महामना की दृष्टि में धर्म एवं ईश्वर

राजीव मिश्र


महामना पं. मदन मोहन मालवीय परम धार्मिक थे और सनातन धर्म के उपासक। वे कहते थे कि इस पृथ्वी मण्डल पर जो वस्तु मुझको सबसे अधिक प्यारी है वह धर्म है और वह सनातन धर्म है। सनातन शब्द का अर्थ है शाश्वत अर्थात् वह धर्म जो सदा-सदा के लिए इस भारत भूमि पर फैला हुआ है।
उनका कहता था कि धर्म तो शाश्वत है। मनुष्य को किसी काल में भी उसके नियमों का पूर्ण रूप से पालन करने पर सदा के लिए परमानन्द, परमशक्ति, निर्वाण या मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपनी तपस्या से जिस पूर्ण (धर्म) सत्य क जान कर उपदेश दिया था वह स्वतः सिद्ध है क्योंकि प्रकाश को दीपक दिखाने की आवश्यकता नहीं है। वह तो मनुष्य मात्र की सम्पत्ति है। उसकी रक्षा तथा प्रचार करना प्रत्येक विवेकी और मननशील मनुष्य का कर्तव्य है। वे सनातन धर्म एवं संस्कृति के मूर्तरूप थे, सनातन धर्म की उन्हें व्यापक दृष्टि प्राप्त थी।
महामना को व्यास जी वही परिभाषा स्वीकार है जिसमें कहा गया है जो तत्व मनुष्य के, समाज के, राष्ट्र के और विश्व के जीवन की धारण करता है वही धर्म है- ‘धारणाद् धर्म मित्याहुधर्मो धारयति प्रजाः’। धर्म ही सभी मनुष्यों को एकता के सूत्र में बाँधता है और कर्तव्य को पूरा करने की प्रेरणा देता है। धर्म मार्ग का अनुसरण कर मानव इह लोक में सुख-शांति को प्राप्त करता हुआ मृत्यूपरान्त परमपद मोक्ष को प्राप्त करता है।
महामना की धार्मिक अवधारणाएँ मानव कल्याण की भावना से अनुप्राणित थी। कल्याण की वृद्धि को वे सब वर्णों और आश्रमों का लक्ष्य स्वीकार करते थे। उनके विचार में निष्काम भाव से समाज की सेवा ही परम तप और परम धर्म है। निष्काम भाव के महत्व की व्याख्या करते हुए वे कहते थे कि ‘‘जो लोग निष्काम भाव से काम नहीं करते-उन लोगों में परस्पर ईर्ष्या द्वेष उत्पन्न हो जाते हैं और कार्य सफल नहीं होने पाता है, किन्तु जहाँ निष्काम भाव से कार्य होता है वहाँ लोग दूसरे की सफलता देखकर प्रसन्न होते हैं और एक दूसरे के प्रति प्रेम और सहानुभूति का भाव उत्पन्न होता है और कार्य में शीघ्र ही सफलता प्राप्त होती हैं। निष्काम भाव से काम करने वाले लोग यह समझकर कि जो काम हम करते हैं, वह ईश्वर का काम ही है और ईश्वर हमारा सहायक है, किसी विघ्न या बाधा से पीछे नहीं हटते।’’
हिन्दू धर्म के प्रति उनकी दृढ निष्ठा थी। वे अपने सनातन धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझते थे, वह उनकी निष्ठा सहिष्णुता से समन्वित थी। वे समान रूप से सब धर्मों, धर्म ग्रन्थों, धर्म गुरुओं का आदर करना, सब धर्मनिष्ठ व्यक्तियों का कर्तव्य समझते थे। वे कहते थे कि ‘‘जब मैं किसी गिरिजाघर या मस्जिद के पास से गुजरता हूँ, तब मेरा सिर सम्मान से झुक जाता है।’’ उनका कहना था कि ‘‘मैं सदैव अपने धर्म का विश्वासी और पाबन्द हूँ, किसी के धर्म के अपमान करने का ख्याल तक मरे दिल में कभी नहीं आया।’’
जीवन के प्रति महामना का दृष्टिकोण धार्मिक था। उन्हें धर्म की जीवनदायिनी शक्तियों में हार्दिक विश्वास था। उनका कहना था कि धार्मिक नियमों, यमों और व्रतों का पालन करने से जो नैतिक प्रगति होती है वह भौतिक समृद्धि से अधिक सारयुक्त है। वे कर्तव्यपरायणता, भक्ति तथा समर्पण की धर्मिक समृद्धि भावनाओं को राष्ट्रीय महानता का साधन मानते थे। नैतिक मूल्यों की पवित्रता तथा आवश्यकता को उन्होंने गम्भीरता से हृदयंगम कर लिया था। वे महाभारत के इस उपदेश के अनुयायी थे कि स्थायी विजय धर्म के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा का समर्थन किया।
धर्म के सम्बन्ध में महामना के विचार एकदम स्पष्ट थे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत धर्म के विषय में कहा था कि घर में ब्राह्मण धर्म है, परिवार में सनातन धर्म है, समाज में हिन्दू धर्म है और विश्व में मानव धर्म है। उनके अनुसार धर्म बडे-बडे गुणों का समूह है, वस्तुतः धर्म उन व्यवस्थाओं और उन नियमों का नाम है जो समाज को तथा राज्य के विविध अंगों को धारण किए रहते हैं। धर्म के जो मूल सिद्धान्त हैं उन सबका उद्देश्य देश में सुख-शान्ति और समृद्धि उत्पन्न करना है तथा मनुष्य को परलौकिक गहन विषयों का चिन्तन करने के योग्य बनाना है। वे धर्म को लोक संग्रहकारी शक्ति मानते थे। उनका कहना था कि संसार में सब पदार्थ बदलते रहते हैं और सुख-ःदुख होते रहते हैं किन्तु धर्म नित्य है। धर्म कभी नहीं बदलता। यदि प्राण भी जाता है तो धर्म कभी न त्यागो। धर्म चरित्र निर्माण तथा सांसारिक सुख का सीधा मार्ग है। इससे मनुष्य में उच्चकोटि की निस्वार्थ सेवा की भावना आती है, जिससे समाज तथा राष्ट्र का कल्याण होता है। महामना का वचन था कि सबसे बडा उपकार जो किसी प्राणी का कोई कर सकता है वह यह है कि उसको धर्म का ज्ञान करा दे। धर्म में उसकी श्रद्धा उत्पन्न कर दे अथवा दृढ कर दे। संसार में धर्म के समान दूसरा कोई दान नहीं है।
