अंगरेज स्तोत्रं

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


पुरा-प्रसंग में इस बार भारतेन्दुहरिशचन्द्र की एक अत्यन्त मनोरंजक रचना ‘अंग्रेजोस्तोत्रं’ दी जा रही है। धार्मिक स्तोत्रों की शैली में लिखे गये इस ‘अंग*ज स्तोत्रं में भारतेन्दु की व्यंग्य विदग्धता, चुटिलापन और तीखी धार देखने लायक है। वे भारतीयजन की गुलाम मानसिकता और अंग्रेजों की कुटिलता पर व्यंग्य-विनोद-परिहास पूर्ण भाषा में बडे रोचक तरीके से चोट करते है। लेख के आरम्भ में निवियोग, मंत्र, अंगन्यास, ध्यान आदि पौराणिक स्तोत्र की तरह परिकल्पित है, जिसके ऋषि ‘मिथ्या प्रशंसक’ हैं, और अंग्रेजों की प्रसन्नता के लिए इसका पाठ विधान किया है। स्तोत्रं का समापन उन्होंने इसकी फलस्तुति बताते हुए तीन श्लोकों में किया है, जिनका भावार्थ है कि इस अंग्रेज स्तवन का नियमित पाठ करने वाला विद्या, धन, स्टार और मोक्ष में से जिसकी भी कामना करता है वह उसे प्राप्त होता है और वह सांसारिक फंदे से मुक्त होकर अंग्रेज लोक को प्राप्त होता है।’
अस्य श्री अँगरेजस्तोत्र माला मंत्रस्य श्री भगवान मिथ्या प्रशंसक ऋषिः जगतीतल छन्दः कलियुग देवता सर्व वर्ण शक्तयः शुश्रुषा बीजं वाकस्तम्भ कीलकम् अँगरेज प्रसन्नार्थे पाठे विनियोगः।
अथ ऋष्यादि न्यासः मिथ्या प्रशंसक ऋृषयेनमः शिरसि जगती- तल छंदसे नमः मुखे। कलियुगो देवतायै नमः हृदि। सर्व वर्ण शक्तिभ्योनमः पादयोः। शुश्रुषा वीजायनमः गुह्ये। वाकस्तम्भ कीलकाय नमः सर्वांके। अथ मंत्र। ओं नमः श्री अँगरेजेभ्यः मिथ्याप्रशंसक नाथेभ्यः सर्वशक्तिमद्भ्यः स्वाहा। अथ करन्यासः। ओं अंगुष्टाभ्यांनमः नमस्तर्जनीभ्यांनमः। श्री अँगरेजेभ्यः मध्यमाभ्यांनमः। मिथ्याप्रशंसक नाथेभ्यः। सर्वशक्तिमद्भ्यः कनिष्टकाभ्यांनमः। स्वाहा करतल कर पृष्टा- भ्यांनमः। अथ ध्यानम्। यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतस्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः सांगपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थित तद्गतेन-मनसापश्यन्ति यं योगिनो यस्यांतं न विदुः सुरा सुरगणा देवायतस्मै नमः। इति ध्यानम्।
हे अँगरेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम नानागुण विभूषित, सुंदरकांति विशिष्ट, बहुत संपद युक्त हो, अतएव हे अंगरेज! हम तुमको प्रणाम
करते हैं।
तुम हर्ता- शत्रुदल के, तुम कर्ता- आईनादि के, तुम विधाता- नौकरियों के अतएव हे, अँगरे*ा हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम समर में दिव्यास्त्रधारी- शिकारी में बल्लमधारी, विचारागार में अध इंचि परिमित व्यासविशिष्ट वेत्रधारी, अहार के समय कांटा चिमचाधारी, अतएव हे अँगरेज हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम एक रूप से पुरी के ईश होकर राज्य करते हौ, एक रूप से पण्यवीथिका में व्यापार करते हो और एक रूप से खेत में हल चलाते हो, अतएव हे त्रिमूर्ते! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
