कश्मीर का विस्थापन-साहित्य ः जलावतनी का दर्द अभी बाकी है

डॉ. शिबन कृष्ण रैणा


अशांति, विभ्रम और संशयग्रस्तता की स्थिति में किसी भी भाषा के साहित्य में उद्वेलन, विक्षोभ, चिन्ताकुलता और आक्रोश के स्वर अनायास ही परिलक्षित होते हैं। कश्मीरी के ‘विस्थापन साहित्य’ में भी कुछ इसी तरह का परिदृश्य नजर आता है। दरअसल, कश्मीर का ‘विस्थापन सहित्य’ कट्टर, क्रूर और गैर-राष्ट्रवादी ताकतों की राष्ट्रवादी ताकतों के साथ सीधी-सीधी जंग का प्रतिफलन है। बर्बर बहु-संख्याबल के सामने मासूम अल्प संख्या-बल को झुकना पडा जिसके कारण ‘पंडित समुदाय’ भारी संख्या में कश्मीर घाटी से विस्थापित हुआ और पिछले लगभग तीन दशकों से अपनी अस्मिता और इज्जत की रक्षा के लिए संघर्षरत है।
माना जाता है कि कश्मीर घाटी से पंडितों का विस्थापन सात बार हुआ है। पहला विस्थापन १३८९ ई. के आसपास हुआ जब घाटी में विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा बलपूर्वक इस्लामीकरण के परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में या तो पंडित हताहत हुए या फिर अपनी जान बचाने के लिए वे भाग खडे हुए। इस बीच अलग-अलग कालावधियों में पाँच बार और पंडितों का घाटी से निष्कासन हुआ। सातवीं और आखिरी बार पंडितों का विस्थापन १९९० में हुआ। आंकडे बताते हैं कि पाक-समर्थित जिहादियों के आतंक से त्रस्त होकर १९९० में हुए विस्थापन के दौरान तीन से सात लाख के करीब पंडित कश्मीर से बेघर हुए।
१९९० में हुए कश्मीरी पंडितों के घाटी से विस्थापन की कथा मानवीय यातना और अधिकार-हनन की त्रासद गाथा है। यह दुर्योग अपनी तमाम विडम्बनाओं और विसंगतियों के साथ आज हर चिन्तक, बुद्धिजीवी और जनहित के लिए प्रतिबद्ध रचनाकार के लिए चिन्ता और चुनौती का कारण बना हुआ है। विस्थापन की त्रासदी के बीच टूटते भ्रमों और ढहते विश्वासों को कन्धा देते हुए कश्मीर के रचनाकारों ने विस्थापितों के दुःस्वप्नों और उनकी स्मृतियों को व्यवस्था और जागरूक देश-वासियों के सामने रखकर विस्थापन से जनित स्थितियों और उनके दुष्प्रभावों को बडी मार्मिकता के साथ अपने रचना-कर्म में बयान किया है और बयान कर रहे हैं।
ध्यान से देखा जाय तो कश्मीर में आतंकवाद के दंश ने कश्मीरी जनमानस को जो पीडा पहुंचायी है, उससे उपजी हृदय-विदारक वेदना तथा उसकी व्यथा-कथा को साहित्य में ढालने के सफल प्रयास पिछले लगभग ढाई-तीन दशकों के बीच हुए हैं और अब भी हो रहे हैं। कई कविता-संग्रह,कहानी-संकलन, औपन्यासिक कृतियां आदि सामने आए हैं,जो कश्मीर में हुई आतंकी बर्बरता और उससे जनित एक विशेष जन-समुदाय (कश्मीरी पंडितों) के ‘विस्थापन’ की विवशताओं को बडे ही मर्मस्पर्शी अंदाज में व्याख्यायित करते हैं। कहना न होगा कि पंडितों के घाटी से विस्थापन के कारणों और उससे जनित पंडित-समुदाय पर पडे सामाजिक-सांस्कृतिक दुष्प्रभावों को लेकर देश में समय-समय पर अनेक परिचर्चाएं, संगोष्ठियाँ, आयोजन आदि भी हुए हैं परन्तु विस्थापन के दौरान कश्मीरी लेखकों द्वारा रचे गए साहित्य की सम्यक मीमांसा, उसका आलोचनात्मक अध्ययन आदि अधिक नहीं हुआ है।
