जन गण मन अधिनायक जय हे

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी


‘जन-गण-मण’ को राष्ट्रगान के रूप में २४ जनवरी, १९५० को संविधान-सभा की बैठक में विधिवत् अंगीकार किया। इससे पूर्व ‘वन्दे मातरम्’ और ‘जन-गण-मण’ इन दोनों में से किसी एक को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने के लिए देशभर में खूब बहसें हुयी। अंतिम चयन हेतु संविधान-सभा द्वारा एक समिति का गठन भी किया गया किन्तु समिति ने कोई निर्णय न लेकर यह मामला संविधान सभा के सभापति पर छोड दिया। अंततः संविधान-सभा के सभापति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने २४ जनवरी, १९५० की बैठक में ‘जन-गण-मन’ को भारत का राष्ट्रगान स्वीकार करने की घोषणा की।
इससे पूर्व इस गीत का विरोध करने वाले कुछ लोगों का ऐसा मानना था (और ऐसा यदा-कदा अभी भी कहा जाता है) कि टैगोर ने इस गीत की रचना जार्ज पंचम की प्रशस्ति हेतु की थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इस पूरे प्रकरण को निकट से देख रहे थे। उनका मानना था कि कविवर टैगोर ने यह गीत कांग्रेस के १९११ के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में गाया था न कि जार्ज पंचम की स्तुति में। इस वास्तविकता से अवगत कराने हेतु उन्होंने एक लेख लिखा था, वह अविकल रूप से प्रस्तुत है।
देश का राष्ट्र-गीत ‘वन्देमातरम्’ गान हो या ‘जनगण्मन अधिनायक’, इस प्रश्ा* पर आज-कल बहुत वाद-विवाद हो रहा है। भारतीय विधान-सभा शीघ्र ही इस बात पर विचार करेगी। दोनों गानों के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा गया है। मुझे इन बातों पर यहाँ विचार करना अभीष्ट नहीं है। परन्तु इधर हाल में कुछ लोगों ने यह बात उडा दी है कि यह ‘जनगण’ वाला गान कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सम्राट पंचमजार्ज की स्तुति में लिखा था और वह पहले-पहल सन् १९१२ ई. के दिल्ली दरबार में गाया गया था। इस सम्बन्ध में मेरे पास अनेक सज्जनों ने पूछताछ की है। भारत का राष्ट्रगीत चाहे जो भी स्वीकार किया जाए, वह हम लोगों के लिए पूजनीय और वन्दनीय होगा, पर किसी असत्य बात का प्रचारित होना अनुचित है। मैंने विश्व भारती संसद (गवर्निंग बॉडी) के सदस्य की हैसियत से अन्य अनेक मित्रों के साथ एक वक्तव्य ३० नवम्बर, १९४८ को दिया था जिसमें इस प्रकार की धारणा को सप्रमाण भ्रान्त सिद्ध कर दिया था। परन्तु उस वक्तव्य के प्रकाशित होने के बाद भी पत्र आते रहे। इसलिए एक बार फिर मैं साधारण जनता के चित्त से इस भ्रान्त धारणा को दूर करने के उद्देश्य से यह वक्तव्य प्रकाशित करा रहा हूँ।
कुछ दिन पहले तक इस प्रकार के अपप्रचार का क्षेत्र बंगाल तक ही सीमित रहा है। कवि की जीवितावस्था में ही इस प्रकार की काना-फूसी चलने लगी थी। किसी-किसी ने उनसे पत्र लिखकर यह जानने का प्रयत्न भी किया था कि इस कानाफूसी में कुछ तथ्य है या यह बिलकुल निराधार है। कवि ने बडी व्यथा के साथ श्री सुधारानी देवी को अपने २३ मार्च, १९३९ के पत्र में लिखा था कि मैंने चतुर्थ या पंचमजार्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों के रथयात्रा का चिर-सारथी’ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढता का सन्देह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं, उनके प्रश्ा*ों का उत्तर देना आत्मावमानना है।’’
रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनके ‘राजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपरतन’ आदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होंने इस ‘राजेन्द्र’ को सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है। उनके गानों में इस ‘राजा’ पर भरोसा करने की बात कही गयी है। एक गान में उन्होंने लिखा है कि तेरे स्वामी ने तुझे जो कौडी दी है उसे ही तू हँस कर ले ले, हजार-हजार खिचावों में पडा मारा-मारा न फिर। ऐसा हो कि तेरा हृदय जाने कि तेरे राजा हृदय में ही विद्यमान हैं।
