चार कविता

भानु भार्गव



मेरे लिए नहीं यह
मेरी नहीं यह कविता
और न है यह मेरे लिए
यह लिखी गई है
सिर्फ तुम्हारे लिए
इसके जो शब्द हैं
वे सभी आयातित हैं
तुम्हारे शब्द-कोष से
जो कभी निपजे थे
तुम्हारी ही ठंडी आहों से
इसके स्वर जो तुम सुन रहे हो
वे भी जलहीन गहरे कुएँ से
परावर्तित तुम्हारी ही चीख की अनुगूँज है
इन्हीं शब्दों और स्वरों के
संवेग से जो उभरे हैं भाव इस कविता में
वे भी तुम्हारी अचेतन मन की
बीहड कल्पनाओं से बटोरे हैं मैंने
मैं भी तुम्हारी ही तरह
बियाबान जंगलों में
भरता हूँ ठंडी आहें और चीखता भी हूँ
कुएँ सी घुप्प कन्दराओं में
यकीनन तुम्हारे ‘तुम’में
समग्रतः शरीक हो गया है मेरा ‘मैं’
तुम्हारे ही शब्द
तुम्हारे ही स्वर
तुम्हारे ही भावों को ले कर
लिखी गई इस कविता पर
हो भी सकता है कैसे
किसी और अधिकार
यह सिर्फ..... और.....सिर्फ
तुम्हारे ही लिए है मेरे दोस्त! ?
खून किसका
एक पर एक रखे जाते
सुगढ पत्थरों को
म*ाबूत तामीर में बलते हुए
देखा है अब तक
जब कि वे होते हैं
किसी सृष्टा के हाथ में
विशद चट्टानों के पुंज भी
रचते आए हैं
पर्वतों के उत्तुंग शिखर
कितनी ही सभ्यताएं, संस्कृतियां और वनस्पतियां
पनपती रही हैं उनकी
अधित्यिकाओं और उपत्यकाओं में
विश्व भर में फैली
इन कलात्मक पत्थरों की शोहरत भी
भरती आई है
सौन्दर्य की खुशबू
आदमी की आँखों में
और कर रही हैं स्पन्दित
मन के अन्तस् को
वह अब नहीं रहा समय
जब ये पत्थर हुआ करते थे
आदिम हथियार या रगड कर
आग उत्पन्न करने के साधन
बेहद अफसोस है कि
तुम्हारे हाथों में आ कर
आज ये फिर से बन गए हैं
हथियार और लगाने लगे हैं निशाना
समझ कर अमित्र अपनों को
होने लगा है मुझे उस असुरक्षित
आदिम मानव का स्मरण
जो अपनी रक्षा के लिए
कभी किया करता था
इनका उपयोग
न तुम आदिम हो
न तुम असुरक्षित हो
और न तुम्हारे सामने खडा
हर व्यक्ति तुम्हारा दुश्मन है
तो फिर
इन पत्थरों के टुकडों को
क्योंकर बना रहे हो तुम
आदिम हथियार
सोच लो
जिस किसी को भी
लगेगा यह
बहाएगा खून उसका
यह खून मेरा भी हो सकता है
और तुम्हारा भी ?
होतीं अगर चार आँखें
काश!
आदमी की पीठ पर भी होतीं
दो अतिरिक्त आँखें
कम से कम वह
यह तो जान पाता कि
कौन कर रहा है
उसका पीछा
और कौन कर रहा है
पीठ पीछे
उसकी आलोचना
उसकी किसी भी
मिची हुई आँख को देख कर
हम भी लगा पाते यह अनुमान कि
इस बार किधर जाएगा वह
अगर कोई होता बेबस राष्ट्रीय नेता
जो मोटाई के कारण
न घुमा पाता अपनी मोटी गर्दन
तो वह रखता इन आँखों में से
एक-एक आँख
अपने शरीर के चारों तरफ
(ललाट/गर्दन के ऊपर/दाएं और बाएं कंधे पर)
लगाने की पुरजोर मांग
ताकि वह देख सके
चारों ओर बिना गर्दन घुमाए
काश!
ऐसा होता तो
चार आँखों वाला दर्जी
थाम कर दोनों हाथों में इंचटेप
करता ब्यौंत आदमी के कद की
और कपडों की डि*ााइन
बदलने के नाम पर
दुधारी कैंची से काट-काट
रख लेता ढेरों रंगीन कतरनें अपने पास
काश!
ऐसा होता तो
मैं भी अपने दोनों कंधों के पुठ्ठों पर
लगवाता ये अतिरिक्त आँखें
और पहन कर सेंडो बनियान
करता चोकसी ‘पिछडे’ लोगों की
इन आँखों से ?
रंग अब वो रंग नहीं रहे
रंगों की पहचान
भूल चुकी हैं आँखें
कि पहचानने से पहले ही
बदल जाते हैं रंग
रंगों में
पसंद है मुझे
काला रंग क्योंकि
नहीं डरा पाते
अँधेरे मुझको
‘धूप’ में के ‘थपेडों’ में इन दिनों
धुंधलाने लगा है ‘लाल रंग’ भी
गर्मी के कुचालक
सफेद सूती कपडों की
घट रही है मांग बाजार में
लिहाजा
दुकानों में अब सज गए हैं
काले रंग के चमकीले सूट
इतना पसंद क्यों है यह रंग उन्हें भी
जो जन्म-जन्मान्तर से
रहा है मेरा भी
रंगों के नाम पर
मंडराने लगी है तितलियां
निर्गंध फूलों पर
मादक बहकावों में आ कर
मुंह फेर लिया है मवेशियों ने
पीली पडती घास की हरियाली से
और सूरज के इन्तजार में
कुम्हला गए हैं सूरजमुखी
सोचता हूं
कितना पक्का था
कबीर की चादर का वह रंग
जो आज भी
जतन से रखी हुई है
ज्यों की त्यों
रंगों में मिलावट से
लगता है शायद
रंग अब वो रंग नहीं रहे ?
‘अनुष्टुप्’ १३ गायत्री नगर, सोडाला, जयपुर-३०२००६ (राज.)
मो. ९४१४४४०९९७