विस्थापन की त्रासदी भोगते रचनाकारों की सबसे बडी पीडा जो कभी उन्माद की हदें छूने लगती है, आतंकवाद से छूटे घर-संसार की पीडा है। घर मात्र जमीन का टुकडा या ईंट-सीमेंट का खांचा-भर होता तो कभी भी, कहीं पर भी बनाया जा सकता था। घर के साथ घर छूट जाने वाले की पहचान, स्मृतियों की भरी-पूरी जमीन और अस्मिता के प्रश्न जुडे होते हैं। विस्थापितों से, दरअसल, जमीन का टुकडा ही नहीं छूटा, उनकी आस्था के केन्द्र वितस्ता, क्षीर-भवानी और डल झील भी छूट गये हैं। कश्मीर में बर्फ के तूदों (ढेर) के बीच मनती शिवरात्रि और वसंत की मादक गंध में सांस लेता ‘नवरोज-नवरेह’ भी था। घर छूटने का अर्थ मोतीलाल साकी के शब्दों में ‘‘वही जानता है, जिसने अपना घर खो दिया हो।’’ बात १९९० के आसपास की है। घर से बेघर हुओं ने विकल्पहीन स्थितियों को स्वीकारते हुए भी उम्मीद नहीं छोडी थी, यह सोचकर कि एक दिन हालात सुधर जाएंगे और हम वापस अपने घरों को लौट जाएंगे। आखिर हम एक स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के नागरिक हैं। मगर, शंभूनाथ भट्ट ‘हलीम’ घर लौटने को विकल विस्थापितों से कहते हैं, ‘‘आतंकवाद ने वादी के आकाश और धरती के रंग बदल दिए हैं। वहां जाकर तुम क्या पाओगे? हमारी अपनी धरती अब हमारे लिए पराई हो गई है।’’
पंडितों को वादी से खदेडने की साजिश में जिन छोटे-बडे रहनुमाओं, साम्प्रदायिक तत्वों और पाक समर्थित जिहादियों/आतंकवादियों के हाथ रहे हैं, वे आज भी बेखटके वादी की सामासिक संस्कृति के परखच्चे उडाने में लगे हुये हैं और कहते हैंः ‘‘बट/पंडित तो सदा से भगोडे रहे हैं।’’ अग्निशेखर को भगोडा शब्द कचोटता है, वे लिखते हैंः
‘‘आंखें फोडीं, बाहें काटीं, बेकसूर थे भागे पंडित,
किसको चिंता? लावारिस हैं, भागे पंडित।’’
महाराज कृष्ण भरत लिखते हैं-‘‘मुझसे मिलने के लिए/किसी को खटखटाना नहीं होगा दरवाजा/केवल फटेहाल सरकारी तम्बू का पर्दा सरकाना होगा।’’
घाटी में छूटे घरों को जिहादियों ने मलबे के ढेर में बदल दिया। चन्द्रकान्ता को जले हुए छान-छप्परों में ‘घर’ की शिनाख्त करते लगता है कि ‘‘घर की लाश टुकडों में बंट कर पूरी वादी में छितर गई है।’’ शशिशेखर तोषखानी अपनी गली के कीचड को भूल नहीं पाते, जो घर छोडते समय, मोहवश पैरों से लिपट गई थी। ऐसे घर और गलियों को छोडना आसान नहीं था। तोषखानी कहते हैं।
‘‘कत्लगाहों के नक्शों में/हमारे सिर रखे जा रहे हैं/मील के निशानों की जगह/और कोई दिशा तय नहीं है यहां/मृत्यु के सिवा।’’
