तीन कविता

रोजलीन


प्रेम करता है श्ाृंगार धरती का
जी तो चाहता है
कि ये जो-
प्रेम के उमड-घुमड बादल!
तितर-बितर
बिखरे पडे हैं हर ओर
कसैले,
धूसित,
बेरंग
बेकार ही
क्यों न इन्हें एकत्र कर
अपनी मुट्ठियों में भरूँ
और-
उस असीम आकाश पर
थपथपाती चली जाऊं अथक
आकाश बरसेगा
और उम्मीद करती हूँ
बरसता ही रहेगा
कि धरती!
धुलेगी पूर्णरूपेण
तो-
तरोता*ाा सधः सनात
निखर आएगी
फिर......
नए-नए प्रे*म के फूल खिलेंगे,
प्रेम के रंग झरेंगे,
प्रेम की खुश्बू उडेगी
प्रेम!
सिर्फ सपना नहीं होगा,
सुमंद हवाओं में
फिर गुनगुनाहट होगी
मात्र प्रेम ही की शेष
कि जैसे......
धरती का यह
निर्मल पावन निखार भर ही
अब धरती का
सजना-संवरना ही है ना
याकि, देखो *ारा.......
प्रेम!!
करता है श्ाृंगार धरती का
कितनी सादगी से। ?
प्यार के लिए *ान्दगी कितनी कम है
सोते-जागते
चलते-फिरते
रोते-हँसते
जीते-मरते
जिसका मुझे ख्याल नहीं बिसरा!
वो ही मुझे नहीं जानता???
सुनो.....
यह तुम!
मुझे जानते नहीं हो
या
ना जानने का
बस नाटक करते रहते हो?
और यदि,
जानते ही नहीं
तो-
क्यों मेरा नाम
अपनी *ाुबान पर आते ही
हडबडा जाते हो तुम??
फिर!
क्यों खामखाह
इतना कष्ट
झेल रहे हो तुम
और-
क्यों इतना दुःखी
कर रहे हो मुझे भी?
जबकि...
पहले ही
प्यार के लिए *ान्दगी
कितनी कम है,
तो-
कल की चिंता में
तुम अपना
आज क्यों बिसार रहे हो ? ?
प्यार होना एक अलग बात है
क्या हुआ!
प्यार करने से
डर लगता है क्या?
ओ...हो...हो...
वो तो
मुझे भी लगता है
लेकिन!
डर लगना
अलग बात है
और-
प्यार होना
एक अलग बात
फिर,
डर लगने से
प्यार करना
छोड दोगे क्या?
और यदि-
प्यार!
अपने ही
ऐसे भ्रम
आडम्बर
और छलावों से
छला जाता रहा
तो-
प्यार के
खोते जाने का दोष
किसके सिर मंढा जाएगा!
अब
क्या किया जाए!
यहां तो
समझदार लोग ही
ना समझ होते जा रहे हैं। ?
५३५, गली न. ७, कर्ण विहार, मेरठ रोड, करनाल-१३२००१
मो. ०९४६७०११९१८