पाँच कविता

प्रीता भार्गव


१.
बांहों में
पूरा आकाश
रंग ही रंग
तुम एक बार
आसपास
देखो तो सही।
डूब गया है सूरज
तो क्या
दीपक है,
बाती है,
नेह है,
तुम स्वयं को, थामा
पहचानो तो सही। ?
२.
अंगुलियाँ सुन्न
गोद में सलवटें,
भीतर बाहर सन्नाटे।
फिर भी अंकुरना होगा।।
ठहरना मत
उठना, हवा में फैलना,
झकझोर लेना फिर फिर
भीतर की राख
भीतर की चिंगारी
मत थकना,
जडताओं को दिखाना दीपक।
भीतर वाले घर में,
भर लेना आलोक।
नमी और आंच को
पसार का साँसों में,
जानना तुम ही हो।
कि तुम्हीं हो हर एक प्रश्न का उत्तर अनन्त,
फाडकर कलेजा, निकल जाने दो हाहाकार
फिर कहो अपने आपसे कि तुम हो।
हाँ तुम हो।। ?
३.
आओ मित्र
अब यात्रा पर चलें!
हमें यहां
नितांत तिमिर में छोड कर
आज तक उगे
अधूरी उम्मीदों के सारे सूर्य,
हो चुके अस्त, छोडकर दिलों में
खुद को पहचानने की
समझ सौंप कर!
यात्रा पर निकलेंगे हम, तो
अस्त भी होंगे
नई यात्रा करते कर,
उसी क्षितिज पर दूर कहीं
फिर उगेंगे भी
निकल पडेंगे फिर फिर
किसी अनवरत यात्रा पर!
आओ मित्र अपनी यात्रा!
कर दें आज की
इस अशेष अनुभूति के नाम!
चलें! समय के साथ साथ,
नए नकोर, गतिमान! ?
४.
ये कौन है
मेरे भीतर, मेरे आसपास
हर जगह
जहां तक भी हूं मैं,
भेजता हुआ अपनी तरंगें
कण कण मुझे छुता हुआ।
कौन है।
मेरा मन मौन है।
मुझे बार बार जोडता,
बार बार, भर भर कर
मेरे सर से
कुछ जाने क्या सा
खींचता
अपने पर से
कुछ ओढता सा
ये कौन है।
मेरा मन मौन है।
मेरा मन मौन है।
खाली करता मुझे
समय से बचाकर
दिशाओं से छुपा कर
महकती मिट्टी में पगाकर
हल पल नया नकोर करता मुझे।
उमगाता आकाश तक
आखिर यह कौन है।
मेरा मन मौन है। ?
५.
मैं फिर आऊँगी
किसी धुँधुआई भोर में
जब कोहरे से ढँके होंगे
चीरवा के घाट और
सब कठोर चट्टानें।
मैं आऊँगी *ारूर
जब लबालब फतेहसागर
छलक उठेगा,
पाल से उछल
उतर आएगा
सडकों पर।
मैं देखूँगी
पिछोला में सोए पडे,
तारे को।
उगते हुए फिर से
बाँहें फैलाए हुए। ?
डी.आई.जी. जेल, केन्द्रीय कारागार, उदयपुर-३१३००१ (राज.)
मो. ९४१४२३४१३४

ÖæÙé ÖæÚUçß