विस्थापन अथवा जलावतनी की त्रासदी ने कवि ब्रजनाथ बेताब के मन-मस्तिष्क को बहुत गहरे तक आक्रांत कर दिया है। उनकी यह पीडा उनके रोम-रोम में समाई हुई है। घर-परिवार की सुखद स्मृतियों से लेकर आतंकवाद की आग तक की सारी क्रूर स्थितियां कवि की एक-एक पंक्ति में उभर-उभर कर सामने आती हैं। आतंकी विभीषिकाओं का कवि द्वारा किया गया वर्णन और उससे पैदा हुई सामाजिक असमानता/स्थितियां मन को यों आहत करती हैं-
‘मैं कवि नहीं हूं
न मेरी धरा के सीने में छिपा मेरा लहू
मेरी कविता है।
क्योंकि मैं अपने लहू को छिपाने का नहीं
लहू से धरा को सींचने का आदी रहा हूं।
यही मेरी विरासत, मेरी परंपरा है
जिसे निभाते निभाते मैं
बहुसंख्यक होते हुए भी अल्पसंख्यक हो गया हूं।...’
विस्थापन में रचना करते हिन्दी कवियों के महाराज कृष्ण संतोषी, अवतार कृष्ण राजदान, रतनलाल शान्त, उपेन्द्र रैणा, महाराज कृष्ण भरत, क्षमा कौल, चन्द्रकान्ता से लेकर सुनीता रैना, प्यारे हताश तक ढेरों नाम हैं, जिनकी रचनाओं में एक रची-बसी विरासत के ढहने और पहचान के संकट की पीडा है। भ्रष्ट राजनीति और अवसरवादी नेताओं की गैरजिम्मेदारियों और ढुलमुल नीतियों के प्रति आक्रोश है क्योंकि वे लोग जवाबदेह हैं कल्हण के स्वर्ग को रक्त-रंजित रणक्षेत्र बनाने के लिए। कश्मीरी-भाषी कवि ‘साकी के शब्दों मेंः
‘‘आज वादी में दहशत का आलम है/डूलचू की पीढी जवान हो गई है/लल्लद्यद और शेखुलआलम को आज कौन सुनेगा?/बादशाह की रूह कांप रही है/और वितस्ता का पानी बदरंग हो गया है।’’
विस्थापितों के पास अतीत की स्मृतियां ही नहीं, वर्तमान के दंश भी हैं। शिविरों में पशुवत जीवन जीते संभ्रांत लोगों की दुर्दशा पर कवि उद्विग्न है। नयी पीढी चौराहे-पर भौंचक्क खडी दिशा ढूंढ रही है। ‘साकी’ उन बच्चों के लिए चिंतित हैं, जो तम्बुओं में पलते हुए मुरझा गए हैं। वे
कहते हैंः
‘‘हमारे लोकतंत्र के नए अछूत हैं मारे-मारे फिरना/अब इनकी सजा है/ये, माँ कश्मीर की बेबस बेचारी
संतान हैं।’’
इतिहास कहता है कि कश्मीरी पंडित अभिनवगुप्त, कल्हण, मम्मट और बिल्हण की संतानें हैं। इनके पूर्वजों को भरोसे/उदारता की आदत विरासत में मिली है। लेकिन, कुल मिलाकर इस बदलते समय में, भरोसे की आदत ने इन्हें ठगा ही है। विश्वासों की पुरानी इबारत, वक्त की आंधी में ध्वस्त हो गई है। कवयित्री चन्द्रकान्ता कहती हैंः
‘‘ तुम्हारे काम नहीं आएगी मेरे बच्चों भरोसे की वह इबारत, खुदा की हो या नेता की हो, खुद तुम्हें लिखनी होगी वक्त के पन्ने पर नयी इबारत।’’
विस्थापित कश्मीरी लेखक जब घर छूटने या शरणार्थियों की पीडाओं को स्वर देता है तो निजी पीडा की बात करते हुए भी उसकी संवेदनाएं वैश्विक होकर उन बेघर-बेजमीन लोगों के साथ जुड जाती हैं जिनकी व्यथा उससे भिन्न नहीं है, भले कारण भिन्न हों। वह चाहे गुजरात की त्रासदी हो, उडीसा या आंध* का तूफान हो, तिब्बतियों-अफ्रीकियों या फिर फिलिस्तीनियों की पीडा हो, संवेदना के तार उन्हें