आप के सत्वगुण आप के ग्रंथों से प्रगट, आफ रजोगुण आफ युद्धों से प्रकाशित, एवं आफ तमोगुण भवत्प्रणीत भारतवर्षीय संवाद पत्रादिकों से विकसित, अतएव हे त्रिगुणात्मक! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम हौ अतएव सत् हो, तुम्हारे सत्रु युद्ध में चित्, और उम्मेदवारों को आनन्द, अतएव हे सच्चिदानंद! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम ब्रह्मा हौ क्योंकि प्रजापति हो, तुम विष्णु हो, क्योंकि लक्ष्मी के कृपापात्र हो, तुम महेश्वर हो क्योंकि तुम्हारी स्त्री गौरी, अतएव हे त्रिमूर्ते! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम इंद्र हो-तुम्हारी सेना वज्र है, तुम चंद्र हो- इनकमटैक्स तुम्हारा कलंक है, तुम वायु हो- रेल तुम्हारी गति है, तुम वरुण हो- जल में तुम्हारा राज्य है, अतएव हे अँगरेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम दिवाकर हो-तुम्हारे प्रकाश से हमारा अज्ञानांधकार दूर होता है, तुम अगि* हो- क्योंकि सब खाते हो, तुम यम हो- विशेष करके अमला वर्ग के, अतएव हे अँगरेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम वेद हो- और रिग्यजुस्साम को नहीं मानते, तुम स्मृति हो- मन्वादि भूल गए, तुम दर्शन हो- क्योंकि न्यास मीमांसा तुम्हारे हाथ हैं, अतएव हे अँगरेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
हे श्वेतकाँत- तुम्हारे अमल धवल द्विरद रद शुभ्र महाश्मश्रु शोभित मुख मंडल देख करके हमें वासना हुई कि हम तुम्हारी स्तुति करै अतएव हे अँगरेज हम तुमको प्रणाम करते हैं।
तुम्हारी हरित कपिश पिङ्गल लोहित कृष्णा शुभ्रादि नानावर्ण शोभित अतिशयरंजित भल्लुकमेदमार्जितकुंतलावलि देखकरके हमको वासना हुई कि हम तुम्हारा स्तव करैं, अतएव हे अँगरेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
हे वरद! हमको वर दो, हम सिर पर शमला बाँध के तुम्हारे पीछे पीछे दौडेंगे, तुम हमको चाकरी दो हम तुमको प्रणाम करते हैं।
हे शुभंकर! हमारा शुभ करो, हम तुम्हारी खुशामद करैंगे, और तुम्हारे जी की बात कहेंगे, हमको बडा बनाओ हम तुमको प्रणाम करते हैं।
हे मानद! हमको टाइटल दो, खिताब दो, खिलअत दो, हमको अपना प्रसाद दो हम तुमको प्रणाम करते हैं।
हे भक्तवत्सल! हम तुम्हारा पात्रावशेष भोजन करने की इच्छा करते हैं, तुम्हारे कर स्पर्श से लोक मण्डल में महामानास्पद होने की इच्छा करते हैं, तुम्हारे स्वहस्तलिखित दो एक पत्र बक्स में रखने की स्पर्द्धा करते हैं, हे अँग्रेज! तुम हम पर प्रसन्न हो हम तुम को नमस्कार करते हैं।
हे अंतरयामिन! हम जो कुछ करते हैं केवल तुम को धोखा देने को, तुम दाता कहो इस हेतु हम दान करते हैं, तुम परोपकारी कहो इस हेतु हम परोपकार करते हैं, तुम विद्यमान कहो इस हेतु हम विद्या पढते हैं, अतएव हे
अँग्रेज! तुम हम पर प्रसन्न हो हम तुमको नमस्कार
करते हैं।
हम तुम्हारी इच्छानुसार डिस्पेंसरी करैंगे, तुम्हारे प्रीत्यर्थ स्कूल करैंगे तुम्हारी आज्ञा प्रमाण चंदा देंगे, तुम हम पर प्रसन्न हो, हम तुम को नमस्कार करते हैं।
हे सौम्य! हम वही करेंगे जो तुम को अभिमत है, हम बूट पतलून पहिरैंगे, नाक पर चश्मा देंगे, कांटा और चिमिटे से टिबिल पर खायेंगे, तुम हम पर प्रसन्न हो हम तुम को प्रणाम करते हैं।
हे मिष्टभाषिण! हम मातृभाषा त्याग करके तुम्हारी भाषा बोलैंगे, धर्म छोड के ब्राह्म धर्मावलंब करैंगे, बाबू नाम छोड कर मिष्टर नाम लिखवावेंगे, तुम हम पर प्रसन्न हो हम तुम को प्रणाम करते हैं।
हे सुभोजक! हम चावल छोड के पावरोटी खायंगे, निषिद्धमांस बिना हमारा भोजन ही नही बनता, कुक्कर हमारा जलपान है, अतएव हे अंग्रे*ा! तुम हम को चरण में रक्खो हम तुम को प्रणाम करते हैं।
