भगवतीलाल व्यास और उनका काव्य संसार

डॉ. नरेन्द्र चतुर्वेदी


शब्दों की धरती है कविता भगवतीलाल व्यास हिन्दी कविताओं का महत्वपूर्ण संग्रह है। नन्द भारद्वाज ने इस कविता संग्रह का पुरोवाक लिखा है। संग्रह की भूमिका में आपने कहा है, ‘‘विषय वस्तु या संदर्भ कोई भी हो अपने बयान की सादगी, साफगोई और आम बोलचाल की भाषा में किसी भी गूढजीवन अनुभव को कविता में सहेज लेना कवि भगवती लाल व्यास की रचनाशीलता की अपनी विशेषता है।
वे एक सरल स्वभाव के सजग कवि हैं। व्यास जी का कविता के साथ सरोकार सुखद है। वे कवि हैं, बस इतना पर्याप्त है। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता स्वयं के आत्म परिष्कार में है। यही कविता की वास्तविक भूमिका है। कविता जब अन्तर्मुखी होती है तो वह कवि को अभय सौंपती है। कवि का बाहर आकर्षण, बाहर की वैचारिक प्रतिबद्धता पतझड के पत्तों की तरह गिर जाती है।
‘जंगल में आग लगेगी
तो तुम्हें ही सौंपना है
अपना घोंसला
बडे बडे पेडों पर बने
मचानों का
कुछ नहीं बिगडेगा’ पृ. १५ जंगल में आग लगी है
उनकी कविताओं से गुजरते हुए पाठक स्वयं उनके साथ शरीक हो जाता है। यहां बडबोलापन नहीं है। सीधी-साधी बातचीत है-
‘‘वे वहीं खडे हैं
जहां उनके पिताओं ने
उन्हें छोडा था
इसी तरह करेंगी
उनकी संतानें भी
हाथ में टिफिन और
कांधे पर झोला लिए
दौडेगी अनागत पीढियां
अपनी टूटी चप्पलों का
ध्यान रखते हुए
उस खटारा बस की तरफ
जो उन्हें कहीं नहीं
ले जाती
सिर्फ एक भरम देती है
गतिशीलता का।। पृ. २७ सुकरात नहीं था वह
यहां कविता का अंत उस छद्म गतिशीलता पर जाकर होता है जो आजादी के बाद से हर विकास पुरुष आमजन को सौंप रहा है। किसी भी विचार के प्रति न नाराजगी है न प्रशंसा का भाव। मात्र छद्म गतिशीलता का कविता अनावरण करती है।
व्यास जी की कविता का नायक आम आदमी है, साधारणजन है। वे जन की कठिनाइयों पर सोचते हैं, बतियातें हैं। वे शिक्षक हैं, और उनका अध्यापन कविता से बहुत दूर रह जाता है। क्या युवा कवि का मन ही प्रेम समझ पाता है? एक पूरी जिंदगी जीने के बाद पत्नी का न होना और अभाव से उपजी व्यथा प्रेम गाथा ही तो है।
‘‘तुम चली गईं
ज्यों चला जाए
कोई सपना
आंख को बिना बताए
मैं आंख से पूछता हूं
गये हुए सपने का रंग
आंख
कुछ नहीं बोलती
जन्म से ही यह
ऐसा ही है। पृ. ४१ सपने का रंग
जो समाज में बडे हैं वह बहुत बडे हैं और जो छोटे है वे तृण समान होते जा रहे हैं। समाज की व्यवस्था ही आज की व्यवस्था है। अगर सीढियां न हो तो आप वहीं रह जायेंगे। जाना कहां है कवि बहुत पहले गतिशीलता में कह आया है।
‘‘सीढियों का इस्तेमाल
करने वालों को
मालूम हो कि
जिस दिन
सीढियां नहीं होंगी
उस दिन
आकाश छूने वाले लोग
कितने बौने हो जाएंगे।’’ पृ. ४५ सीढियां
शब्दों की दुनिया अब अवसान पर है, साहित्य कर्म आज उपहास और अवहेलना का मानक बनकर रह गया है। अचानक २१वीं शताब्दी में जो नया परिवर्तन आया है वहां भाषा भी अब मूल्यहीन होती जा रही है। वर्षों की थाती, धरोहर, हमारा संचित ज्ञान ही था, पुस्तकें जो कभी घर की शोभा थी। पर आज घरों में सब कुछ है पर पुस्तकों के लिए कोई जगह नहीं है।
‘‘इस बघेरे से
किताब की चर्चा करना
कितना बेमानी होगा
मुझे अफसोस नहीं है इसका...।
अफसोस है तो
सिर्फ इतना कि
अब मैं अपने पुत्रों को
नहीं दे सकूंगा
कोई किताब।’’ पृ. ७९ किताब
भगवती लाल व्यास कवि हैं, कविता से जुडे हैं, उनकी कोई विशिष्ट वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है। सीढियां कविता में वे अपनी विवशता, अपनी मान्यता को स्पष्ट कर आये हैं।
‘‘यह रास्ता जिसे मैंने
चुना है
मेरा अपना है
और सबसे अहम बात यह है कि
मेरे पास इस रास्ते को
बदलने की
असीमित आजादी है
यह कहां होगी
तुम्हारे दिये हुए
रास्ते में?’’ पृ. ८३ यह रास्ता
संग्रह की एक और उल्लेखनीय कविता है शब्द
‘‘शब्दों ने स्याही का
लिबास पहना
और वे कविता हो गए
अब वे किसी को
जख्मी नहीं कर सकते।
कविता जख्म करती नहीं
भरती है
अब वे किसी से कुछ
वसूल नहीं कर पाएंगे
कविता सिर्फ देना जानती है
वसूलना नहीं।
जिस तरह शब्दों ने
स्याही का लिबास पहना
वैसे ही आदमी भी
पहनता है शब्दों को
मगर उसमें नहीं होता
कोई परिवर्तन।
होता यह है कि
वह भेड से भेडिया
बन जाता है।
शब्द पहनते ही
सूख जाती है
उसकी सारी नमी
और वह
सूखे काठ की तरह
तन जाता है।
कभी-कभी सोचता हूं
शब्द और शब्द में
इतना फर्क क्यों है? पृ. १२६ शब्द और शब्द
कवि का मन उदात्त है। कविता उसके हृदय की रागात्मक भावनाओं का प्रस्फुटन है। वह साहित्य का लिबास पहनती है। शब्द कविता बन जाते हैं। अब इंसान का हृदय संवेदनहीन हो गया है। बुद्धि चातुर्य का लिबास पहनता है, लाभ और लोभ की जैकेट पहनता है। शब्द उसके मस्तिष्क में जमा होती घात-प्रतिघात का व्यापक संसार मकडजाल की तरह बुनते रहते हैं जिसमें वह उलझकर एक दिन चला जाता है।
सहज पारदर्शी भाषा में अपने आपको सहेजे भगवती लाल व्यास की कविताएँ हैं। यह उनके जीवन की काव्य यात्रा का जीवंत दस्तावेज है, जो प्रांत की काव्य यात्रा में उल्लेखनीय है। ?
१ल-१, दादाबाडी, कोटा (राज.)