एक दूसरे से जोडते हैं। तभी तो महाराजकृष्ण संतोषी कहते हैं कि ‘‘अपने घर से विस्थापित होकर मैंने बिना यात्रा किए ही फिलिस्तीन को भी देखा और तिब्बत को भी’’, इन तमाम निराशाओं और अनिश्चितताओं के बावजूद रचनाकार हार नहीं मान रहा। राधेनाथ मसर्रत, वासुदेव रेह, शान्त, संतोषी, क्षमा कौल या चन्द्रकान्ता आदि सभी की उम्मीदें जीने का हौसला बनाए रखे हुए हैं। तोषखानी को भरोसा है कि,’ ‘फैलेगा हमारा मौन, नसों में रक्त की तरह दौडता हुआ... मांगेगा अपने लिए एक पूरी जमीन।’
‘शान्त’ वादी से दूर रहकर वादी के इतिहास को नए सिरे से रचना चाहता है-‘‘अंधेरा है अभी, पर सूर्य जरूर निकलेगा।’’ और संतोषी कहता है, ‘‘इस बार सूर्य मेरी नाभि से निकलेगा।’’
विस्थापन त्रासद होता है, खासतौर पर अपने ही देश में हुआ विस्थापन। वह लज्जास्पद भी होता है और आक्रोश का कारण भी। वह मानवीय यातना और मनुष्य के मूल अधिकारों से जुडे बेचैन करने वाले प्रश्नों को जन्म देता हैं, जिन्हें रचनाकार स्वर देकर एक समानान्तर इतिहास रचता रहे हैंः कविताओं में भी, कहानियों में भी और ‘‘कथा सतीसर’’, ‘‘पाषाण युग’’ ‘‘दर्द पुर’’ आदि जैसे उपन्यासों में भी। कश्मीरी लेखकों के ‘विस्थापन साहित्य’ को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता हैः १-हिन्दी में लिखा गया विस्थापन साहित्य, २-अंग्रेजी में लिखा गया विस्थापन साहित्य और, ३-उर्दू/कश्मीरी में लिखा गया विस्थापन साहित्य।
यहाँ पर मुख्यतया हिन्दी में रचित कश्मीरी लेखकों द्वारा लिखित ‘विस्थापन-साहित्य’ को ही केंन्द्र में रखा गया है। इस चर्चा द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि चूंकि साहित्य समाज का दर्पण होता है, इसलिए कश्मीरी लेखकों द्वारा रचित ‘विस्थापन-साहित्य’ अपने समय और समाज की विषमताओं, चिंताओं, दुरावस्थाओं, आकुलताओं आदि का बखूबी वर्णन करता है। इस वर्णन में भाव और शिल्प के स्तर पर मर्म को छूने वाली जिन अनुभूतियों से साक्षात्कार होता है, वे कश्मीरी साहित्य के साथ-साथ भारतीय/हिंदी साहित्य की भी बहुमूल्य निधि हैं।
यहाँ पर प्रसंगवश यह कहना अनुचित न होगा कि कश्मीर में कुछेक ऐसे भी रचनाकार हैं जो यद्यपि ‘पंडित’ नहीं हैं किन्तु पंडितों के विस्थापन की त्रासदी से विक्षुब्ध हैं। अपने भाइयों से विलग होने और खुद को असहाय पाने की पीडा इन रचनाकारों ने भोगी है। कश्मीरी कवि बशीर अत्तहर की कविता ‘‘कहाँ जाऊँ मैं?’’ इसका प्रमाण हैः
‘तुम समझते हो तुम्हारे अस्तित्व को मैं लील गया
पर, उस प्रयास में मेरा अस्तित्व कहाँ गया
यह शायद तुम्हें मालूम नहीं।
मैंने कल ही एक नई मुहर बनवाई और
लगा दी ठोंककर हर उस ची*ा पर
जो तुम्हारी थी।
लेकिन यह खयाल ही न रहा कि
उन कब्रिस्तानों का क्या करूँ
जो फैलते जा रहे हैं रोज-ब-रोज
और कम पड रहे हैं हर तरफ बिखरी लाशों को समेटने में!