जे कडितोर स्वामीर देवा सेइ कडि तुइनिस रे हेसे।
लोकेर कथा जिसने काने फिरिसने आट हजार टाने।
जेन रे तोर हृदय जाने हृदय तोर आद्येन राजा।।
जो लोग सरल भाव से विश्वास कर सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ ने ‘राजेश्वर’ कहकर किसी पंचमजार्ज की स्तुति की है, वे यदि गान की कुछ पंक्तियों पर थोडा भी विचार करते तो उन्हें अपना भ्रम स्पष्ट हो जाता। कैसे कोई किसी पंचम या षष्ठ जार्ज को-
‘‘विकट पन्थ उत्थान पतन मय युग-युग धावित यात्री
हे चिरसारथि तव रथचक्रे मिखरित पथ दिन रात्री
दारुण विप्लव माँझे, तब शंखध्वनि बाजे
संकट दुख परित्राता’’ (हिन्दी अनुवाद से)
कह सकता है? फिर कोई पंचम या अपंचम जार्ज को किस प्रकार-
‘‘घोर अन्धतम विकल निशा भयमूर्छित देश जनों में
जागृत था तब अविचल मंगल नत अनिमिष नयनों में
दुःस्वप्ने आतंके आश्रय तब मृदु अंके,
स्नेहमयी तुम माता।’’
कहकर उसे ‘जनगण’ संकट त्राटक कह सकता है? और रवीन्द्रनाथ जैसे मनस्वी कवि से जो लोग आशा करते हैं कि किसी नरपति को वह इतना सम्मान देगा कि सम्पूर्ण भारत उसके चरणों में ‘नतमाथ’ होगा, उसे क्या कहा जाए!
वस्तुतः यह गान दिल्ली दरबार में नहीं, बल्कि सन् १९११ ई. में हुए कांग्रेस के कलकत्ते वाले अधिवेशन में गाया गया था। सन् १९१४ ई. में जॉन मुरे ने ‘दि हिस्टारिकल रेकार्ड आव दि इम्पीरियल विजिट टु इण्डिया, १९११’ नाम से दिल्ली दरबार का एक अत्यन्त विशद विवरण प्रकाशित किया था। उसम इस गान की कहीं चर्चा नहीं है। सन् १९१४ में रवीन्द्रनाथ की कीर्ति समूचे विश्व में फैल गयी थी। अगर यह गान दिल्ली दरबार में गाया होता तो अंग्रेज प्रकाशक ने अवश्य उल्लेख किया होता, क्योंकि इस पुस्तिका का प्रधान उद्देश्य प्रचार ही था।
असल में सन् १९११ के कांगे*स के माडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दम्पती की विरुदावली कांगेस मंच से उच्चारित हो। उन्होंने इस आशय की रवीन्द्रनाथ से प्रार्थना भी की थी, पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। कांग्रेस का अधिवेशन ‘जनगण मन’ गान से हुआ और बाद में सम्राट् दम्पती के स्वागत का प्रस्ताव पास हुआ। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिन्दी गान बंगाली बालक-बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट् की स्तुति में था। सन् १९११ ई. के २८ दिसम्बर के ‘बंगाली’ में कांगे*स अधिवेशन की रिपार्ट इस प्रकार छपी थी-
ÒÒThe proceeding commenced with a patriotic song composed by Babu Rabindranath Tagore, the leading poet of Bengal (Janaganamana...) of wich we give the English translation (यहाँ अँग्रेजी में इस गान का अनुवाद दिया गया था।) Then after the passing of the loyalty resolutaion, a Hindi song paying heartfelt homage to their Imperial Majesties was sung by Bengali boys and girls in chorus.
विदेशी रिपोर्टरों ने दोनों गानों को गलती से रवीन्द्रनाथ लिखित समझ कर उसी तरह की रिपोर्ट छापी थी। इन्हीं रिपोर्टों से आज यह भ्रम चल पडा है।
मैं स्पष्ट रूप से बता दूँ कि मैं ‘वन्देमातरम्’ गान का कम भक्त या प्रशंसक नहीं हूँ। यह वक्तव्य इस उद्देश्य से दिया गया है कि असत्य बात प्रचारित न हो और इस महान् कवि के सिर व्यर्थ का ऐसा दोषारोप न किया जाए जिसने भारतवर्ष की संस्कृति को सम्पूर्ण जगत् में प्रतिष्ठा दिलवायी। रवीन्द्र मनस्वी कवि थे, वे कभी किसी विदेशी नरपति की स्तुति में इतना मनोहर गान लिख ही नहीं सकते थे। ?
‘भाषा साहित्य और देश’ हजारी प्रसाद द्विवेदी से साभार प्रकाशित