हम विधवा विवाह करैंगे, कुलीनों की ज्ञाति मारैंगे, जाति भेद उठा देंगे- क्योंकि ऐसा करने से तुम हमारी सुख्याति करोगे, अतएव हे अंग्रे*ा! तुम हम पर प्रसन्न हो हम तुम को नमस्कार करते हैं।
हे सर्वद! हम को धन दो, मान दो, यश दो, हमारी सब वासना सिद्ध करो, हम को चाकरी दो, राजा करो, रायबहादुर करो, कौंसिल का मिंबर करो हम तुम को प्रणाम करते हैं।
यदि यह न हो तो हम को डिनर होम में निमंत्रण करो, बडी बडी कमेटियों का मिम्बर करो, सीनट का मिम्बर करो, जसटिस करो, आनरेरी मजिस्ट्रेट करो, हम तुम को प्रणाम करते हैं।
हमारी स्पीच सुनो, हमारा एसे पढो हम को वाह वाही दो, इतना ही होने से हम हिंदू समाज का अनेक निन्दा पर भी ध्यान न करेंगे, अतएव हम तुम्हीं को नमस्कार
करते हैं।
हे भगवान-हम अकिञ्चन हैं और तुम्हारे द्वार पर खडे रहेंगे, तुम हमको अपने चित्त में रक्खो हम तुम को डाली भेजेंगे, तुम अपने मन में थोडा सा स्थान मेरी ओर से भी दो, हे अंग्रेज! हम तुमको कोटि कोटि साष्टांग प्रणाम करते हैं।
तुम दशावतार धारी हो, तुम मत्स हो क्योंकि समुद्रचारी हो और पुस्तक छाप छाप के वेद का उद्धार करते हौ, तुम कच्छ हो क्योंकि मदिरा, हलाहल, वारांगना, धन्वन्तर और लक्ष्मी इत्यादि रत्न तुमने निकाले हैं पर वहां भी विष्णुत्व नहीं त्याग किया है अर्थात् लक्ष्मी उन रत्नों में से तुमने आप लिया है, तुम श्वेत वाराह हो क्योंकि गौर हो और पृथ्वी के पति हो, अतएव हे अवतारिन्! हम तुम को नमस्कार करते हैं।
तुम नृसिंह हो क्यकि मनुष्य और सिंह दोनों पन तुम में है टैक्स तुम्हारा क्रोध है और परम विचित्र हो, तुम वामन हो क्योंकि तुम बामन कर्म्म में चतुर हो, तुम परशुराम हो क्योंकि पृथ्वी निक्षत्री करदी है, अतएव हे लीलाकारिन्! हम तुमको नमस्कार करते हैं।
तुम राम हो क्योंकि अनेक सेतु बाँधे हैं, तुम बलराम हो क्योंकि मद्यप्रिय और हलदारी हो, तुम बुद्ध हो क्योंकि वेद के विरुद्ध हो, और तुम कल्कि हो क्योंकि शत्रु संहारकारी हो, अतएव हे दश विधि रूप धारिन! हम तुमको नमस्कार करते हैं।
तुम मूर्तिमान् हो! राज्यप्रबंध तुम्हारा अंग है, न्याय तुम्हारा शिर है, दूरदर्शिता तुम्हारा नेत्र है और कानून तुम्हारे केश है अतएव हे अंगे**ा! हम तुमको नमस्कार करते हैं।
कौंसिल तुम्हारा मुख है, मान तुम्हारी नाक है, देश पक्षपात तुम्हारी मोछ है और टैक्स तुम्हारे कराल दंष्ट्रा हैं अतएव हे अंगरेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं हमारी
रक्षा करो।
चुंगी और पुलिस तुम्हारी दोनों भुजा हैं, अमले तुम्हारे नख हैं, अन्धेर तुम्हारा पृष्ट है और आमदनी तुम्हारा ह्रदय है अतएव हे अंग्रेज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
खजाना तुम्हारा पेट है, लालच तुम्हारी क्षुधा है, सेना तुम्हारा चरण है, खिताब तुम्हारा प्रसाद है, अतएव हे विराटरूप अंगे*ज! हम तुमको प्रणाम करते हैं।
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानयागादिकाः क्रिया।
अंगे*ज स्त्वपाठस्य कलां नार्हति षोडशीम्।।१।।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
स्टारार्थी लभते स्टारम् मोक्षार्थी लभते गतिं।।२।।
एक कालं द्विकालं च त्रिकालं नित्यमुत्पठेत्।
भव पाश विनिमुक्र्तः अंग्रेज लोकं संगच्छति।।३।।?