महामना के अनुसार आत्मा अविनाशी है क्योंकि वह ईश्वर का अंश है। उसके देह से निकल कर जाने पर शरीर मृत हो जाता है। शरीर का मृत हो जाना यह सिद्ध करता है कि ईश्वर है। उनके शब्दों में- ‘‘मनुष्य के मुख से जो शब्द निकलता है वही इस बात की घोषणा करता है कि ईश्वर है। लोग कहते हैं कि नाक सूँघती है, त्वचा स्पर्श करती है। किन्तु कौन सूँघता है, कौन स्पर्श करता है, कौन सुनता है? जब तक देह में प्राण है तभी तक ये इन्दियाँ काम करती है। प्राण निकल जाने पर ये इन्द्रियाँ एक क्षण भी अपना काम नहीं कर सकती है। जिस मुख को देखने के लिए पुरुष, स्त्री, माता, पिता, भाई, बन्धु मित्र सभी व्याकुल रहते थे, प्राण के निकलते ही उस मुख को ढाँक देते हैं। क्यों? इसलिए कि प्राण ही आत्मा था, वह निकल गया तो शरीर निःसत्व हो गया। वही प्राण, वही आत्मा ईश्वर का अंश है, वह अविनाशी है।’’
महामना कहते हैं कि हमारा अपना जीवन सिद्ध करता है कि ईश्वर की सत्ता है। उसके अस्तित्व के समर्थन में वे एक विलक्षण तर्क प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि यदि ईश्वर नहीं होता तो मनुष्य और पशु में हम अन्तर नहीं कर पाते। उनके अनुसार ‘‘यदि हम को ईश्वर का ज्ञान नहीं हुआ, यदि हमने ईश्वर की महिमा नहीं समझी, यदि उनके चरणों में भक्ति न की, तो पशु और हममें क्या भेद रहा?’’
उनके दर्शन में ईश्वर स्मरण, स्तुति, जप आदि का विशेष महत्व है। ईश्वर का स्मरण केवल मनुष्य के प्रति ही नहीं अपितु सभी जीवन धारियों के प्रति दया तथा सहानुभूति का संचार करता है। उनका कहना है कि परमात्मा को प्राणिमात्र में व्याप्त समझ कर भक्ति करनी चाहिए। ऐसी भक्ति सभी प्राणियों तथा जीव धारियों के प्रति प्रेम तथा प्रीति उत्पन्न करती है। वे अपने इस मत के समर्थन में श्रीमद् भागवत से भक्त शिरोमणि प्रहलाद के कथन को उद्धृत करते है- ‘‘गोविन्द भगवान के प्रति एकान्त भक्ति करना चराचर प्राणियों में भगवान है, ऐसी भावना करना ही इस लोक में सबसे उत्तम स्वार्थ है।’’ वे ईश्वर की सबसे उत्तम पूजा यही मानते हैं कि सब प्राणिमात्र में ईश्वर का भाव देखें, सबसे मित्रता का भाव रखें और सबका हित चाहें।
महामना धर्माधृत चिंतन के प्रयोगकर्त्ता थे। सनातन धर्म पर उनकी अटूट आस्था थी। वे मूर्तिपूजक थे। तुलसी के रामचरितमानस को वे ‘पंचम वेद’ मानते थे। उन्होंने स्वीकार किया कि यदि रामचरितमानस की रचना न हुई होती तो भारत से धर्म ही मिट जाता। तुलसी के चिंतन और राम के आदर्श की छाप उनकी सोच में दिखाई पडती है। वे हनुमद् भक्त थे। शिव के उपासक थे। तुलसी ने काशी में १०८ हनुमान मन्दिरों की स्थापना की। महामना ने उसकी परिक्रमा की थी। उन्होंने हनुमान को शिव का रूप माना। महामना ने तुलसी के जिस रामचरितमानस को अपनी आस्था और श्रद्धा का केन्द्र बनाया उसके मूल स्वर भागवत में भी सुनाई पडते हैं। वस्तुतः मानस का आधार भगवद्गीता भी है। महामना मानस और भगवद्गीता दोनों के प्रति श्रद्धानत दिखाई पडते हैं।
महामना महाकवि भवभूति के उसी आदर्श के अनुयायी थे जिसके राम।
‘स्नेहं, दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे यथा।।
लोकराधन के लिए स्नेह, दया, सुख अथवा जानकी को छोडने में मुझे (राम को) कोई कष्ट नहीं है।
महामना ने भी लोककल्याण के लिए अपने सभी सुखों को तिलांजलि दे दी। देश की सेवा में उन्होंने कभी भी परिवार को सामने नहीं आने दिया। पवित्र भाव से दीन-दुखियों की सेवा में लगे रहे। उनका कहना या ‘अपनी इच्छा से बिना किसी बंधन या स्वार्थ के किसी दीन दुखी प्राणी की सेवा करने से बडा यज्ञ और कुछ नहीं है।’ यही पूजा है। ?
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