पाँच कविता

सुशील पुरोहित



जीवन गुजार दूँ
उसने बनाया है
बीते दिनों के अखबारों
काँच के टुकडों
सिरेमिक ग्लास
संगमरमर के टुकड
अस्वीकृत पेडों की शाखाओं
पक्की मिट्टी की ईंटों, गारों
काँच के टुकडों, पत्थरों
टूटी-फूटी नाकारा प्रतिमाओं
और भी न जाने क्या क्या जोड कर
एक सुन्दर लगने वाला बाग
मैं भी इन्हीं सबको इकठ्ठा कर
बनाना चाहता हूँ
अपने लिए एक घर
जिसमें मैं अकेला रहूँ
जीवन गुजार दूँ ?
लोग
मैंने कितने ही तरह के लोग
देखे हैं
कुछ पुरातन पंथी
पगडी धारी
कुछ आधुनिक
और
उत्तर आधुनिक भी
कहीं गुटों में विभाजित
तो कहीं पर अलग अकेले
सबका अपना एक उजास है
न यहां कुछ अमानवीय है
ना ही कोई उदासी है?
जानना चाहा रास्ता
मैंने जानना चाहा
तुम तक पहुँचने का रास्ता
गाडियों की चीख
और कोबरा साँपों की आत्मा वाले
व्यक्तियों के बीच
मैं उलझ गया
भूल गया मार्ग और दूरी दिखलाते
शहरों-कस्बों-गाँवों के नाम
उनके बीच की दूरियाँ
याद रहा केवल उस शहर का नाम
उसका नक्शा
जहाँ कभी सवारियाँ उतरती थी
वहाँ ठहर गया है खौफ
गहरी सांसें लेता
अन्ततः तुम्हारे शहर में
मैं पहुँच गया हूँ
कराहों से भरे
रास्ता पार करते ?
मैं भी झिलमिलाऊँ
अब क्या बताऊं
मेरी भी उत्कंठ इच्छा है
कि मैं जुगनुओं की तरह झिलमिलाऊँ
क्या यह मेरा सपना ही रहेगा?
इतनी बडी देह धारण कर मैं
कब झिलमिलाया?
किसको रास्ता दिखाया?
अपने में डूबा
तेज रोशनी की ओर दौडता रहा
आईने में चेहरे पर
बढती जा रही झुर्रियां देख
तिलमिलाता रहा
सब कुछ शांत नहीं है
मैं अकेला पहूँचा हूँ यहाँ
तुम्हारी याद
हथेलियों की कल्पना भरी
गर्माहट ले कर
चलता जा रहा हूँ
यह पीडा भुगतने वाला
मैं अकेला नहीं
और भी हैं यही सब भोगते ?
३९४, गाँधी चौक, जोधपुर-३४२००१ (राज.)