटियां आग की
स्त्रियां सर्दियों विरुद्ध करती हैं सीधी कारवाइयां
स्त्रियां बनाती हैं मन ?
सहसा उछलकर किसी क्षण
शिकायतकर्ताओं को
हिस्सेदार बना रहे हैं अपहरणकर्ता
वस्तुओं और नैतिकताओं में से
एक-दूसरे को नमक और शकर की तरह
चाटते हुए सदियों की लपक में
सिर्फ अपनी, जुबानें और लंगोटें
लटका रहे हैं
मुझे ताज्जुब नहीं हो रहा है और *ारा भी नहीं
कि अच्छा इला*ा क्यों नहीं पहुंच पाता है
अच्छे लोगों तक
और क्यों अच्छे लोग, अच्छे इला*ा की कमी से
मर जाते हैं अच्छे लोग
और एक बडी तादाद में फिर-फिर
बच जाते हैं बुरे लोग ही
तय तो यही हुआ था कि अच्छे इलाज से
इस दुनिया को अच्छा बनाने के लिए
इस दुनिया में बच रहेंगे अच्छे लोग
लेकिन ये क्या से क्या हुआ जाता है
कि बच रहे हैं बुरे लोग
इस दुनिया को और-और बुरा बनाते हुए
और-और बुरा बनाते रहने के लिए
विचार को व्यक्ति ने
व्यक्ति को वस्तु ने
और वस्तु को कीमत ने
गिरा ही दिया है छपाक से समुद्र में बूंद जैसे
सहसा उछलकर किसी क्षण
चाटते हुए सदियों की लपक में
शिकायतकर्ताओं को ?
स्मृति तुम्हारी
स्मृति तुम्हारी
सूरत तुम्हारी नीलकमल
नील गगन में इंद्रधनुष जैसे
जैसे वसंत ही वसंत
मेरे चारों तरफ, चारों दिशाएं
नहा रही हों उज्ज्वलतम रोशनी से
मैं भूल गया, भूल ही गया
देखना और खिलना फूलों का
बाद उसके बेहद-बेहद *ाबर हुई
स्मृति तुम्हारी ?
पत्थर में भी प्रेम
एक पक्ष जीवन
और एक मृत्यु है, तो है
इसी में से निकलेगा वह गलियारा भी
नाम जिसका प्रेम
मैं रहूं, न रहूं, ह*ार् नहीं
रहना चाहिए, रहना ही चाहिए
पत्थर में भी प्रेम ?
सुख-संदूक
सुख-संदूक
दुःख विस्तारित आकाश
सुख-संदूक में ताले असंख्य
ये आया कहां से आया कैसे?
ये आया ऐसे कि फिर ये आया वैसे
दृश्य में उपस्थित जीत और मौत एक साथ
पीडा विस्तारित नदी, नाले, तालाब, महासमुद्र
दुःख विस्तारित नदी, नाले, तालाब, महासमुद्र
दुःख विस्तारित आकाश
सुख-संदूक ?
तुम्हारी ही तरह
आने वाला नहीं है, जाने वाला कल
जब भी कभी तुम उस एक चेहरे को गौर से देखो
जो छुप गया है किसी थकान के पीछे इन दिनों
कल होगा क्या पता नहीं
भूतकाल के प्रेत गए भूतकाल में
मुझे अपने बच्चों और उन बच्च के बच्चों को
बचा ले जाने की *ाम्मेदारी हो सकती है
लेकिन इस शर्त के साथ
बचे पहले और बचे बेहतर
मेरा बेजुबान वर्तमान
जो दो पाटों के बीच पिस रहा है इन दिनों
इन दिनों को बचाने का स्वभाव लिए
जब भी कभी तुम उस एक चेहरे को गौर से देखो
आने वाला नहीं है, जाने वाला कल
वह भी उम्रदरा*ा हुआ जाता है इन दिनों ?
अगर है मुकम्मिल
अगर है मुकम्मिल
तो कविता एक मुकम्मिल गाली है
नहीं तो फिर कुछ इधर और कुछ उधर
आधी घरवाली, आधी साली है
कविता सिर्फ ताली है ?
कवि और समुद्र
ये समूचा समुद्र
कमबख्त और अंततः-अंततः
खारा हुआ तो किसलिए?
शायद किसी एक दिन
शायद किसी एक चिडिया संग
शायद कहीं कोई एक कवि हुआ होगा
जो रोया होगा रात भर
इसलिए ?
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