बस, अब तो एक ही चिंता सता रही है हर पल,
तुम को चिता की आग नसीब तो होगी कहीं-न-कहीं
पर, मेरी कब्र का क्या होगा मेरे भाई?’
कश्मीरी पंडितों की अपने ही देश में हुयी जलावतनी को लेकर मुझे कई सभा-गोष्ठियों में बोलने अथवा अपने आलेख पढने का अवसर मिला है। विस्थापन से जुडे कई कश्मीरी लेखकों की रचनाओं का ‘रिव्यु’ अथवा अनुवाद करने का अवसर भी मिला है। साहित्य अकादमी, दिल्ली ने कई वर्ष पूर्व गिधर राठी के सम्पादन में ‘‘कश्मीर का विस्थापन साहित्य’’ पर जो विशेषांक निकाला था, उसमें मेरी भी दो-एक रचनाएँ सम्मिलित हैं। (इस गंभीर, हृदय-स्पर्शी और समय-सापेक्ष विषय पर अलग से एक पुस्तकाकार रचना तैयार करने की *ारूरत है। इस काम को हाथ में लेने की मेरी योजना है।)
चंद्रकांता के अनुसार ‘कश्मीर की संत कवयित्री ललद्यद ने चौदहवीं शती में एक ‘वाख’ कहा था-‘‘आमि पन सोदरस...।’’
कच्चे सकोरों से ज्यों पानी रिस रहा हो, मेरा जी भी वैसे ही कसक रहा है, कब अपने घर चली जाऊं ? आज ललद्यद का यही ‘वाख’, इक्कीसवीं सदी के इस भूमंडलीकरण के दौर में विस्थापित कश्मीरियों के अन्तर की हूक बनकर साहित्य में अभिव्यक्त हो रहा है। सिर्फ संदर्भ बदल गए हैं। संत कवयित्री ललद्यद ने यह ‘वाख’ आध्यात्मिक संदर्भों में कहा था, धरती पर उसका कोई घर नहीं था, लेकिन आम-जन ईंट-गारे से बने उस घरौंदे की बात करता है, जिसमें उसके स्वप्न, स्मृतियां और भविष्य दफन हो गए हैं। लेकिन हूक वही है जो नश्तर-सी अंतर में गडी है।’ यों, ललद्यद ने यह भी कहा थाः
‘‘शिव/प्रभु थल-थल में विराजते हैं
रे मनुष्य! तू हिन्दू और मुसलमान में भेद न जान,
प्रबुद्ध है तो अपने आप को पहचान,
यही साहिब/ईश्वर से है तेरी पहचान’’
काल को महाबली कहा गया है। कोई आश्चर्य नहीं कि कश्मीर की इस महान् आदि संत-कवयित्री योगिनी ललद्यद (१४ वीं शती) की वाणी में निहित सन्देश कश्मीरी जनमानस को उद्वेलित-अनुप्राणित कर घाटी में एक
बार पुनः अमन-चैन का वातावरण स्थापित करने की
प्रेरणा दे। ?